कहा जाता है कि अगर तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो वह पानी के लिए होगा. दरअसल दुनिया के तमाम दूसरे देशों की तरह भारत में भी शहरी आबादी की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन उसका एक बड़ा हिस्सा पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी रोज जूझता है. दिल्ली सहित देश के लगभग सारे ही शहर पानी के लिए बाहरी संसाधनों के सहारे हैं. लेकिन अक्सर ये संसाधन भी पूरे नहीं पड़ते. अलग-अलग राज्यों से लेकर देशों तक पानी के बंटवारे के लिए टकरावों की खबरें जब-तब चर्चा में आती ही रहती हैं.

लेकिन दिल्ली के सतीश सापरा का उदाहरण बताता है कि अगर व्यक्ति और बड़े संदर्भों में समाज खुद ठान ले तो इस कठिन समस्या से निपटना बहुत आसान है. जिस दौर में देश के अलग-अलग शहरों में भूमिगत जल का स्तर लगातार नीचे जाने की खबरें आम हैं, उस दौरान सापरा ने अपने प्लॉट में पानी का स्तर 200 फीट से 15 फीट तक लाने में सफलता पाई है. वह भी सिर्फ अपनी लगन, थोड़ी सी जागरूकता और सरल तकनीक की मदद से.

जिस दौर में देश के अलग-अलग शहरों में भूजल का स्तर लगातार नीचे जाने की खबरें आम हैं, उस दौरान सापरा ने अपने प्लॉट में पानी का स्तर 200 फीट से 15 फीट तक लाने में सफलता पाई है.

76 साल के सतीश दिल्ली के नेहरू एन्क्लेव ईस्ट नाम के एक इलाके में रहते हैं. अपने इलाके में पानी के गिरते स्तर से वे बहुत चिंतित थे. फिर एक दिन उन्होंने फैसला किया कि सरकार को कोसने से अच्छा है कि अपने स्तर पर कोई कोशिश करके देखा जाए. एक अखबार से बातचीत करते हुए वे कहते हैं, ‘1968 के दौर में कालकाजी एक्सटेंशन इलाके में 15-20 फीट की गहराई पर आराम से पानी मिल जाता था. 1995 तक पानी का लेवल 200 फीट तक चला गया. मेरे लिए यह परेशान करने वाली बात थी. मुझे लगा कि कुछ करना चाहिए.’

सतीश सापरा
सतीश सापरा

सतीश विश्व स्वास्थ्य संगठन में नौकरी किया करते थे. उन्होंने अपने स्तर पर जानकारी जुटाई. विशेषज्ञों से भी बात की. इसके बाद उन्होंने अपने 200 गज के प्लॉट में चार गुणा चार फीट के तीन रीचार्ज पिट खोदे. इन गड्ढ़ों के जरिये बारिश के पानी को सहेजा जा सकता था. सतीश ने अपने पड़ोसियों से भी मदद मांगी और उनकी छतों में लगे बारिश के पानी निकालने वाले पाइपों को इन रीचार्ज पिटों से जोड़ दिया. अब आस-पड़ोस की इन छतों पर गिरने वाला पानी भी सहेजा जा सकता था जो बेकार चला जाया करता था.सतीश सापरासतीश बताते हैं, ‘इससे जलागम क्षेत्र का आकार ठीकठाक बढ़कर 600 गज हो गया. वे कहते हैं, ‘उन दिनों इस काम पर मेरे करीब 25 हजार रु खर्च हुए थे. लेकिन घर बनाने के दौरान ही जल संरक्षण को ध्यान में रखकर काम किया गया होता तो यह रकम काफी कम हो जाती.’

उन्होंने अपने 200 गज के प्लॉट में चार गुणा चार फीट के तीन रीचार्ज पिट खोदे. इन गड्ढ़ों के जरिये बारिश के पानी को सहेजा जा सकता था.

धीरे-धीरे सतीश सापरा की कोशिशें रंग लाने लगीं. 1996 में भूमिगत जल का जो स्तर 200 फीट था वह 2003 तक आते-आते 130 फीट हो गया. 2007 में यह 60 फीट हुआ और 2013 में जब उन्होंने आखिरी बार इसकी जांच करवाई थी तो यह 15 फीट तक आ चुका था.

इस पहल और इसके नतीजों को देखकर कुछ और लोगों ने भी इस दिशा में काम करना शुरू किया. नेहरू एंक्लेव के पार्क में वर्षा जल संरक्षण की व्यवस्था बनाई गई. सतीश सापरा के कुछ दोस्तों ने भी अपने घरों में इस तकनीक पर अमल शुरू कर दिया. सतीश कहते हैं, ‘अब भी समाज का एक बड़ा वर्ग इसके फायदों से अनजान है. लेकिन लोग आगे आएं तो इससे बहुत फर्क पड़ेगा. जो एक घर में हुआ है वह कहीं बड़े स्तर पर हो सकता है.’

एक साक्षात्कार में चर्चित पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहते हैं, ‘पानी का स्वभाव है ऊपर से नीचे आना. हम उसे नीचे से ऊपर बुला रहे हैं. ऊपर से नीचे नहीं जाने दे रहे. कितने दिन चला पाएंगे ऐसे काम?’ सतीश सापरा ने पानी के ऊपर से नीचे जाने की व्यवस्था बनाकर जो नतीजे हासिल किए हैं उन्हें देखकर कहा जा सकता है कि दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध से बचना है तो बाकी लोगों को भी उनकी राह पर चलना ही होगा.