जर्मनी के म्यूनिख शहर के एक होटल ‘बायेरिशर होफ़’ में 1963 से हर साल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होता है. फरवरी में होने वाले इस आयोजन में विभिन्न देशों के शासनाध्यक्षों से लेकर ऊंचे पदाधिकारियों, सैनिक अफ़सरों, सुरक्षा विशेषज्ञों और वैज्ञानिक-आर्थिक संगठनों के निदेशकों जैसे बहुत ही खास लोग भाग लेते हैं. 15 से 17 फ़रवरी तक चले इस बार के 55 वें सुरक्षा सम्मेलन में रूस, चीन, जापान, अमेरिका, जर्मनी और भारत सहित दर्जनों देशों के क़रीब 600 लोग आये थे.

भारत से आये राष्ट्रीय सुरक्षा के उप-परामर्शदाता पंकज सरन ने इस सम्मेलन में जर्मनी, रूस, अमेरिका, अफ़ग़ानिस्तान, उज़बेकिस्तान, बांग्लादेश, म्यानमार, आर्मेनिया, मंगोलिया और ओमान के प्रतिनिधियों से मिल कर उन्हें पुलवामा में 14 फ़रवरी को हुए आतंकवादी हमले में पाकिस्तान की भूमिका का परिचय दिया. वे जिस किसी देश के प्रतिनिधि से मिले, सबने इस घटना में प्राण गंवाने वालों के प्रति शोक और संवेदना व्यक्त की. पुलवामा के हमले या भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनावों के बारे में अन्यथा जर्मनी सहित यूरोप के अन्य देशों के मीडिया में शायद ही कहीं कुछ प्रकाशित अथवा प्रसारित हुआ हो. लोगों को मालूम ही नहीं है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव इस समय किस चरमसीमा पर है.

जर्मनी और फ्रांस के बीच मतभेद के संकेत

म्यूनिख के सुरक्षा सम्मेलन के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने उपराष्ट्रपति माइक पेन्स को भेजा. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने और ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने अपने विदेश मंत्री को भेजा. जर्मन चांसलर अंगेला मेर्कल और फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों को मिल कर इस सम्मेलन को संबोधित करना था. किंतु माक्रों यह कह कर म्यूनिख नहीं आये कि वे अपने देश में, तीन महीनों से हर शनिवार होने वाले पीली जैकैट-धारियों के उग्र प्रदर्शनों के करण, बहुत व्यस्त रहेंगे. असली कारण शायद यह था कि जर्मनी और रूस के बीच बन रही रूसी प्राकृतिक गैस की एक समुद्री पाइपलाऩ को लेकर माक्रों अप्रसन्न हैं. वे इसे रूस पर निर्भरता का निर्णय बताते हैं, जबकि जर्मनी ऐसा नहीं मानता.

यूरोपीय देश वास्तव में इस समय अपनी ही सुरक्षा और अपनी ही खुशहाली को लेकर कहीं अधिक चिंतित हैं. डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से उन्हें लगने लगा है कि अमेरिका का वरदहस्त अब उनके सिर पर नहीं रहा. दुनिया तीन महाबलियों अमेरिका, रूस और चीन के बीच वर्चस्व की होड़ का एक ऐसा अखाड़ा बनती जा रही है, जिसमें अब तक के बहुपक्षवाद (मल्टी लैट्रलिज़्म) को जीवित रखने का यूरोपीय राग नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ बन कर रह जायेगा. यूरोपियों का माथा ठनकने लगा है कि इन तीनों बहुबलियों के प्रति उनकी अब तक की आर्थिक, कूटनीतिक, सामरिक और व्यापारिक रणनीतियां भविष्य में काम नहीं आयेंगी.

वैश्विक शक्ति-संतुलन में आमूल परिवर्तन

वैश्विक शक्ति-संतुलन में इस आमूल परिवर्तन ने जर्मनी की मृदुभाषी चांसलर (प्रधानमंत्री) अंगेला मेर्कल को भी, पहली बार, इतना मुखर बना दिया है कि उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बार भी नाम लिये बिना, उन पर कई बार ऐसे-ऐसे साहसिक शब्दबाण चलाये कि भाषण के अंत में सम्मेलन-हॉल तालियों की गूंज से गड़गड़ा उठा.

चांसलर मेर्कल भौतिकशास्त्र में डॉक्टर की उपाधिधारी हैं. भौतिकी के ही इस सिद्धांत के अनुसार कि ‘सब कुछ पारस्परिक क्रिया है’, उन्होंने अपने भाषण में यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि सभी देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं, सबको मिलजुल कर, बहुपक्षीय ढंग से, आज के समय की समस्याएं हल करनी होंगी. अपनी मनमानी करने से समस्याएं और जटिल ही बनेंगी. अंगेला मेर्कल के कहने का लब्बोलुआब यह था कि दुनिया में इस समय जो अनेक बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और संगठन हैं, वे दूसरे विश्वयुद्ध से मिले अनुभवों का परिणाम हैं. उन्हें बनाये रखना चाहिये.

बहुपक्षवाद पर चोट

उत्तर अटलांटिक संधि संगठन ‘नाटो’ के गठन को इन्हीं अनुभवों का एक परिणाम बताते हुए चांसलर मेर्कल ने कहा कि नाटो के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाना या उसे ‘खंडित’ करना बहुपक्षवाद पर कुठाराघात करने जैसा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ‘नाटो’ को अमेरिका के लिए एक ख़र्चीला बोझ मानते हैं. वे चाहते हैं कि यूरोपीय देश या तो उसके लिए अपना अंशदान बढ़ायें या फिर अपनी रक्षा आप करने की सोचें. इसी प्रकार बात चाहे मध्यवर्ती दूरी वाले परमाणु अस्त्रों के निषेध की ‘आईएनएफ़’ संधि की हो या वैश्विक आर्थिक संस्थाओं की, चांसलर मेर्कल के शब्दों में ‘हमें उन्हें सदा बहुपक्षीय संरचनाओं के रूप में देखना होगा.’

राष्ट्रपति ट्रंप का नाम लिये बिना, पर सीधे उन्हीं पर निशाना साधते हुए, जर्मन चांसलर ने और भी कई तीर चलाये. उन्होंने ईरान के साथ उस बहुपक्षीय परमाणु समझौते का बचाव किया, जिसे डोनाल्ड ट्रंप ठुकरा चुके हैं और ईरान के विरुद्ध लगे प्रतिबंधों पर अडिग हैं. मेर्कल ने सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की एकतरफ़ा वापसी की घोषणा का विरोध किया. यूरोपीय देशों द्वारा अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी करने के ट्रंप के आग्रह को भी उन्होंने अनुचित बताया और अमेरिका को निर्यात होने वाली जर्मन कारों पर दंडात्मक सीमाशुल्क (कस्टम ड्यूटी) लगाये जाने के इरादे की खुलकर आलोचना की.

यूरोपीय कारें अमेरिका की सुरक्षा के लिए ख़तरा!

उल्लेखनीय है कि डोनाल्ड ट्रंप यूरोपीय कारों के आयात को ‘अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा’ घोषित करना चाहते हैं. उन्होंने संकेत दिया है कि 90 दिनों के भीतर जर्मनी सहित सभी यूरोपीय देशों की कारों के आयात पर 25 प्रतिशत सीमाशुल्क ठोका जा सकता है. इसे ‘भयावह’ बताते हुए चांसलर मेर्कल ने कहा, ‘ये कारें अमेरिका में ही बनती हैं. बीएमडब्ल्यू का सबसे बड़ा कारख़ाना (जर्मनी के) बवेरिया में नहीं बल्कि (अमेरिका के) साउथ कैरोलाइना में है और वहां (हज़ारों) लोगों को नौकरियां देता है.’

अमेरिका की ठकुरसुहाती का आदी रहा जर्मनी अब तक हमेशा रूस को खरीखोटी सुनाने में पारंगत रहा है. लेकिन, म्यूनिख के अंतरराष्ट्रीय रक्षानीति सम्मेलन में चांसलर मेर्कल का एक दूसरा ही रूप देखने में आया. रूसी गैस के आयात के लिए जर्मनी और रूस के बीच बन रही ‘नॉर्थ स्ट्रीम2’ नामक समुद्री पाइपलाइन का बचाव करते हुए उन्होंने बड़े साहसिक ढंग से कहा, ‘भूरणनीतिक दृष्टि से यूरोप की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती कि रूस के साथ सभी संबंध तोड़ लिये जायें.’ यानी, देर से ही सही, पर अब जर्मनी की भी समझ में आने लगा है कि अमेरिका की खुशी के लिए रूस से हमेशा शत्रुता ठाने रखना बुद्धिमत्तापू्र्ण नहीं हो सकता.

यूरोप से अमेरिका की मांगें

अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेन्स के भाषण का स्वागत काफ़ी ठंडा रहा. उन्होंने जताने का प्रयास किया कि अमेरिका और यूरोप के संबंध अब भी सद्भावनापूर्ण ही हैं और ट्रंप प्रशासन भी नाटो की कार्यकुशलता और यूरोप की स्वतंत्रता के महत्व से सुपरिचित है. उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप का एक ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में चित्रण किया जिसने अमेरिका को एक बार फिर विश्व का अगुआ देश बना दिया है. पेन्स ने साथ ही यूरोपीय संघ से कुछ ठोस मांगें भी कीं. मसलन यूरोपीय संघ भी ईरान से परमाणु समझौता खत्म करे करे, वेनेज़ुएला में खुद को अंतरिम राष्ट्रपति घोषित कर चुके ख़ुआन गोइदो को राजनयिक मान्यता प्रदान करे, नाटो के यूरोपीय सदस्य रक्षाकार्यों के लिए अधिक धन उपलब्ध कराएं र रूसी गैस पाइपलाइन ‘नॉर्थ स्ट्रीम2’ का अन्य यूरोपीय देश भी विरोध करें.

अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने कहा, ’समय आ गया है कि हमारे यूरोपीय साथी ईरान की हत्यारी क्रांतिकारी सरकार के विरुद्ध लगे अमेरिकी प्रतिबंधों की काट निकालना बंद करें. समय आ गया है कि हमारे यूरोपीय साथी ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से पीछे हट जायें... समय आ गया है कि हमारे यूरोपीय साथी हमारे साथ खड़े हों.’ माइक पेन्स ने भी अपने भाषण में जर्मनी का नाम एक बार भी नहीं लिया, आशय अधिकतर भले ही जर्मनी से ही था. अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति जो बाइडन और वहां की प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ़ रिप्रज़ेन्टेटिव्ज़) की अध्यक्ष नैन्सी पेलोसी सहित 40 से अधिक अमेरिकी सांसद और कई पू्र्व मंत्रीगण भी यह बताने के लिए म्यूनिख आये थे कि एक दूसरा अमेरिका भी है, जो ट्रंप से सहमत नहीं है.

चीन की बढ़ती आवभगत

अमेरिका के बाद आजकल चीन की ही सबसे अधिक तूती बोलती है. जर्मन चांसलर अंगेला मेर्कल ने अपने भाषण में यह भी कहा कि मध्यवर्ती दूरी के परमाणु प्रक्षेपास्त्रों पर रोक लगाने वाली ‘आईएनएफ़’ संधि से अमेरिका और रूस के पीछे हट जाने से यूरोप अब बहुत ही असुरक्षित हो जायेगा. उनके मुताबिक इसलिए अब एक ऐसी नयी और कहीं व्यापक संधि की जरूरत है जिसमें अमेरिका और रूस के साथ चीन भी शामिल हो. लेकिन जब चीनी दल के मुख्य प्रतिनिधि यांग ज्येशी के बोलने की बारी आयी, तो वे चीन की नीतियों की प्रशंसा के पुल बांधते हुए किसी स्पष्ट उत्तर से कन्नी काट गये. यांग ज्येशी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य और वहां के पूर्व विदेश मंत्री हैं.

‘आईएनएफ़’ संधि के बारे में यांग ज्येशी ने इतना ही कहा कि अमेरिका और रूस को चाहिये कि वे इस संधि को बनाये रखें. उनके मुताबिक चीन ऐसी किसी संधि के बहुपक्षीकरण का औचित्य नहीं देखता क्योंकि वह यदि अपनी क्षमताएं बढ़ाता भी है, तब भी उससे किसी के लिए ख़तरा नहीं है. चीन को सबका हितचिंतक बताते हुए यांग ज्येशी ने चीन की सब्ज़बाग़ी ‘रेशम मार्ग’ (सिल्क रोड) योजना का उदाहरण दिया, जिसे ‘वन बेल्ट, वन रोड’ (ओबीओआर) या कई बार ‘बेल्ट एंड रोड इनिशियेटिव’ (बीआईआर) भी कहा जाता है. इस योजना को उन्होंने चीन के बहुपक्षीय विश्वव्यापी सहयोग के आदर्श नमूने के तौर पर पेश किया.

चीन सुरक्षा परिषद में बदलाव के विरुद्ध है

यांग ज्येशी ने एक दूसरा उदाहरण यह दिया कि इस समय के अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संस्थाओं के माध्यम से जलवायु परिवर्तन की समस्याओं या क्षेत्रीय विवादों को हल किया जा सकता है. साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भी कुछ सुधारों के बारे में सोचा जा सकता है. एक परिसंवाद के समय जब एक दूसरे चीनी प्रतिनिधि से पूछा गया कि क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना में भी कोई बदलाव किया जाना चाहिये, तो उसने ऐसे किसी परिवर्तन का विरोध किया. इसे जर्मनी, जापान, भारत और ब्राज़ील के उन लोगों के लिए चीन का उत्तर समझा जाना चाहिये, जो सुरक्षा परिषद के विस्तार द्वारा अपने लिए स्थायी सदस्यता पाने के आकांक्षी हैं.

जब से दुनिया चीन को सलाम करने लगी है, रूस की पूछताछ और भी कम हो गयी है. रूसी नेता सोवियत संघ वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने लिए जिस बराबरी के आदी हो गये थे, उसके लिए अब तरस जाते हैं. रूसी विदेशमंत्री सेर्गोई लावरोव को इसी करण म्यूनिख में अब वह मान-सम्मान नहीं मिलता जो उनके किसी अमेरिकी या चीनी समवर्ती को मिलता है.

रूसी शिकवे-शिकायतें

लावरोव का भाषण इसीलिए काफ़ी छोटा रहा. उन्होंने कुल मिला कर वही शिकवे-शिकायतें दोहरायीं, जो वे बीते वर्षों में भी कह चुके हैं. यही कि रूस तो सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही एक साझा अखिल यूरोपीय घर बनाना चाहता था. लेकिन, ऐसा तभी हो सकता है, जब यूरोपवासी अमेरिका पर अपनी निर्भरता से मुक्त हों. उनका कहना था कि अमेरिका और उसके यूरोपीय मित्र देशों नें भूतपूर्व युगोस्लाविया को खंडित किया, यूरोप में कोसोवो नाम का एक बिल्कुल नया देश बनाया, रूसी सीमा के पास प्रक्षेपास्त्र-मारक रक्षाप्रणाली स्थापित की गई और इस बीच यूरोपीय संघ भी रूस के साथ साझे सहयोग की परियोजनाओं को साकार करने से मुंह मोड़ने लगा है.

‘आईएनएफ़’ संधि का ज़िक्र रूसी विदेशमंत्री ने नहीं किया. हालांकि परमाणु अस्त्र परिसीमन की 2021 में समप्त हो रही ‘न्यू स्टार्ट’ संधि का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन उसकी वैधता की अवधि बढ़ाने के बारे में वार्ताओं के लिए तैयार हैं. उनके मुताबिक रूस चाहेगा कि अमेरिका भी ऐसी ही तत्परता दिखाये और उसे किसी प्रस्ताव की प्रतीक्षा है. बहुपक्षवाद के बारे में लावरोव का कहना था, ‘देखने में तो यही आता है कि अलग-अलग विषयों में हितों की समानता ही अलग-अलग देशों को एकसाथ लाती है.’

डोनाल्ड ट्रंप का नया धमाका

म्यूनिख सम्मेलन के अंतिम दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया धमाका किया. उन्होंने ट्वीट किया, ‘ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और अपने अन्य मित्र देशों से अमेरिका कहना चाहता है कि हमने सीरिया में आईएस (इस्लामी स्टेट) के 800 से अधिक लड़ाकों को बंदी बनाया है, वे (ये देश) उन्हें वापस लें और अपने यहां अदालत के कठघरे में खड़ा करें. अन्यथा हम उन्हें मुक्त कर देने के लिए विवश हो जायेंगे. हम नहीं चाहते कि आईएस के लड़ाके तब यूरोप में घुसपैठ करें, क्योंकि संभावना यही है कि वे वहीं जाना चाहते हैं. हमने अब तक बहुत कुछ किया और बहुत ख़र्च भी उठाया है. अब समय आ गया है कि दूसरे (देश) भी आगे आयें और वह काम पूरा करें, जिसे हमने बढ़िया ढंग से कर दिखाया है.’’

डोनाल्ड ट्रंप इससे पहले भी कई बार कह चुके हैं कि यूरोप को मध्यपूर्व में भी अधिक ज़िम्मेदारियां लेनी चाहियें. आईएस के ये सभी लड़ाके यूरोपीय देशों के नागरिक हैं. यूरोपीय देश उन्हें लेना नहीं चाहते, पर यह भी नहीं चाहते कि वे अवैध रूप से घुसपैठ करें और छिप-छिपा कर एक बार फिर आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न हो जायें. यूरोपीय देशों के लिये यह भी ‘आगे कुंआ, पीछे खाई’ जैसा वही असमंजस है, जो उन्हें तीनों महाबलियों अमेरिका, रूस और चीन में से किसी के भी साथ पूरे मन से खड़ा नहीं होने दे रहा.