मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिलने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया उदास थे. ग्वालियर से आए ‘महाराज’ के समर्थक उनके दिल्ली वाले सरकारी बंगले पर हल्ला बोल कर रहे थे लेकिन उन्होंने सब्र रखा. अपने समर्थकों को भी समझाया और पार्टी के आलाकमान को भी कि वे जल्दी में नहीं हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी नेता बताते हैं कि उनके लिए पीछे हटना आसान नहीं था, लेकिन प्रियंका और राहुल गांधी के कहने पर उन्होंने एक बार भी जिद नहीं ठानी और भोपाल जाने का फैसला छोड़ दिया. इसके बाद सिंधिया, कमलनाथ की ताजपोशी में शामिल हुए, अपने समर्थकों को भी शांत कराया और मध्य प्रदेश सरकार बनने के बाद दिल्ली की सियासत में लौट आए.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि मध्य प्रदेश पर अपना दावा छोड़ने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को तनिक भी अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें प्रियंका गांधी के बराबर लाकर खड़ा कर दिया जाएगा. जब अखिलेश और मायावती ने महागठबंधन बनाने का एलान कर दिया और कांग्रेस के लिए सिर्फ दो सीटें छोड़ दीं तो राहुल गांधी ने कहा कि उनके पास उत्तर प्रदेश के लिए एक जबरदस्त आइडिया है. यह जबरदस्त आइडिया प्रियंका के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश भेजने का था. इसके बाद जो हुआ उसने कांग्रेस के अंदर बुजुर्ग और जवान, सभी नेताओं को हैरान-परेशान कर दिया.

कांग्रेस के एक बुजुर्ग नेता ने कुछ दिन पहले वरिष्ठ पत्रकारों को बताया कि कभी किसी ने नहीं सोचा था कि गांधी परिवार के बराबर लाकर किसी बाहर के नेता को खड़ा किया जाएगा. जिस तरह से प्रियंका गांधी की सियासी एंट्री के वक्त राहुल गांधी ने अपने हर बयान में ज्योतिरादित्य सिंधिया का जिक्र किया वह एक नई परंपरा की शुरुआत है.

कांग्रेस के कई नौजवान नेता आजकल सिंधिया के बढते कद से बेहद चिंतित हैं. ऐसे ही एक नेता बताते हैं कि पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम कांग्रेस के टॉप टेन नेताओं में सबसे आखिर में आता था - सोनिया, राहुल, प्रियंका गांधी(सियासत में ना आने से पहले भी प्रियंका नंबर तीन की हैसियत रखती थीं), अहमद पटेल, गुलाम नबी आज़ाद, मल्लिकार्जुन खडगे, अशोक गहलोत, पी चिदंबरम, एके एंटोनी और ज्योतिरादित्य सिंधिया. लेकिन अब अचानक यह टॉप टेन बदल गया है. कल तक गांधी परिवार से बाहर अहमद पटेल सबसे ताकतवर कांग्रेस नेता माने जाते थे लेकिन अब ज्योतिरादित्य सिंधिया इस जगह पर काबिज हो चुके हैं.

आखिर इतना बड़ा रिस्क गांधी परिवार ने क्यों लिया? एक लोकप्रिय माने जाने वाले हिंदी बेल्ट के अनुभवी और नौजवान नेता को ऐसी जबरदस्त पदोन्नति पार्टी ने कैसे दे दी? प्रियंका गांधी के वॉर रूम में काम करने वाले एक सूत्र बताते हैं कि प्रियंका गांधी अब नये रास्ते पर चलना चाहती हैं. यह प्रियंका की ही जिद थी कि उन्हें हर वक्त ज्योतिरादित्य सिंधिया के बराबर ही समझा जाए. वो खुद वंशवादी नेता नहीं बनना चाहतीं बल्कि यह संदेश देना चाहती हैं कि वे भी बाकी महासचिवों में से ही एक हैं. इसीलिए जब राहुल गांधी का कमरा प्रियंका गांधी को दिया गया तो पता लगते ही प्रियंका ने कार्यालय इंचार्ज को उस कमरे के बाहर ज्योतिरादित्य की भी नेम प्लेट लगाने का आदेश दिया. पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए अशोक गहलोत का कमरा खाली कराया गया था लेकिन प्रियंका के कहने पर उनका नेम प्लेट बदल दिया गया.

ज्योतिरादित्य सिंधिया पर गांधी परिवार को इतना भरोसा क्यों है? इस बात को जानने के लिए पिछले दिनों आए पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद किया हुआ इसे जानना जरूरी है. पार्टी के एक और युवा नेता और राजस्थान के वर्तमान उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट अशोक गहलोत के आगे जल्द सरेंडर करने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे. वे मुख्यमंत्री बनना चाहते थे और बार-बार अलग-अलग तरीके से यह बता रहे थे कि राहुल गांधी ने राजस्थान भेजते वक्त उन्हें राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था.

लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के लिए गांधी परिवार पर किसी भी तरह का दबाव नहीं डाला. इस दौरान सिंधिया ने जिस तरह से अपने समर्थकों को शांत करवाया वह अंदाज भी गांधी परिवार को पसंद आ गया. इसके बाद ही से सिंधिया गुड बुक में आ गए. कांग्रेस के एक अनुभवी नेता ने यहां तक कहा कि जिस तरह से राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके करीबी दोस्त कैबिनेट में भी आए और सरकार के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में साझेदार बने. अगर कल को राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनते हैं तो ज्योतिरादित्य सिंधिया उनकी कैबिनेट के दूसरे सबसे अहम मंत्री बन सकते हैं. बस एक फर्क है, राजीव के ज्यादातर दोस्त उनके दून स्कूल के साथी थे और सियासी अनुभव में उनके जैसे ही कच्चे थे. लेकिन इस बार सिंधिया जैसे नेता राहुल से पहले से सांसद हैं और केंद्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं.

मध्य प्रदेश के एक पत्रकार बताते हैं कि ऐसा भी नहीं है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए यह इतना ही आसान होने वाला है. अभी से कुछ कांग्रेसी नेता गुना से सिंधिया को हराने में जुट गए हैं. चूंकि सिंधिया पूरी तरह से उत्तर प्रदेश में व्यस्त रहेंगे इसलिए उनके लिए गुना में प्रचार करना आसान नहीं होगा. 2014 में वहां से सिंधिया करीब एक लाख इक्कीस हजार वोटों से चुनाव जीते थे, लेकिन इस बार भाजपा ने गुना से किसी हेवीवेट को मैदान में उतारने का फैसला किया है. ऐसे में सुनी-सुनाई यह भी है ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह इस बार उनकी पत्नी प्रियदर्शिनी राजे सिंधिया गुना से चुनाव लड़ सकती हैं.

मध्य प्रदेश के सिंधिया गुट के नेताओं ने भोपाल से इसके लिए एक प्रस्ताव भी दिल्ली भेज दिया है. इसमें ‘महारानीजी’ को चुनाव लड़ाने की फरमाइश की गई है. ग्वालियर महल से भी खबर आ रही है कि प्रियदर्शिनी राजे ने प्रचार की तैयारी शुरू कर दी है. वे करीब एक हफ्ता वे इलाके के महिला समूहों के बीच बिताने वाली हैं. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि सिंधिया उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ाएंगे और पत्नी मध्य प्रदेश से चुनाव लड़ेंगी. यह फैसला ऊपर से हो चुका है. चुनाव खत्म हो जाने के बाद सिंधिया राज्यसभा जाएंगे और पत्नी लोकसभा.