फ़र्ज़ करें- आपके सामने अपने परिवार को पालने की शर्त है कि एक गर्द भरा थैला, आपको अपने चेहरे के चारों तरफ लपेटना होगा. वह भी इस तरह कि उसमें से कम से कम हवा आर-पार हो सके. मजबूरन आप ऐसा कर भी लेते हैं. पर इसके थोड़ी देर बाद ही सांस ले पाना दूभर हो जाता है, आप हांफने लगते हैं, ख़ून की उल्टियां करते हैं. कुछ समझ नहीं आता. घबराहट इतनी बढ़ती है कि आप बेदम होकर गिर पड़ते हैं. उस थैले को चेहरे से हटाने की बेहिसाब कोशिश करते हैं, लेकिन नाकाम हो जाते हैं. बेसुधी की हालत में बीवी-बच्चों और बूढ़े मां-बाप की धुंधली शक्लें, आंसू बनकर आंखों में तैरने लगती हैं. आप जैसे-तैसे फिर उठते हैं, कुछ करने की कोशिश करते हैं, फिर दम भरता है और कुछ देर बाद आप फिर ख़ून उगलकर नीचे गिर जाते हैं. और इसी बीच आकर कोई आपसे कहता है कि बेइंतहा तकलीफ का यह सिलसिला आपको घंटे, दिन या हफ़्ते नहीं बल्कि मरते दम तक, हर घड़ी, हर पल झेलना पड़ेगा. तो आप पर क्या गुज़रेगी!

कहने-सुनने में ही सिरहन पैदा करने वाली ये भयावह स्थिति काले साये की तरह राजस्थान के हजारों बाशिंदों के जीवन का हिस्सा बन चुकी है. इसकी वजह है ‘सिलिकोसिस’ बीमारी. दरअसल, प्रदेश की आबादी का एक बड़ा तबका सिंचाई के साधनों की अनुपलब्धता और कोई अन्य रोज़गार न होने की वजह से खनन और पत्थर की घिसाई के काम से जुड़ा है. वहां उड़ने वाली धूल या पत्थरों का बुरादा जिसे सिलिका भी कहा जाता है, मौत बनकर इन लोगों के सीने में धीरे-धीरे इकठ्ठा होता रहता है. आमतौर पर सिलिकोसिस में मरीज़ की वही स्थिति होती है, जिसका हमने ऊपर ज़िक्र किया है.

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित नेशनल हेल्थ पोर्टल (एनएचपी) के मुताबिक सिलिकोसिस एक लाइलाज बीमारी है यानी इसका बचाव ही उपचार है. यही कारण है कि सिलिकोसिस की पहचान होने के बाद मरीजों को जो प्रमाणपत्र मिलता है, उसे वे अपना ‘डेथ वारंट’ या ‘डेथ सर्टिफिकेट’ कहकर बुलाते/ बताते हैं.

राजस्थान में यह बीमारी किस तरह महामारी का रूप ले चुकी है, इस बात का अहसास हमें सिरोही जिले के पिंडवाड़ा ब्लॉक में पड़ने वाले राणीधरा गांव आकर हुआ. गरासिया जनजाति बहुल इस गांव में करीब पचास घर हैं. एक घर में कम से कम दो परिवारों (बाप और बेटे) की भी रिहायश मानकर चलें तो यहां करीब सौ पुरुष और इतनी ही महिलाओं की आबादी होनी चाहिए. लेकिन गांव के महंत हिम्मत रावल बताते हैं कि यहां सिर्फ आठ पुरुष ही जीवित बचे हैं. इनमें से चालीस से अधिक उम्र के सिर्फ दो हैं. इसके चलते ढाणी की शक्ल वाले इस गांव में नब्बे से ज्यादा विधवाएं रहती हैं जिनमें से अधिकतर की आयु पच्चीस से पैंतीस साल के बीच है. यही कारण है कि आस-पास के इलाकों में राणीधरा को ‘विधवाओं का गांव’ भी कहा जाता है.

इनके अलावा राणीधरा में कम से कम सौ बच्चे ऐसे हैं जिनके सर से बाप का साया छिन चुका है. यहां कई परिवार ऐसे भी हैं जिनमें कोई पुरुष सदस्य न बचने की वजह से गृहस्थी की पूरी जिम्मेदारी कच्ची उम्र की बेवाओं पर आ गई. इसे विडंबना की हद कहा जा सकता है कि मजबूरन उन महिलाओं को भी उन्हीं कारखानों और खदानों का रुख़ करना पड़ा और वे भी अपनी जान से हाथ धो बैठीं. इसलिए इस गांव में एक बड़ी संख्या अनाथ बच्चों की भी है जिनकी देख-रेख उनकी बुजुर्ग दादियां कर रही हैं.

सत्तर वर्षीय रंगीबाई उन्हीं अभागी दादियों में से एक हैं. सत्याग्रह से हुई बातचीत में वे रह-रहकर उस घड़ी को कोसती हैं जब उन्होंने अपने दोनों बेटों और बड़ी बहु को पत्थर घिसाई के काम पर जाने दिया था. हमारी तरफ इशारा करते हुए वे स्थानीय भाषा में कहने लगती हैं, ‘तुम्हारी सी उम्र के मेरे दो बेटों की मिट्टी बीते तीन साल में सिमट गई. बाद में बहु भी अपने पीछे दो बेटियों और एक बेटे को बिलखते छोड़ गुज़र गई.’ इन बच्चों को अपने बेटे-बहु की निशानी मानकर रंगीबाई जैसे-तैसे उनका पेट पालने की हरसंभव कोशिश करती हैं. लेकिन उन्हें इस बात की बेहद फ़िक्र सताती है कि उनके बाद इन बच्चों की देख-रेख कौन करेगा?

रंगीबाई
रंगीबाई

कुछ ऐसी ही दास्तां यहां रहने वाली फेणी बाई की भी है. साठ वर्षीय फेणीबाई बताती हैं कि आठ साल पहले उनके पति को ऐसी खांसी हुई कि मरने तक पीछा नहीं छोड़ा. अपने दुख को आगे बयां करते हुए वे जोड़ती हैं, ‘कुछ ही साल बीते थे कि बड़ा बेटा भी चल बसा. जैसे-तैसे कारखाने में जाकर बहु ने परिवार संभाला लेकिन ढाई वर्ष पहले वह भी चल बसी.’

इससे आगे बात बढ़ाने पर फेणी बाई की पथराई आंखें नम होने लगती हैं. रंगीबाई की ही तरह वे भी अपनी दो नातिन और एक नाती को संभालते हुए कहती हैं, ‘बहु के बाद परिवार का दारोमदार छोटे बेटे पर आ गया. पर साल भर से वो भी गंभीर हालत में खाट में पड़ा है. कई बार डॉक्टर को दिखाया. हजारों रुपए की दवाई ली. लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ. वो खांसता रहता है. पर पैसे ही नहीं बचे तो अब किसे दिखाएं?’

फेणीबाई
फेणीबाई

राणीधरा में हम जितना आगे बढ़ते हैं, लोगों का दर्द भी मानो उतना ही बढ़ता जाता है. यहां रहने वाली शांतिबाई के पड़ोसी बताते हैं कि वे अपने दो बेटों- सेंधो और रेशो को याद कर दिन में कई-कई बार फफक पड़ती हैं. वे दोनों पांच साल पहले इस दुनिया से रुख़सत हो गए थे. अस्सी वर्षीय शांतिबाई कहती हैं, ‘राम जी ऐसा किसी के साथ न करे कि उसे जीते-जी दो जवान बेटों की लाशें देखनी पड़ें.’ टीस भरी आवाज़ में वे आगे जोड़ती हैं, ‘बेचारों को छोटी उम्र में ही काम पर लगा दिया था. लेकिन तब हमें क्या पता था कि ये कमाई उनकी जान लेकर जाएगी! ऐसा जानते तो हम भूखे मर जाते लेकिन उन्हें कारखाने नहीं भेजते.’

शांतिबाई
शांतिबाई

यहां आगे हमारी मुलाकात हंजाबाई से होती है. अपना सुहाग उज़ड़ने के कुछ ही वर्षों बाद हंजाबाई भी अपने एक बेटे की अर्थी देख चुकी हैं. अब उनकी विधवा बहु नाजू जैसे-तैसे नरेगा जाकर दो जून की रोटी का जतन करती हैं. नाजू को शिकायत है कि नरेगा के अधिकारी उन्हें तय मजदूरी नहीं देते. कभी-कभी तो उन्हें दिनभर मेहनत के बदले सिर्फ साठ रुपए से ही संतोष करना पड़ता है. निराशा और नाराज़गी के मिले-जुले स्वर में वे कहती हैं, ‘खदान-कारखानों में जाएं तो सांस की बीमारी दम निकाल देती है. और वहां न जाएं तो भूखे मरने की नौबत आ जाती है.’ (रिपोर्ट की मुख्य तस्वीर में दायें से नाजू पहली हैं और हंजाबाई तीसरी). कुछ ऐसी ही बात यहां रहने वाली कुसी बाई और सोमी समेत अन्य कई महिलाएं भी दोहराती हैं.

स्वयंसेवी संगठन ‘आजीविका ब्यूरो’ की वरिष्ठ सदस्य आभा मिश्रा, बड़ी संख्या में हुई इन मौतों को लेकर कहती हैं कि पहले खनन और पत्थर की घिसाई के काम हाथ से धीरे-धीरे हो पाते थे इसलिए बुरादा भी कम उड़ता था और बीमारी का ख़तरा भी कम था. लेकिन बाद में मशीनें आने की वजह से न सिर्फ इस काम की रफ़्तार बढ़ी बल्कि सिलिकोसिस के मरीजों की संख्या में भी बेतहाशा बढ़ोतरी देखने को मिली.

आभा मिश्रा की बात को इससे समझा जा सकता है कि आनुवांशिक न होने के बावजूद यह बीमारी बीते करीब दस साल में ही राणीधरा की तीन-तीन पीढ़ियों को अपनी चपेट में ले चुकी है. लेकिन विंडबना इस बात की भी है कि इनमें से अधिकतर सिलिकोसिस होने की पहचान तक नहीं कर पाए. (इसके कारणों का ज़िक्र हम आगे करेंगे). इसका गंभीर नुकसान यह हुआ कि कई मामलों में सिलिकोसिस वाले मरीजों को टीबी का इलाज दे दिया गया. और कभी-कभी साधारण खांसी वाले मरीज भी अज्ञानता और गरीबी के चलते अपने किसी करीबी की ही सिलिकोसिस वाली दवाईयों का सेवन कर गंभीर रूप से बीमार हो गए.

38 वर्षीय बदाराम गरासिया का परिवार की भी कुछ ऐसी ही भ्रम की स्थिति से गुज़र रहा है. बदाराम की मानें तो उन्हें सिलिकोसिस होने की पुष्टी डॉक्टरों ने कर दी है. लेकिन उनके साठ वर्षीय पिता और बारह साल के बेटे सुरेश की बीमारी के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं हो पाया है. जबकि तीनों के लक्षण एक ही सी बीमारी के हैं. पूछने पर सुरेश, ‘मैं...सातवीं कक्षा... में’ आधा वाक्य कहने में ही बुरी तरह हांफने लगता है. सुरेश की बीमारी के संभावित कारणों का ज़िक्र करते हुए उसकी मां मोवी बताती हैं कि बचपन में वे उसे अपने साथ पत्थर घिसाई के काम पर ले जाती थीं. अपनी चिंता को शब्दों में ढालते हुए वे कहती हैं, ‘पति के इलाज के बाद जो कुछ जमा-रकम थी वो इस बच्चे के इलाज में खर्च हो गई. दूर-दराज तक का इलाज ले लिया. लेकिन इसकी खांसी है कि ठीक ही नहीं होती.’

बाएं से- बदाराम, उनका बेटा और उनके पिता
बाएं से- बदाराम, उनका बेटा और उनके पिता

इन लोगों की दुश्वारियों को यह बात और बढ़ा देती है कि उन्हें तिल-तिल कर करीब आ रही मौत के साथ-साथ हर रोज़ प्रशासन की लालफीताशाही से भी जूझना पड़ता है. दरअसल, सरकार की तरफ से सिलिकोसिस की पुष्टि के बाद मरीज को एक लाख रुपए और उसकी मौत के बाद उसके परिवार को तीन लाख रुपए यानी कुल चार लाख रुपए मुआवज़े के तौर पर दिए जाने का प्रावधान है. लेकिन स्थानीय पत्रकार साकेत गोयल की मानें तो राणीधरा के अधिकतर मरीज इस इम्दाद का इंतजार करते-करते ही चल बसे.

इस बारे में चर्चा करने पर ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ के वरिष्ठ सदस्य पारस बंजारा बताते हैं कि यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति राणीधरा ही नहीं बल्कि प्रदेशभर के सिलिकोसिस पीड़ितों की है. राज्य की मौजूदा व पिछली सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए वे कहते हैं, ‘इंसानी जान के बदले जो न कुछ मुआवज़ा तय किया गया, कोई ठोस नीति न होने की वजह से वह भी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचता. इससे ज्यादा अमानवीयता क्या हो सकती है कि कुछ दिन की ज़िंदगी और ऑक्सीजन का सिलेंडर थामे एक मरीज को अपने मुआवज़े के लिए दफ़्तर-दर-दफ़्तर भटकने के लिए मजबूर होना पड़ता है.’

चर्चा को पीछे ले जाते हुए बंजारा कहते हैं, ‘जो व्यवस्था मरीजों की पहचान तक करने में नाकाम रही है, उससे कोई और उम्मीद की भी क्या जा सकती है?’ बकौल बंजारा, ‘आम चिकित्सक जानकारी के अभाव में सिलिकोसिस की पहचान ही नहीं कर पाते. संदेह होने पर वे मरीज को तीन विशेष चिकित्सकों के जिला स्तरीय बोर्ड, जिसे न्यूमोकोनियोसिस बोर्ड कहते हैं, को रेफर करते हैं. जिले के कई इलाकों से पचासों किलोमीटर दूर मुख्यालय में बैठने वाला यह बोर्ड आमतौर पर हफ़्ते में एक-दो दिन ही काम करता है. इसलिए कई तो यहां पहुंच ही नहीं पाते. और बाकी को अपनी बारी के लिए कई-कई वर्ष इंतजार करना पड़ता है और अधिकतर का दम तो नंबर आने से पहले ही टूट जाता है.’

बंजारा के इन दोनों दावों को खुद राजस्थान सरकार द्वारा हाल ही में जारी किए गए आंकड़े मजबूती देते हैं. इनके मुताबिक प्रदेश में अब तक रजिस्टर्ड 33,765 सिलिकोसिस मरीजों में से 16,866 यानी करीब पचास फीसदी की जांच अलग-अलग स्तर पर रुकी हुई है. वहीं, कुल मरीजों में से 8,087 यानी 23.95 प्रतिशत मरीजों में सिलिकोसिस की पुष्टि हो चुकी है. लेकिन इनमें से सिर्फ 1,961 यानी कुल में से 5.80 फीसदी पीड़ितों को ही अब तक सरकारी मदद नसीब हो पाई है. प्रदेश में कई जिले ऐसे भी हैं जहां एक भी मरीज को इस सहायता राशि का भुगतान नहीं किया गया. लेकिन इसे लापरवाही कहा जाए या जानबूझकर भ्रमित करने की कोशिश, सरकार ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद तस्वीर में इन आंकड़ों को प्रतिशत के लिहाज से घटाकर दर्शाया है. (वेबसाइट पर साधारण रजिस्ट्रेशन के बाद संबंधित आंकड़ों और तस्वीरों को देखा जा सकता है)

क्रेडिट : राजस्थान सरकार
क्रेडिट : राजस्थान सरकार

वहीं, बीते साल जारी हुई भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2013-17 के बीच प्रदेश में 4931 सिलिकोसिस पीड़ितों की पहचान की गई थी, जबकि इस दौरान 449 मरीजों की मौत दर्ज़ हुई. निजी स्तर पर जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर साकेत गोयल इन आंकड़ों पर सवाल खड़ा करते हैं. वे कहते हैं, ‘पिछले कुछ वर्षों में अकेले पिंडवाड़ा ब्लॉक में ही ऐसे करीब ढाई सौ मरीजों की मौत हो चुकी है, तो प्रदेशभर के असल हालात तो इससे कहीं ज्यादा भयावह होंगे!’

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता शंकर सिंह गोयल से सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘सूचनाएं एक जगह एकत्रित न होने की वजह से सरकार के पास सही आंकड़े मौजूद ही नहीं हैं.’ इसके एक अन्य प्रमुख कारण का भी ज़िक्र करते हुए शंकर सिंह आगे जोड़ते हैं, ‘डॉक्टरों को भी सिलिकोसिस से जुड़ी पूरी जानकारी न होने की वजह से मरीज़ों की जान पर तो बन ही आती है, साथ ही प्रदेश में बीमारी की वास्तविक स्थिति भी स्पष्ट नहीं हो पाती.’ सिंह की मानें तो उनके सामने कुछ मामले ऐसे भी आ चुके हैं जिनमें एक जिले में तो चिकित्सकों ने सिलिकोसिस की पुष्टि कर दी, जबकि दूसरे जिले के चिकित्सकों ने मरीज को ठीक घोषित कर दिया.

‘खान मजदूर सुरक्षा अभियान ट्रस्ट’ प्रबंध नियासी डॉ राणासेन गुप्ता बात को आगे बढ़ाते हुए चिंताजनक तथ्य पेश करते हैं. वे कहते हैं, ‘सिलिकोसिस बीमारी की पहचान के लिए अंतरराष्ट्रीय मजदूर संस्था (आईएलओ) से विशेष प्रशिक्षण लेना होता है. लेकिन हमारे 33 जिलों के (न्यूमोकोनियोसिस बोर्ड के) करीब सौ चिकित्सकों में से महज पांच या सात ही इस मापदंड पर खरे उतरते हैं.’

गुप्ता आगे जोड़ते हैं, ‘सिलिकोसिस की जांच के लिए आईएलओ की तरफ से जारी प्लेट्स की मदद से एक्स-रे लिया जाना चाहिए. लेकिन इस मोर्चे पर भी घोर लापरवाही बरती जाती है.’ बकौल गुप्ता, ‘साधारण एक्सरे में सीने में धब्बा दिखता है जिसे देखकर चिकित्सक टीबी का इलाज शुरु कर देते हैं. न जाने कितने लोगों को इस कारण से भी जान से हाथ धोना पड़ा है.’ इस वजह से अब तक हुई सभी मौतों को गुप्ता क़त्ल करार देते हैं.

लेकिन सरकार और प्रशासन की अंधेरगर्दी इस सब पर भी नहीं रुकती. गौरतलब है कि खनन प्रभावित जिलों में सरकारी फंड के अलावा जिला खनिज संस्थान न्यास (डीएमएफटी) मौजूद हैं, जिनमें प्रतिवर्ष खदान मालिक कर के तौर पर सैकड़ों करोड़ रुपए जमा करवाते हैं. नियमानुसार इस राशि का इस्तेमाल संबंधित जिले के जनहित (जिनमें खासतौर पर सिलिकोसोसिस मरीज शामिल हैं) कार्यों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए. लेकिन जानकार बताते हैं कि इस कोष के बड़े हिस्से से राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है और इसका न के बराबर हिस्सा (दस से बारह प्रतिशत) अपने सही उपयोग में लाया जाता है. वहीं, कुछ अन्य सूत्र; किसी उचित नियंत्रण व्यवस्था के अभाव में इस राशि के इस्तेमाल में बड़े हेरफेर की आशंका से इनकार नहीं करते.

शायद यही कारण है कि बीते महीने राजस्थान में इस संस्थान की जिला और राज्य स्तर पर अध्यक्षता में बदलाव किया गया है. पहले डीएमएफटी से जुड़े सभी अधिकार जिला प्रमुख और मुख्य सचिव के पास होते थे. लेकिन अब इस न्यास की देखरेख जिला स्तर पर कलेक्टर और प्रदेश स्तर पर खान मंत्री किया करेंगे.

क्रेडिट : राजस्थान पत्रिका
क्रेडिट : राजस्थान पत्रिका

इन तमाम निराशाजनक परिस्थितियों के बावजूद प्रदेश के अधिकतर प्रशासनिक और सरकारी प्रतिनिधियों का पूरा जोर सिर्फ़ एक दुर्भाग्यपूर्ण उपलब्धि पर अपनी पीठ थपथपाने पर रहता है कि बीते कुछ वर्षों के दौरान वे बड़ी संख्या में सिलिकोसिस मरीजों की शिनाख़्त करने में सफल रहे हैं. लेकिन हमें किसी भी स्तर पर इस साधारण सी लेकिन मूल बात का जवाब नहीं मिल पाता कि कारखानों और खदानों में जाने वाले कामगारों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस मानक तय क्यों नहीं किए जाते और जो पहले से तय हैं उनका पालन सुनिश्चित करवाने में ढिलाई क्यों बरती जाती है?

इस बारे में शंकर सिंह कहते हैं, ‘इन विभागों (खनन और श्रम व रोजगार) में भ्रष्टाचार का स्तर कल्पना से परे पहुंच चुका है. इसलिए नियमों की परवाह किसी को नहीं. सिंह जानकारी देते हैं, ‘कारखानों में पत्थर घिसाई करते समय कामगार के मास्क लगाने और पानी के फव्वारे के इस्तेमाल के निर्देश हैं ताकि बुरादा उड़ने के बजाय नम होकर वहीं बैठ जाए. लेकिन राज्य में शायद ही कहीं इसका पालन होता होगा. नियमों के नाम पर जो थोड़ी बहुत खानापूर्ति होती भी है, उससे बचने के लिए कारखाना मालिकों ने मजदूर को नौकरी के बजाय ठेका देना शुरु कर दिया है. लिहाजा कामगार पत्थर को घर ले आता है और वहां बैठकर उसकी घिसाई करता है. इसके चलते जो ख़तरा अभी तक उस अकेले की जान को था, वह पूरे परिवार पर मंडराने लगता है.’

वहीं, खदानों के मामलों में तो प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी और विभागीय पेचीदगियों ने मिलकर और विकराल रूप ले लिया है. राणा सेन गुप्ता इस बारे में तफ़सील से बताते हैं, ‘माइन्स एक्ट-1952 के तहत जब शुरुआत में राज्य सरकारें खुद खनन कार्य करती थीं तब तक व्यवस्था में थोड़ी-बहुत पारदर्शिता बनी रही. लेकिन अस्सी के दशक के आस-पास जब राज्यों ने खदानों को लीज़ (पट्टे) पर देना शुरु किया, तब से व्यवस्थाएं ऐसी चरमराईं कि आज तक संभालने में नहीं आ पा रहीं. सरकार की शह पर अधिकारियों ने या तो घूस लेकर या फिर लॉटरी सिस्टम से खदानों का आवंटन शुरू तो कर दिया, लेकिन इस तरफ़ ध्यान ही नहीं दिया कि आवेदनकर्ता खदान चला पाने के लिए आवश्यक मापदंडों पर खरा उतरता है भी या नहीं!’

गुप्ता आगे जानकारी देते हैं, ‘कोई भी खान चलाने के लिए सबसे पहले खान सुरक्षा महानिदेशालय (डीजीएमएस) भारत सरकार द्वारा प्रमाणित एक प्रबंधक की नियुक्ति आवश्यक है, जो उस खदान के प्रबंधन, सुरक्षा मानकों की सुनिश्चितता और वहां काम करने वाले कामगारों के स्वास्थ्य से जुड़ी विस्तृत जानकारी संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध करवाता है. लेकिन राजस्थान की करीब तैतीस हजार खदानों में से महज तीन हजार खदानों में ही ये प्रबंधक मौजूद हैं. इस बारे में जब राज्य से पूछा जाता है तो जवाब मिलता है कि उनका काम सिर्फ पट्टा देना है, खान चलाने से जुड़े नियमों की जांच और उनकी अनुपालना करवाना नहीं. इसकी जिम्मेदारी तो केंद्र के अधीन है.

यदि कभी-कभार डीजीएमएस अधिकारियों को नियमविरुद्ध चल रही खदानों की जानकारी मिल भी जाती है तो वे सिर्फ काग़जी खानापूर्ति कर के इतिश्री कर लेतेे हैं. इसके पीछे उनकी दलील होती है कि चूंकि खदान राज्य ने आवंटित की है, इसलिए उस पर आगे की कार्यवाही, जैसे- दंडित, पाबंद या बंद करने का अधिकार भी सिर्फ़ राज्य के ही पास है. गौर करने वाली बात यह है कि राज्य को डीजीएमएस की इस कार्यवाही की सूचना देने का काम खदान प्रबंधक का होता है, जो अधिकतर खदानों में पहले ही नदारद है. यानी लगता है कि यहां पूरे कुएं में ही भांग पड़ी हुई है.’

नाम न छापने की शर्त पर एक खदान मालिक की बातें गुप्ता के दावों से मेल खाती दिखती हैं. उनके शब्दों में, ‘छह साल से हमारे पास खान का पट्टा है. कभी-कभार कोई आ धमकता है तो कुछ ले-देकर मामला शांत हो जाता है. लेकिन प्रबंधक वाली बात हमें पता ही नहीं थी!’ राजस्थान की पिछली भाजपा सरकार (2013-18) के समय उजागर हुआ कथित पैंतालीस हजार करोड़ का खान घोटाला; न सिर्फ इस खदान मालिक की बातों को सही घोषित करता है, बल्कि प्रदेश में खान विभाग की असलियत भी उधेड़ कर सामने ला देता है.

राजस्थान मानवाधिकार आयोग के पूर्व सदस्य डॉ एमके देवराजन इस पूरी स्थिति के लिए केंद्रीय विभागों को भी जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं, ‘डीजीएमएस के अधिकारियों की बेहद कम संख्या इन हालात के लिए कोढ़ में खाज का काम करती है.’ देवराजन की मानें तो पूरे राजस्थान की खदानों की मॉनिटरिंग के लिए सिर्फ दो अधिकारी नियुक्त हैं.

इस बदहाली से बचने के लिए ‘राष्ट्रीय श्रमिक संगठन’ के प्रमुख नेता असीम रॉय सत्याग्रह के जरिए कुछ अहम सुझाव सामने रखते हैं. वे कहते हैं कि प्रत्येक खनन कामगार के लिए यूनीक नंबर वाली डिजिटिल आईडी बनवाना आवश्यक है, जिसे समय-समय पर अपडेट किया जाता रहे. हर छह महीने में कामगार के स्वास्थ्य की जांच करवाई जाए ताकि बीमारी शुरुआती चरण में ही पकड़ में आ सके. साथ ही सिलिकोसिस के मरीजों का डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जाए. जो खान मालिक ऐसा न करे उस पर कड़े दंड लगाने के प्रावधान तय किए जाएं.’

इन प्रस्तावों को राणा सेन गुप्ता आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘मजदूरों की जानकारी के साथ उसके खदान या कारखाना मालिक की जानकारी भी स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड करने के प्रावधान होने चाहिए. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि यह सूचना राज्य और केंद्र; दोनों श्रम विभागों तक भी पहुंच सके ताकि दोषी पाए जाने पर खान मालिकों पर जल्द से जल्द कार्यवाही की जा सके. इसके लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद बेहद कारगर साबित हो सकती है.’ इसके अलावा गुप्ता राजस्थान में माइनिंग रूल्स में संशोधन करने के साथ माइन वर्कर्स वेलफेयर एंड रेगुलेटरी कमीशन बनाने की भी सलाह देते हैं. वे कहते हैं, ‘लोगों की जान लेने के बाद, मुआवजे के नाम पर खिलवाड़ करने से बेहतर है कि सिलिकोसिस की रोकथाम ही कर दी जाए.’