1988 का किस्सा है. नामवर सिंह के साठ वर्ष पूरे करने पर वाराणसी में प्रगतिशील लेखक संघ का एक आयोजन था. आखिर में बाबा नागार्जुन बोले. कहा, ‘अपने देश में आम जनता तक बातों को ले जाने की दृष्टि से, पुस्तकों से दूर कर दिए गए लोगों तक विचारों को पहुंचाने के लिए लिखना जितना जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी है बोलना. स्थापित विश्वविद्यालयों की तुलना में यह जंगम (चलता-फिरता) विद्यापीठ ज्यादा जरूरी है. नामवर इस जंगम विद्यापीठ के कुलपति हैं.’

वास्तव में नामवर सिंह हिंदी आलोचना की वाचिक पंरपरा के आचार्य थे. वह वाचिक परंपरा जिसकी लीक कबीर, नानक और दादू जैसे नामों ने गढ़ी है. अपने एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन लिखते हैं, ‘उन्होंने हिंदी के खेतों को सींचा है. उन्होंने दूरदराज के क्षेत्रों में यात्राएं कीं, लोगों और लेखकों से मिलते रहे, रचना और आलोचना का मोल समझाते रहे. एकांत साधना जैसी कोई चीज़ उनकी जीवन शैली या विचार शैली में नहीं रही.’ प्रियदर्शन आगे लिखते हैं कि नामवर सिंह लगातार संवादरत आलोचक थे जिन्होंने लिखने से ज्यादा बोलकर यश कमाया.

माना जाता है कि नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना को उसके किताबीपन और अकादमिक उलझावों से मुक्त किया. उसे आम पाठकों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई. वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी यह भी मानते हैं कि बहुत कुछ उनके कारण ही आलोचना हिंदी में हाशिये का मामला न रहकर केंद्र में आई.

नामवर सिंह एक लिहाज से हिंदी के ब्रांड एंबेसडर थे. जैसा कि एक लेख में वरिष्ठ साहित्यकार मंगलेश डबराल लिखते हैं, ‘प्रगतिशील-प्रतिबद्ध साहित्य का एजेंडा तय करने का काम हो या ‘आलोचना’ के संपादक के तौर पर साहित्यिक वैचारिकता का पक्ष या जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में प्रोफ़ेसरी, सबमें उनका कोई सानी नहीं था.’ उनके मुताबिक नामवर सिंह का पढ़ाने का तरीका शुष्क और किताबी नहीं, बल्कि इतना प्रभावशाली होता था कि उनकी ही नहीं, दूसरी कक्षाओं के छात्र भी उन्हें सुनने आ जाते थे. मंगलेश डबराल लिखते हैं, ‘जेएनएयू के हिंदी विभाग की धाक काफी समय तक बनी रहने का श्रेय नामवरजी को ही जाता है जिन्होंने विभाग की बुनियाद भी रखी थी.’

इस मेधा के बावजूद नामवर सिंह ने विद्वता के आतंक को हमेशा परे रखा. जैसा कि प्रियदर्शन लिखते हैं, ‘हिंदी के बहुत सारे युवा लेखकों का अनुभव यह होगा कि उनके लेख पढ़ कर, उनकी कविता पढ़ कर, नामवर सिंह ने उन्हें फोन किया.’ उनकी बौद्धिक सक्रियता ने उनको सतत समकालीन बनाए रखा.

नामवर सिंह पर मार्क्सवाद का गहरा असर था. वे उसे अध्ययन और चिंतन की पद्धति, समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने वाले मार्गदर्शक सिद्धांत और जीवन व समाज को मानवीय बनाने वाला सौंदर्य सिद्धांत मानते थे. मार्क्सवादी होने के नाते उन्होंने आलोचना को भी स्वीकार किया. खूब हमले किए तो झेले भी.

एक लिहाज से नामवर सिंह का जाना साहित्य की तीसरी परंपरा का अवसान भी कहा जा सकता है. पहली परंपरा आचार्य रामचंद्र शुक्ल की, दूसरी आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की और तीसरी नामवर सिंह की. अपनी एक फेसबुक पोस्ट में चर्चित पत्रकार हेमंत शर्मा लिखते हैं, ‘नामवर आचार्य हज़ारी प्रसाद जी को गुरू मानते थे. एक बार द्विवेदी जी से पूछा गया. आपकी सर्वश्रेष्ठ कृति कौन सी है. द्विवेदी जी ने कहा नामवर सिंह.’