नामवर सिंह का देहावसान एक ऐसे शिखर व्यक्ति का देहावसान है जिसने एक लंबा पूर्णकाम जीवन जिया, जिसमें भौतिक आकांक्षा कम थी और बौद्धिक आकांक्षा बड़ी और प्रबल. वे उन बिरले लेखकों में से थे जिन्होंने बुद्धि, विचार, समाज और साहित्य के क्षेत्रों में लगभग समान अधिकार से विचरण किया. उनका निधन साहित्य, आलोचना, विद्वत्ता और हिन्दी लोकवृत्त सब की एक साथ क्षति है. शायद ही किसी और भारतीय भाषा में किसी आलोचक को ऐसी केंद्रीयता मिली हो जैसी कि हिन्दी में नामवर सिंह को.

नामवर जी ने जीवन भर साहित्य और समाज के अनिवार्य सम्बन्ध पर आग्रह करने और साहित्य को एक सामाजिक संस्था बताने और उसके सामाजिक महत्व को स्वीकार कराने का अथक यत्न किया. साहित्य की समझ और संवेदना के लिए हिन्दी लोकवृत्त को सजग-सक्रिय करने के लिए उनके अवदान को हमेशा कृतज्ञतापूर्वक याद किया जायेगा. नामवर जी ने लिखा कम, बोला अधिक. आलोचना को हमारे समय में, किसी हद तक, सामूहिक प्रयास बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है. उनकी पुस्तक-पगी आंखें कभी नया से नया पढ़ने-गुनने से थकी नहीं. वयोवृद्ध तथा अशक्त होकर भी वे साहित्य के अपने गहरे अनुराग से कभी विरत नहीं हुए.

साहित्य को सामाजिक और राजनैतिक वृत्तियों से सहज ही जोड़ पाने की नामवर सिंह की क्षमता अद्भुत और अचूक थी. शायद ही दूसरा कोई दूसरा आलोचक हिन्दी में हुआ है जो संस्कृत, प्राकृत, मध्यकालीन साहित्य, आधुनिक और समकालीन साहित्य में समान अधिकार से, उन्हें निरन्तरता में देखता हुआ, विचरता रहा हो. उनकी विद्वत्ता गहरी थी पर वह कभी उन पर या दूसरों पर बोझ नहीं बनी. उनकी मार्क्सवाद में गहरी निष्ठा थी पर उससे वे जब-तब आत्मविश्वास के साथ विचलन भी करते रहे. उनकी दृष्टि और रुचि में कई बार द्वन्द्व होता था. उन पर अवसरवादी होने के कारण भी लगे पर उन्होंने कोई परवाह नहीं की और न ही अपनी राह बदली.

नामवर सिंह उन थोड़े से हिन्दी मूर्धन्यों में रहे हैं जिनकी अखिल भारतीय प्रतिष्ठा अैर उपस्थिति रही है: इसमें वे अज्ञेय, मुक्तिबोध, निर्मल वर्मा के साथ खड़े नज़र आते हैं. हिन्दी में सार्वजनिक बुद्धिजीवी कम हैं और नामवर सिंह दशकों से उनमें से एक थे. उनकी प्रभावशाली वाग्मिता अब किंवदन्ती की तरह याद की जायेगी. हिन्दी आलोचना को उसकी अकादेमिक बोझिलता और व्यर्थ के वाग्जाल से मुक्त कराने में नामवर-कोशिश की अलग जगह रहेगी. हिन्दी साहित्य के अध्यापन में भी उन्हें एक मानदण्ड के रूप में याद किया जायेगा.

नामवर सिंह एक अच्छे आलोचक की तरह विवादास्पद और विवादप्रिय थे. उनके एकछत्र आधिपत्य के विरुद्ध आवाज़ उठाने की कोशिश करने वालों में से मैं भी एक था. बल्कि उनसे विवादरत होने के अब तीनेक दशक हो गये. पर उन्होंने कभी ऐसा अहसास नहीं होने दिया कि उन्होंने इसका बुरा माना है. कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, कृष्णा सोबती के बाद नामवर अवसान से हिन्दी साहित्य में मूर्धन्यता लगभग लोप के कगार पर पहुंच गयी है.