दक्षिण के पांच राज्यों - तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना में लोक सभा की 129 सीटें हैं. इनमें भाजपा ने 2014 में 21 सीटें जीती थीं. इस बार भाजपा इस आंकड़े को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने की उम्मीद कर रही है. उम्मीद की वजह यह है कि उत्तर भारत के राज्यों में उसके लिए स्थितियां चुनौतीपूर्ण हुई हैं. इसके चलते उसकी सीटों का आंकड़ा कम होने के अनुमान लगाए जा रहे हैं. दक्षिण से भाजपा की यह उम्मीद पूरी होगी या नहीं यह तो चुनाव नतीज़े ही बताएंगे लेकिन इस उम्मीद की कुछ वज़हें ज़रूर हैं, जिनका जायज़ा लिया जा सकता है.

1. तमिलनाडु (39 सीटें) :

तमिलनाडु में पिछली बार (2014 में) भाजपा कुछ छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी. इनमें एस रामदौस की पीएमके (पट्‌टाली मक्कल काची) और अभिनेता से नेता बने विजयकांत की डीएमडीके (देसीय मुरपोक्कू द्रविड़ार कड़गम) प्रमुख थीं. इस गठबंधन में भाजपा को छह सीटें मिलीं. इनमें से उसने सिर्फ एक सीट (कन्याकुमारी) जीती. वह तीन सीटों- वेल्लोर, कोयंबटूर, पोल्लाची पर दूसरे नंबर पर रही. एक सीट पीएमके को मिली. लेकिन उसने कुछ समय बाद भाजपा का साथ छोड़ दिया था.

तमिलनाडु में उस समय स्थितियां अलग थीं. राज्य की राजनीति के दो करिश्माई नेता- एम करुणानिधि और जयललिता जीवित थे. दोनों अपनी पार्टियों डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) और एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) की अगुवाई कर रहे थे. तब तक हर बार की तरह मतदाता भी इन्हीं दोनों में से किसी एक का एकतरफा चुनाव कर रहे थे. इसीलिए उन्होंने 2014 में एआईएडीएमके को 37 सीटें जिताईं. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं.

करुणानिधि और जयललिता का निधन हो चुका है. डीएमके की कमान करुणानिधि के पुत्र एमके स्टालिन के हाथ में है, जो अपने पिता जैसे करिश्माई नेता नहीं माने जाते. उन्हें उनके बड़े भाई एमके अलागिरी ही चुनौती देते रहते हैं. ऐसे ही एआईएडीएमके की कमान उपमुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम और मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी मिलकर संभाल रहे हैं. वे भी पार्टी की पूर्व प्रमुख जयललिता की तरह करिश्माई नहीं हैं. तिस पर उन्हें पार्टी के पूर्व उपमहासचिव और जयललिता की खास सहयोगी रहीं वीके शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरण की पार्टी- एएमएमके (अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम) से भी सीधे चुनौती मिलने की संभावना है, जो 38 सीटों पर प्रत्याशी खड़े कर रही है.

दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुपरसितारा रजनीकांत ने अपनी पार्टी को लोक सभा चुनाव में न उतारने का ऐलान कर दिया है. वहीं एक अन्य अभिनेता कमल हासन भी राज्य की राजनीति में उतरने के बाद कुछ ख़ास असर छाेड़ पाए हों ऐसा लगता नहीं है. इन्हीं स्थितियों को भाजपा फिलहाल अपने लिए मुफ़ीद मान रही है. तिस पर लगभग पूरे देश में अपना अलग जनाधार बना चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में मौज़ूद करिश्माई चेहरा भाजपा का अतिरिक्त लाभांश भी है. शायद इसीलिए एआईएडीएमके ने भी पहली बार अपनी बरसों पुरानी नीति से हटते हुए भाजपा के साथ चुनावपूर्व गठबंधन किया है और उसे पांच सीटें दी हैं. इस गठबंधन में पीएमके भी है. वह सात सीटों पर चुनाव लड़ रही है. बाकी 27 सीटों पर एआईएडीएमके लड़ेगी.

इस गठबंधन से किसके मंसूबे कितने पूरे होंगे यह तो आने वाला वक़्त बताएगा. पर मौज़ूदा और बीते वक़्त ने जो बताया है उसे यहां थोड़ा याद रखा जा सकता है. इसमें पहली बात तो यही कि तमिलनाडु की 39 में से 38 सीटें (37 एआईएडीएमके और एक भाजपा) इस समय भाजपा के साथ ही हैं. क्योंकि मौज़ूदा लोक सभा में पूरे पांच साल एआईएडीएमके गठबंधन के बिना भी भाजपा के साथ ही रही है. और दूसरी बात ये कि तमिलनाडु लंबे समय से दो पार्टियों के बीच चुनाव नतीज़ों की अलटी-पलटी करने वाले राज्यों में गिना जाता है.

2. कर्नाटक (28 सीटें) :

सीटों के लिहाज़ से दक्षिण में कर्नाटक दूसरा बड़ा राज्य है और यही वह इकलौता राज्य भी है जहां भाजपा अपना मजबूत जनाधार बना चुकी है. उसने 2014 में यहां 17 सीटें जीती थीं. जबकि आठ सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. बीते साल हुए विधानसभा चुनाव में भी उसे 104 सीटें मिलीं और वह विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी. हालांकि राज्य की सरकार में वह नहीं है. वहीं जो जेडीएस (जनता दल-सेकुलर)-कांग्रेस मिलकर सरकार चला रही हैं वे और उनके नेता आपस में अब तक समन्वय ही नहीं बिठा पाए हैं.

आलम ये है कि अभी 25 फरवरी को कांग्रेस के नेता और राज्य के उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वरा ने एक बयान देकर नया विवाद खड़ा कर दिया है. इसमें उन्होंने कहा है, ‘मैं दलित होने की वजह से तीन बार कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनने से रह गया. मैं आज प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के तौर पर काम कर रहा हूं लेकिन इस पद से संतुष्ट नहीं हूं. यही नहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी इसी वज़ह से यह पद हासिल नहीं कर सके. उनके अलावा पीके बासवलिंगप्पा, केएच रंगनाथ को भी दलित होने के कारण मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंचने दिया गया.’

जी परमेश्वरा को कांग्रेस के ही नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के विरोधी खेमे का नेता माना जाता है. इतना ही नहीं. सिद्धारमैया के साथ जेडीएस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा तथा उनके मुख्यमंत्री पुत्र एचडी कुमारस्वामी का टकराव भी जगजाहिर है. कांग्रेस के दो अन्य नेताओं डीके शिवकुमार और रमेश जरकीहोली भी अक्सर आमने-सामने नज़र आते हैं. इन टकरावों का असर ये हुआ है कि अब तक किसी को भरोसा नहीं हो पा रहा है कि एचडी कुमारस्वामी की जेडीएस-कांग्रेस सरकार साल पूरा कर पाएगी या नहीं.

इतना ही नहीं जेडीएस-कांग्रेस के बीच अब तक राज्य की लोक सभा सीटों के बंटवारे पर भी सहमति नहीं बनी है. हालिया ख़बर के मुताबिक जेडीएस ने राज्य की 12 लोक सभा सीटों पर अपनी दावेदारी जताई है. जबकि कांग्रेस उसे छह-आठ सीटों से ज़्यादा नहीं देना चाहती. यानी ऐसे तमाम कारण हैं जिनके मद्देनज़र भाजपा कर्नाटक से अपने लिए दो लक्ष्य लेकर चल रही है. पहला- मौका मिलते ही राज्य में किसी न किसी तरह अपनी सरकार बनाना. दूसरा- लोक सभा चुनाव में राज्य की 28 में से 22 सीटें जीतना.

3. आंध्र प्रदेश (25 सीटें) :

यहां भाजपा 2014 में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ चुनाव लड़ी थी और उसने दो सीटों- विशाखापट्‌टनम और नरसापुरम पर जीत हासिल की थी. जबकि तिरुपति और राजमपेट में वह दूसरे नंबर पर रही. लोक सभा के साथ विधानसभा चुनाव में भाजपा-टीडीपी को सफलता मिली. दोनों पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई. लेकिन अब यहां सियासी समीकरण पूरी तरह बदले हुए हैं. केंद्र सरकार पर आंध्र प्रदेश काे विशेष राज्य का दर्ज़ा न देने का आरोप लगाते हुए टीडीपी ने पिछले साल फरवरी-मार्च में भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया था. इसके बाद भाजपा भी टीडीपी के नेतृत्व वाली आंध्र प्रदेश सरकार से हट गई.

मौज़ूदा स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उनकी टीडीपी आगामी चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करना चाहती है. लेकिन बीते साल के आख़िर में हुए तेलंगाना विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियों का गठबंधन प्रयोग विफल रहने के बाद कांग्रेस इससे बच रही है. वहीं नायडू क्षेत्रीय दलों के मोर्चे की धुरी बनने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन यह कोशिश भी अब तक फलीभूत नहीं हुई है. उनके पांच साल के कामकाज को लेकर इस बार वैसा माहौल भी नहीं दिखता जैसा संयुक्त आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर उनके पहले के कार्यकाल में बना था. यानी सीधे शब्दों में कहें तो चंद्रबाबू नायडू ख़ुद को बहुत सुरक्षित स्थिति में नहीं पा रहे हैं.

यही आंध्र प्रदेश में भाजपा के लिए उम्मीद की किरण है. वह राज्य की मुख्य विपक्षी और दूसरी सबसे मज़बूत पार्टी- वाईएसआर कांग्रेस से बीते दो-तीन साल से तालमेल बिठाकर चल रही है. इसके कई प्रमाण हैं. मसलन- इस पार्टी के मुखिया जगनमोहन रेड्‌डी हैं. उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप हैं और वे ज़मानत पर जेल से बाहर हैं. फिर भी केंद्रीय जांच एजेंसियों की निगाह उन पर वैसी तिरछी नहीं हुई है जैसी भाजपा विरोधी अन्य दलों पर अक्सर होती रहती है. इसके बदले में जगन मोहन भी अंदरखाने भाजपा की लगातार कई बार मदद कर चुके हैं. इसीलिए भाजपा को लगता है कि उनकी यह मदद आगामी चुनावों में भी बनी रहेगी और ज़रूरत पड़ी तो उसके बाद भी.

4. केरल (20 सीटें) :

केरल दक्षिण का ऐसा राज्य है जहां भाजपा को अब तक काेई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली है. यहां दशकों से कांग्रेस और वाम दलों के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच ही मुकाबला होता आया है. देशभर में नरेंद्र मोदी की लहर के बावज़ूद भाजपा यहां 2014 में एक भी सीट नहीं जीत पाई. कांग्रेस नेता और विदेश राज्य मंत्री रहे शशि थरूर के ख़िलाफ़ तिरुवनंतपुरम में ज़रूर भाजपा दूसरे नंबर पर रही. हालांकि इस बीच धीरे-धीरे ही सही पर भाजपा ने यहां अपना मत प्रतिशत लगातार बढ़ाया है.

इसके अलावा सबरीमला के प्रसिद्ध भगवान अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद ने केरल में भाजपा को नई ऊर्जा देने का काम किया है. इस मामले में भाजपा मंदिर की परंपरा मानने वालों का साथ दे रही है क्योंकि यह मसला स्थानीय लोगों को गहरे तक छूता है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य की वाम गठबंधन सरकार ने सबरीमला मंदिर में पुलिस के जोर पर महिलाओं का प्रवेश सुनिश्चित कर दिया है. फिर भी भाजपा को लगता है कि वह इस मुद्दे के बलबूते आगामी लोक सभा चुनाव में अपना मत प्रतिशत दो-तीन फ़ीसदी तो बढ़ा ही लेगी. और इसके दम पर शायद राज्य की एक-दो सीटें भी उसके ख़ाते में आ जाएं.

5. तेलंगाना (17 सीटें) :

लोक सभा सीटों के लिहाज़ से तेलंगाना दक्षिण का सबसे छोटा राज्य है. लेकिन अहमियत के हिसाब से यह भाजपा के लिए काफ़ी मायने रखता है. 2014 की बात करें तो भाजपा का यहां से सिर्फ एक सीट- सिकंदराबाद पर जीत मिली थी. जबकि हैदराबाद में वह दूसरे नंबर पर थी. लेकिन इस बार उसे उम्मीद है तो इसकी सबसे बड़ी वज़ह सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और उसके मुखिया तथा राज्य के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) हो सकते हैं. हालांकि सीधे तौर पर टीआरएस और भाजपा के बीच समझौता होने की गुंज़ाइश कम ही दिखती है. लेकिन जिस तरह से केसीआर का अब तक बर्ताव रहा है या होने की संभावना है उसे देखकर उनके बारे में अटकलें लगाई जाती हैं कि केसीआर भाजपा के मददग़ार हो सकते हैं.

इसके दो-तीन कारण हैं. पहला- बीते साल जब केसीआर ने राज्य में समय से पहले विधानसभा चुनाव कराने की कोशिश की तो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इसमें उनकी पूरी मदद की थी, ऐसा कहा जाता है. केसीआर का यह दांव काम आया और वे दोबारा राज्य की सत्ता में लौटे. फिर केसीआर ने क्षेत्रीय दलों का मोर्चा बनाने की कोशिश की. हालांकि यह कोशिश सफल नहीं हुई पर कहा यही गया कि इस तरह केसीआर देश में अधिकांश जगहों पर त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बनाकर भाजपा काे लाभ पहुंचाना चाहते हैं. फिर अब ख़बर है कि केसीआर आने वाले चुनाव में आंध्र प्रदेश में अपनी पार्टी- टीआरएस के उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं. इससे आंध्र में वोट बंट सकते हैं और इसका कुछ फ़ायदा जगनमोहन और थोड़ा भाजपा को हो सकता है.