कंगना रनोट से जुड़ी पिछली बड़ी खबर यह थी कि उन पर बायोपिक बनने जा रही है. वे एक छोटे कस्बे से निकलकर मायानगरी में जिस मुकाम तक जिस तरह से पहुंची हैं, उनकी संघर्षगाथा बहुतों को प्रेरणा देने वाली हो सकती है. लेकिन इस खबर में ध्यान देने वाली बात यह है कि खुद पर बनने वाली इस फिल्म का निर्देशन कंगना खुद ही करने वाली हैं. अगर उनके इस इरादे की तुलना किसी राजनीतिक शख्सियत के व्यवहार से की जाए तो बड़ी आसानी से बसपा प्रमुख मायावती का नाम सामने आ सकता है. कंगना रनोट जहां खुद पर फिल्म बनाने जा रही हैं, वहीं मायावती जहां-तहां अपनी मूर्तियां लगवाने का कारनामा कर चुकी हैं. बहनजी को खुद को पार्टी के एकमात्र चेहरे की तरह पेश करने और पार्टी में जरा भी चुनौती बन सकने वाले को किनारे लगाने के लिए भी जाना जाता है. उधर पिछले दिनों कंगना से जुड़ी एक अपुष्ट खबर यह चर्चा में रही कि अपनी आने वाली फिल्म ‘मेंटल है क्या’ के लिए वे केवल अपने सोलो पोस्टर्स शूट किए जाने मांग कर रही हैं. लेकिन मायावती और कंगना रनोट के बीच समानताओं का अंत यहीं नहीं होता.

पिछले कुछ समय से कंगना जिन वजहों को लेकर चर्चा में रही हैं, उससे कई लोगों को इस बात का इशारा मिल सकता है कि वे कहीं न कहीं अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रही हैं. मामला चाहे ‘मणिकर्णिका’ में बाकी कलाकारों की भूमिकाएं कटवाने का हो या इंड्स्ट्री के दूसरे लोगों पर एक दिन में तीन की दर से वजह-बेवजह नाराज होने का. आलिया भट्ट और शबाना आज़मी कंगना की नाराजगी के सबसे नये शिकारों में शामिल हैं. कई लोगों का मानना है कि असुरक्षा की इसी तरह की चादर में मायावती भी हमेशा लिपटी नज़र आती हैं और अपने घेरे में बैठकर अपनी सुविधा से अपने प्रतिद्वंद्वी चुनती हैं और उन पर ज़ुबानी वार करती रहती हैं. राजनीति के जानकार बताते हैं कि गेस्टहाउस कांड के चलते, और खास तौर पर अपने राजनीतिक गुरू कांशीराम की मृत्यु के बाद से, मायावती उतना खुलकर हमारे सामने नहीं आती हैं, जितनी हिम्मती राजनेता वे पहले हुआ करती थीं.

कंगना रनोट और मायावती की अगली समानता पर आएं तो खुद पर लगने वाले आरोपों के जवाब में ये दोनों अक्सर अपना विक्टिम कार्ड आगे कर देती हैं. मायावती खुद के खिलाफ कुछ भी किये जाने को एक दलित महिला पर होने वाला अत्याचार बताती हैं, और कंगना अक्सर अपने ऊपर लगने वाले आरोपों की तुलना महिलाओं की आवाज बंद किए जाने की कोशिश से करती हैं. या फिर वे इसकी वजह फिल्म उद्योग में अपने बाहरी होने को बताती हैं.

कंगना रनोट और मायावती के बारे में एक और बात कुछ-कुछ एक जैसी है - लंबे समय तक अपने-अपने कार्यक्षेत्रों की जिन कमियों की ये दोनों शिकायतें करती रहीं हैं, खुद को मौका मिलने पर इन्होंने उससे अलग कुछ नहीं किया. अपने पूरे जीवन सामंतवाद और मनुवाद का विरोध करने वालीं मायावती के बारे में यह लगभग सभी जानते हैं कि एक आम दलित व्यक्ति के लिए उन तक पहुंचना लगभग नामुमकिन है. वहीं महिलाओं की आजादी और खुदमुख्तारी की बात करने वाली कंगना एक मुकाम पर पहुंचने के बाद भी एक निर्देशक द्वारा किए गए कथित यौन शोषण को चुपचाप सह जाती हैं. मायावती के बारे अक्सर कहा जाता है कि जब भी उन्हें मौका मिला उन्होंने दलितों के लिए प्रतीकों से आगे बढ़कर वैसा कुछ नहीं किया जैसा उनके लिए न किये जाने की शिकायत वे हमेशा करती रही हैं. वहीं फिल्म उद्योग पर तरह-तरह के भेदभाव के आरोप लगाने वालीं कंगना रनोट को जब मणिकर्णिका में निर्देशन का मौका मिला तो उन पर अपने साथी कलाकारों के रोल काटने के आरोप लग गये.

कंगना रनोट और मायावती में एक और समानता यह ढूंढ़ी जा सकती है कि दोनों को अपने परिवार पर अति का भरोसा करने के लिए भी जाना जाता है. भाई-भतीजावाद की राजनीति को लेकर समाजवादी पार्टी पर हमेशा हमलावर रहीं मायावती की पार्टी में दूसरी पंक्ति का नेतृत्व कभी खड़ा ही नहीं किया गया. और जब-जब इस तरह की बात चली तो उनके भतीजे आकाश आनंद का नाम ही सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. दूसरी तरफ कंगना रनोट की सारी व्यावसायिक जिम्मेदारियां उनकी बहन रंगोली ही उठाती हैं. रंगोली न सिर्फ कंगना की मैनेजर हैं बल्कि उनके बयानों और आरोपों के लिए भी सोशल मीडिया पर उनका बचाव करती देखी जा सकती हैं.

इन दोनों महिलाओं में सबसे महत्वपूर्ण एक समानता यह है कि दोनों ने ही खुद को अपने हाथों से गढ़ा है और बहुत मेहनत और हिम्मत से फ़र्श से अर्श तक का सफ़र तय किया है. उनकी असुरक्षा और आत्मकेंद्रित होने की वजह उनका बार-बार बुरे अनुभवों से गुजरना भी हो सकता है. इसके बावजूद इस समय, दोनों ही अपने करियर की सफलता के चरम पर हैं. मायावती के बारे में जहां उनके अगला प्रधानमंत्री हो सकने की अटकलें लगाई जा रही हैं, वहीं कंगना रनोट इस वक्त निर्विवाद बॉलीवुड की क्वीन यानी हिंदी फिल्म उद्योग की सबसे प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में से एक हैं.

पिछले दिनों कंगना रनोट ने एक समाचार चैनल द्वारा आयोजित कॉनक्लेव में जमकर देशप्रेम की बातें की थीं. महिलाओं के साथ गाय की रक्षा किए जाने की बात भी वे खुलकर कह चुकी हैं. इसके अलावा उनके द्वारा निर्देशित मणिकर्णिका देखते हुए भी उनके राजनीतिक रुझान का अंदाजा लग जाता है. तो क्या वे भविष्य में अभिनेत्री से जननेत्री बनने की तरफ कदम बढ़ाने वाली हैं! अगर ऐसा होता है तो उनमें और मायावती में एक और समानता बढ़ जाएगी.