अगर आप मध्यमवर्गीय छोटे निवेशक हैं तो आपने एक बात पर गौर किया होगा. इन दिनों बैंक एजेंट्स या ब्रोकर्स के वे फोन आने बंद या कम हो गए हैं जिनमें आपसे म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने का इसरार किया जाता था. ये सभी आपको इक्विटी से जुड़े फंड्स की विशेषताएं बताते थे और उनके लंबे चौड़े रिटर्न का गुणा-गणित समझाते थे. आल इंडिया म्यूचुअल फंड एसोसिएशन की ओर से दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में म्यूचुअल फंड्स में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए पंचलाइन है –‘म्यूचुअल फंड (एमएफ) सही है’. लेकिन अगर फंड बाजार के आंकड़ों पर गौर करें तो नजर आता है कि इनमें निवेश की हालत सही नहीं है.

एसोसिएशन आफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया के ( एएमएफआई) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्त वर्ष के शुरुआती नौ महीनों में एसआईपी (सिस्टमेटिक इंवेस्टमेंट प्लान) के जरिये आने वाला शुद्ध निवेश प्रवाह यानी नेट इन्फ्लो 61 फीसदी घटा है. इस दौरान नई एसआईपी शुरू करने वालों की संख्या 85.16 लाख रही. वहीं एसआईपी बंद करने वालों का आंकड़ा रहा 42.67 लाख. इससे पिछले साल यानी 2017-18 में ये आंकड़े क्रमश: 116.41 और 34.83 लाख थे. जाहिर है कि 2017-18 के मुकाबले 2018-19 में नए एसआईपी करने वालों की संख्या तेजी से घटी. साथ ही एसआईपी बंद करने वाले भी बढ़े. इस तरह नेट इनफ्लो करीब 61 फीसद घट गया.

एसआईपी को इक्विटी लिंक्ड (शेयर बाजार से जुड़े) म्यूचुअल फंड में निवेश का सबसे बेहतर जरिया समझा जाता है. इसमें हर माह एक तय रकम निवेश की जाती है. माना जाता है कि इससे शेयर बाजार की अस्थिरता से निवेशक काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं और उन्हें अपने निवेश का औसत रिटर्न मिल जाता है. म्यूचुअल फंड्स बाजार में आना वाला बड़ा निवेश एसआईपी के जरिये ही आता है. जाहिर है कि इसमें कमी फंड बाजार को संचालित करने वालों के लिए अच्छी खबर नहीं है. म्यूचुअल फंड बाजार से छोटे निवेशकों का भी भरोसा घट रहा है जो और भी चिंता की बात है. फंड बाजार ने बड़ी मुश्किल से उनमें यह विश्वास पैदा किया था कि फंड्स में निवेश से शेयर बाजार जैसा फायदा तो मिलता है लेकिन उसके जोखिम बहुत कम हो जाते हैं.

आखिर इसकी वजह क्या है? ब्रोकर से लेकर आम निवेशक तक स्वीकार करते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह पिछले दो सालों से घटता रिटर्न है. पिछले एक साल से ज्यादातर फंड्स में रिटर्न नकारात्मक है. यानी जितने पैसे निवेशक ने लगाए हैं, फंड्स का मूल्य उससे भी कम हो गया है. नाम न छापने की शर्त पर एक ब्रोकर बताते हैं, ‘शुरुआत में आम निवेशकों के पूछने पर हम जवाब देते थे कि यह निवेश लंबी अवधि का होता है और आगे आपको फायदा मिलेगा. लेकिन आम निवेशक दो साल बाद भी अपने निवेश को जस का तस या उससे भी कम देखता है तो उसे लांग टर्म इनवेस्टमेंट की बारीकी समझ में नहीं आती और वह म्यूचुअल फंड के बजाय एफडी और पीएफ जैसे विकल्पों को तरजीह देने लगता है.’

आर्थिक जानकार भी कहते हैं कि म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले छोटे निवेशक का मनोविज्ञान लंबी अवधि में बड़ा पैसा बनाने की जगह निरंतर बेहतर रिटर्न का होता है. पिछले एक साल में फंड बाजार इस धारणा को बरकरार नहीं रख पाया. ऐसे में आम निवेशक एसआईपी से निकल रहे हैं. एकमुश्त निवेश करने वाले तो पहले ही म्यूचुअल फंड से किनारा करने लगे थे.

लेकिन एक समय दो साल में 20-22 फीसदी रिटर्न का वादा करने वाले ये फंड्स 5-7 फीसद का भी रिटर्न क्यों नहीं दे पा रहे? क्या म्यूचुअल फंड बाजार में आ रही गिरावट का अर्थव्यवस्था की व्यापक तस्वीर से भी कोई संबंध है? निवेश मामलों के जानकार कहते हैं कि निश्चित रूप से. म्यूचुअल फंड हाउस पूरे साल नगदी के संकट के कारण अपने निवेश की वापसी के लिए परेशान रहे. शेयर बाजार भी कभी तेल की कीमतों तो कभी रुपये की बढ़ती कीमतों के कारण लड़खड़ाता रहा, और अब लोकसभा चुनाव के बाद की अनिश्चितता को लेकर छोटे-बड़े सभी निवेशक म्यूचुअल फंड या बाजार आधारित निवेशों से दूरी बना रहे हैं.

म्यूचुअल फंड अपने ग्राहकों को अच्छे रिटर्न नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि फंड हाउसेज को अपने निवेश से अच्छा रिटर्न नहीं मिल रहा है? यह बहुत सीधी समझ है. लेकिन इससे अर्थव्यवस्था की बड़ी तस्वीर का अंदाजा भी लगाया जा सकता है. म्यूचुअल फंड हाउस अपना निवेश अर्थव्यवस्था के लगभग सारे क्षेत्रों में करते हैं. उनके निवेश का दायरा व्यापक होता है. फिर भी उनसे लाभ न आने से सवाल पैदा होता है कि क्या आर्थिक लिहाज से सभी क्षेत्रों की हालत पतली है.

आर्थिक जानकार कहते हैं कि इक्विटी आधारित म्यूचुअल फंड्स बेहतर रिटर्न नहीं दे पा रहे थे क्योंकि शेयर बाजार की हालत पूरे साल भर बहुत अच्छी नहीं रही. लेकिन आईएलएंडएफएस संकट ने म्यूचुअल फंड्स को और दबाव में ला दिया. जिस समय यह खबर आई कि कि बुनियादी ढांचे के निर्माण से जुड़ी आईएलएंडएफएस पर बाजार की 91000 करोड़ की देनदारी है तो उस समय बहुत से म्यूचुअल फंड्स ने इसमें बड़े पैमाने पर निवेश कर रखा था या इसे कर्ज दे रखा था.

इस तरह की खबर फैलते ही इक्विटी फंड्स के साथ डेट फंड ( इनमें हानि की आशंका और कम होती है क्योंकि इनके निवेशकों का पैसा शेयर बाजार के बजाय कर्ज देने में लगाया जाता है और माना जाता है कि उसकी वापसी सुनिश्चित है) भी घाटे में आने लगे. बाजार में कर्ज वापसी के संकट ने म्यूचुअल फंड बाजार को भी हिला दिया. आईएलएंडएफएस से जुड़ी खबरों ने आम निवेशक के मन में यह भय तक पैदा कर दिया कि म्यूचुअल फंड तो म्यूचुअल फंड, उसके एलआईसी तक में किए निवेश सुरक्षित नहीं हैं.

हाल ही खबर आई है कि कई पीएफ (प्रॉविडेंट फंड) ट्रस्ट के पैसे भी आईएल एंड एफएस संकट में फंस सकते हैं. इसने भी छोटे आर्थिक निवेशकों के मन में अविश्वास पैदा कर दिया है. म्यूचुअल फंड पर इसका सबसे ज्यादा असर देखा गया. नान बैकिंग कंपनियों की खस्ता हालत और कर्ज वापसी में रुकावट ने उस पूरे चक्र को तोड़ दिया,जहां से फंड्स का रिटर्न आता है. ब्लूमबर्ग-क्विंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आईएलएंडएफएस संकट के कारण 14 म्यूचुअल फंड्स ने अपनी दस फीसद कीमत गंवा दी. मोदी सरकार और आरबीआई ने नान बैकिंग फाइनेंस कंपनियों को खासी राहत दी है, लेकिन बाजार में वैसी रौनक लौटती नहीं दिखती.

जब एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा ने निवेशकों को खुला पत्र लिखा कि उनका समूह आर्थिक तंगी में है और वे अपनी कंपनी जी एंटरटेनमेंट में 41 फीसद हिस्सेदारी बेचकर कर्ज चुकाएंगे तो उस समय कई फंड हाउसेज ने एस्सेल गुप में निवेश कर रखा था. सुभाष चंद्रा का पत्र आने के बाद फंड हाउसेज में अफरातफरी मच गई और एस्सेल के अधिकारियों के साथ आननफानन में बैठकें की गईं. इस सूचना से पहले जी के शेयर 31 फीसद तक गिर गए थे और इसका असर म्यूचल फंड पर भी पड़ा. यह महज एक उदाहरण है, लेकिन इंफ्रास्ट्रकचर और पावर सेक्टर में ऐसे कई व्यापक संकट हैं जिन्होंने छोटे निवेशकों का भरोसा तोड़ा.

हालांकि, एसोसिएशन आफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया घटते निवेश को बाजार के उतार-चढ़ाव के तौर पर देख रहा है. एसआईपी के जरिये निवेश से उसकी उम्मीद बनी हुई है. उधर, आर्थिक जानकार कहते हैं हो सकता है कि कुछ समय बाद म्यूचुअल फंड में निवेश के आंकड़े बेहतर हो जाएं, लेकिन लेकिन आखिर में स्थिरता के सूत्र अर्थव्यवस्था की व्यापक तस्वीर में छिपे हैं. मौजूूदा हालात और आने वाले चुनाव, पूंजी और निवेश बाजार को अभी इस बारे में बहुत आश्वस्त करते नहीं दिखते.