यह तय है कि ज़िंदगी को अगर किताब की शक्ल दी जाए तो जीने वाले से बेहतर कोई नहीं लिख सकता. अब जोश मलीहाबादी कोई गांधी या ग़ालिब तो नहीं थे कि हर कोई उनकी ज़िंदगी पर लिखने की ज़हमत उठाये. अलबत्ता ख़ुद जोश ने अपने बारे में लिखा है और उतनी ही बेबाकी से लिखा है जितनी बेबाक उनकी ज़िन्दगी रही. ‘यादों की बरात’ में अपने जीवन की उन्होंने इस तरह चीरफाड़ की है कि किसी और के हिस्से कुछ बचा ही नहीं.

शब्बीर हसन ख़ान के जोश मलीहाबादी बनने तक का सफ़र बड़ा दिलचस्प है. ‘यादों की बरात’ पढ़कर आप यकीन से कह सकते हैं कि जोश अगर शायर न होते तो यकीनन अपने दौर के नामचीन क़िस्सागो होते. जोश पिछली सदी के सबसे कामयाब शायरों में से एक हैं. वे उस जमात में दूसरे या तीसरे नंबर पर आते होंगे जिसमें इक़बाल, फैज़, साहिर, ज़ाफरी, कैफ़ी या मज़ाज बड़ी मुस्तैदी से अपना परचम लहरा रहे हैं.

जोश का बचपन

जोश ख़ानदानी रईस थे. पैसा आता नहीं, बरसता था. बचपन ज़मींदारी की ठसक में बीता था. ये ठसक ताज़िन्दगी जोश के अंदाज़े बयां में शामिल रही. ‘यादों की बरात’ में वे ज़िक्र करते हैं कि कोई हमउम्र अगर अदब से उनके सामने पेश न होता, तो वे उसकी चमड़ी उधेड़ लेते थे. पर प्यार भी फिर उतना ही कि किसी की मदद करने में घर-बार लुट जाए तो लुट जाए.

नौ बरस की उम्र से ही जोश मलीहाबादी ने शेर पढ़ना शुरू कर दिया था. पर उनके वालिद, जो ख़ुद पहुंचे हुए शायर थे, को यह बात नागवार थी. बाप-बेटे का रिश्ता भी ग़ज़ब का था. दोनों एक दूसरे से बेपनाह मुहब्बत रखते थे. इसके चलते, वालिद ने जोश को कई साल तक बाहर पढ़ने नहीं जाने दिया. वालिद ने घर में सख्त़ हिदायत दे रखी थी कि जोश को शेर पढ़ने से रोका जाए.

पर उनकी तमाम कोशिशें बेकार रहीं. एक मुशायरे में बाप-बेटे ने शिरकत की और जब सामईन यानी श्रोतागण जोश के कलाम पर ज़्यादा उछले तो बाप को यह बात पसंद नहीं आई. पर हां, उन्हें यह समझ आ गया कि उनका बेटा शायरी का आफ़ताब बनकर दुनिया पर नुमायां होगा.

जवानी और शायरी का तूफ़ान

जोश की जवानी बहुत ख़ूबसूरत शख़्सियत में तब्दील हुई जो बिलकुल पठानी कौम के नैन-नक्श और रुआब लिए थी. वालिद के इंतेकाल के चलते उनकी कॉलेज की पढ़ाई अधूरी रह गयी पर उन्होंने फ़ारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी का ज्ञान हासिल कर लिया था. उनकी शायरी पर उमर ख़य्याम, हाफ़िज़ और नीत्शे का असर देखा जा सकता है. नीत्शे जर्मन साहित्यकार था जिसने असाधारण केंद्रीय शक्ति का समर्थन किया, ख़ुदा की सत्ता को नकारा, ‘अहम’ यानी ख़ुद को अधिक अहमियत दी और औरत को मर्द की सेवा का साधन माना. जोश तकरीबन इन्हीं बातों के कायल थे. फ़िल्म मनमौजी (1944) में उन्होंने एक गीत लिखा था जिसके बोल बड़े अश्लील माने गए. वह गीत था

‘मोरे जुबना (यौवन) का देखो उभार पापी,

जैसे नद्दी की मौज जैसे तुर्कों की फ़ौज,

जैसे सुलगे से बम, जैसे बालक उधम,

जैसे गेंदवा खिले जैसे लट्टू हिले

जैसे गद्दार अनार, मोरे जुबना का देखो उभार’.

इस गीत को लेकर जोश की चौतरफ़ा खिंचाई हुई और वे बेपरवाह के बेपरवाह. कई सालों बाद इसी तर्ज़ पर जावेद ने ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ बनाकर अमरत्व हासिल कर लिया. ख़ैर, यह क़िस्सा फिर कभी.

जोश इंकलाबी कम रूमानी ज़्यादा

बकौल सरदार ज़ाफ़री जोश मलीहाबादी की शायरी इंक़लाबी कम और रूमानी ज़्यादा थी. उनके मुताबिक जोश रोमांसवादी शायर हैं और उनकी क्रांति की संभावना भी शत-प्रतिशत रोमांसवादी है. ज़ाफ़री मानते थे कि जोश की शायरी में गर्मी और उबाल तो है पर गंभीरता नहीं. साथ में वे यह भी कहते थे कि वास्तविक रूप से जोश की शायरी क्रांतिकारी तो नहीं है पर उसने क्रांति का मार्ग बनाया है और लाखों नौजवानों को उस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया है.’

जोश का ठसका

‘यादों की बरात’ में जोश मलीहाबादी फ़रमाते हैं कि ग़म-ए-रोज़गार की फ़िक्र में एक शब उन्हें ख्व़ाब में पैगंबर मोहम्मद के दर्शन हुए जिन्होंने उनको दक्कन जाकर निज़ाम की हाज़िरी बजाने का हुक्म सुनाया. हुनरमंद जोश को निज़ाम ने अपने यहां रख लिया. चंद महीने ही गुज़रे थे कि सरकार के निज़ाम से परेशां होकर उन्होंने एक तंज़ भरी नज़्म लिख डाली. निज़ाम तक बात पहुंची उसने मुआफ़ी मांगने को कहा, पर जोश ने मना कर दिया. नतीजन ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले’ वाली दास्तां हो गयी.

ऐसे ही एक दफ़ा जोश अजमेर तो तशरीफ़ ले गए पर ठान लिया कि ख्वाजा साहब बुलाएंगे तो ही दरगाह पर जायेंगे. तंग आकर साथ आए परिवार वाले उन्हें छोड़कर दरगाह चले गए. उसी रात उन्हें ख्व़ाब में मोईनुद्दीन चिश्ती दिख गए और उनसे दरगाह आने का इसरार किया. ये क़िस्से जोश के ख़यालों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. कहां तो जोश ख़ुदा को नहीं मानते थे और कहां ऐसी बातें?

हाल ही में खबर आई कि एक मीडिया हाउस के स्टिंग ऑपरेशन में बॉलीवुड के कुछ सितारे पैसे के एवज़ में राजनैतिक पार्टियों का एजेंडा सोशल मीडिया पर आगे बढ़ाने के लिए तैयार हो गए. कुछ ऐसा ही जोश के साथ हुआ था. पर, उनके कलेजे की बानगी देखिये. अंग्रेज़ गवर्नर ने उनसे मुसोलिनी और हिटलर के ख़िलाफ़ आल इंडिया रेडियो पर हर हफ़्ते एक नज़्म ब्रॉडकास्ट करने की बात कही. इसके एवज़ में उन्हें 800 रुपये महीना देना तय किया गया. जोश ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि वे ऐसा इसलिए नहीं करेंगे कि इससे अंग्रेजों को फ़ायदा होगा जो कांग्रेस के ख़िलाफ़ हैं.

जोश जवाहरलाल नेहरू के मुरीद थे और नेहरु उनके. दिल्ली के यूनाइटेड कॉफ़ी हाउस में कई बार दोनों की शामें एक-दूसरे की सोहबत में गुज़रती थीं. कम ही हुआ कि नेहरू ने उनका मुशायरा न सुना हो. पर जोश फिर भी उनकी मज़म्मत (आलोचना) करने से भी पीछे नहीं रहते थे. जोश उर्दू लफ़्ज़ों के उच्चारण को लेकर बड़े होशमंद थे. कहते हैं उन्होंने एक दफ़ा पाकिस्तानी आमिर अयूब ख़ान को भी ग़लत उर्दू बोलने पर टोक दिया. यह बात उन्हें इतनी नागवार हुई कि उन्होंने जोश को दी जाने वाली सीमेंट कंपनी की एजेंसी का ठेका रुकवा दिया.

जोश का पाकिस्तान जाना

इसमें कोई दोराय नहीं कि जोश को हिंदुस्तान से बेपनाह मुहब्बत थी. बंटवारे और उसके बाद के हालात उन पर भारी गुज़रे. एक दफ़ा मुशायरे में शिरकत करने वे पाकिस्तान गए तो वहां लोगों ने उन पर वहीं बसने का दबाव बनाया. उन्होंने कुछ दिन का समय मांग कर अपना पीछा छुड़ा लिया. पर जाने बाद में जाने ऐसा क्या हुआ कि वे पाकिस्तान जाकर बस गए. क़िस्सा कोताह है कि उन्हें यह कहकर भरमाया गया कि हिंदुस्तान में मुसलमानों और उर्दू के दिन लद गए हैं और उनके इंतकाल के बाद उनके बच्चों को हिंदू कहीं का न छोड़ेंगे.

नेहरू ही वह असल वजह थे जिसके कारण जोश हिन्दुस्तान का दामन थामे बैठे हुए थे. हिंदुस्तान आकर जोश ने उनसे राय मांगी. नेहरू ने कहा कि अब जब उन्हें संशय है और बच्चों का मामला है तो जो मुनासिब है वही करें. ‘यादों की बरात’ में जोश लिखते हैं कि यह सुनकर उन पर बिजली गिर पड़ी. वे चाहते थे कि नेहरू उन्हें फटकार कर रोकें. नेहरु क्यों कर ऐसा करते? जोश को कोई बच्चे तो नहीं थे. वे अपना भला बुरा ख़ूब समझते थे. कैफ़ी आज़मी की नज़्म है ‘मगर उसने रोका, न मुझको मनाया, न आवाज़ ही दी, न वापस बुलाया, न दामन ही पकड़ा, न मुझको मनाया, मैं अहिस्ता-आहिस्ता बढ़ता ही आया’ और इस तरह जोश पकिस्तान चले गए.

जोश ‘हिंदुस्तान का एजेंट’ है

पाकिस्तान जाकर उनकी हालत और भी ख़राब हो गयी. वहां जो उन पर गुज़री वह किसी सदमे से कम नहीं. सरकार ने वहां बसने के एवज में उनके लिए काफ़ी इंतज़ाम और वादे किये थे इससे पाकिस्तानी नाख़ुश थे. फिर बीच-बीच में वे हिंदुस्तान भी आते थे और पाकिस्तानी उनके नेहरू प्रेम से नावाकिफ़ नहीं थे. लिहाज़ा, पूरा मुल्क उनके ख़िलाफ़ हो गया. लोगों ने कहा कि सरकार ने आधा पाकिस्तान जोश को घूस में दे दिया है. उन्हें गद्दार और भारत का एजेंट तक बताया गया. हालात इस कदर बिगड़ गए कि उनका मुशायरों में जाना बंद हो गया. जोश एक तरह से अपने घर में नज़र बंद होकर रह गए. 1967 में वे एक दफ़ा चंद महीनों के लिए हिन्दुस्तान आये और इ दौरान उन्होंने मुंबई में एक अखबार में इंटरव्यू दिया. उसका नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान सरकार ने उनकी सरकारी नौकरी छीन ली. जोश मलीहाबादी के आख़िर के चंद साल गुमनामी में गुज़रे और इसी अफ़सोस में 22 फरवरी 1982 को वे इस दुनिया से रुख़सत हो गए.

जोश मरे तो पाकिस्तान में मगर उनकी रूह आज भी मलीहाबाद के आम के बाग़ों में ही फिरती होगी, और हिंदुस्तान की बदली हुई संस्कृति पर यह सोचकर हैरान होती होगी कि क्या यह उनका वही मलीहाबाद है और क्या यही नेहरू का हिंदुस्तान है?