बीते कुछ समय के दौरान शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भाजपा को सबसे ज्यादा परेशान किया है. नोटबंदी से लेकर राम मंदिर तक हर मुद्दे पर वे अपनी इस सहयोगी पार्टी पर हमलावर रहे. लेकिन फिर अचानक युद्धविराम हो गया. बीते हफ्ते जब मुंबई में शिवसेना और भाजपा के नेता मिले तो तब तक इस युद्धविराम की शर्तों पर मुहर लग चुकी थी. दोनों पार्टियों ने लोकसभा चुनाव के लिए समझौता कर लिया है. इसके तहत भाजपा महाराष्ट्र की 25 सीटों पर लड़ेगी तो शिवसेना 23 पर.

फिलहाल उद्धव ठाकरे ने शब्दबाण तरकश में रख लिए हैं. सुनी-सुनाई है कि उन्होंने अपने नेताओं को भाजपा पर हमले न करने की हिदायत दे दी है. अब शिवसेना का मुखपत्र सामना भी मोदी सरकार पर नरम है. अब वह पाकिस्तान पर चढ़ाई कर रहा है.

तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि हमेशा रिश्ता तोड़ने की बात करने वाली शिवसेना अब दोस्ती का नया अध्याय लिखने जा रही है? मातोश्री के करीबी एक नेता बताते हैं कि ठाकरे परिवार अब ‘सरकार’ बनना चाहता है. 2014 में उद्धव ठाकरे की अपनी इच्छा पूरी नहीं हो पाई. अबकी बार वे अपने बेटे आदित्य को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाना चाहते हैं. अकेले दम पर शिवसेना महाराष्ट्र में विरोधी या सहयोगी पार्टी ही बन सकती है, कभी सरकार नहीं बना सकती. इसलिए महीनों तक तल्खी बढ़ाई गई और आखिर में भाजपा को मजबूर किया गया कि वह शिवसेना की शर्तों पर समझौता करे.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि शिवसेना की तीन मुख्य शर्तें थीं- पहली, कोई ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री शिवसेना का हो. दूसरी, मातोश्री का सम्मान बना रहे इसलिए भाजपा अध्यक्ष हों या प्रधानमंत्री, वे मातोश्री तक जरूर आएं. शिवसेना प्रमुख को मिलने के लिए न बुलाया जाए. तीसरी, विधानसभा चुनाव में शिवसेना किसी भी सूरत में जूनियर नहीं दिखना चाहती और लोकसभा चुनाव में भी सीटों का कोटा बढ़ाया जाए.

अगर यह 2018 का साल होता तो भाजपा तीनों ही शर्तों को नकार देती. लेकिन अब मोदी-अमित शाह की जोड़ी एक नया महागठबंधन बनाना चाहती है जो दक्षिण से लेकर पश्चिम तक में मजबूत हो. इसलिए काफी मोल-भाव के बाद शिवसेना की कमोबेश तीनों ही मांगें भाजपा को माननी पड़ी हैं.

इस बातचीत के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक भाजपा नेता की मानें तो जो बात मुंबई में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अमित शाह, उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फड़णवीस ने नहीं बताई वही बात सबसे बड़ी है. दरअसल अभी से तय हो गया है कि अगर दोबारा भाजपा-शिवसेना सरकार बना पाए तो मुख्यमंत्री की कुर्सी का बंटवारा होगा. ढाई साल के लिए देवेंद्र फड़णवीस मुख्यमंत्री बनेंगे और ढाई साल के लिए यह कुर्सी उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे संभालेंगे.

बीते हफ्ते मुंबई में जब दोनों पार्टियों के समझौते की घोषणा हुई तो एक और बात गौर करने वाली थी. महाराष्ट्र में भाजपा के सबसे ताकतवर नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद नहीं थे. उनकी जगह केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर को मंच पर जगह मिली थी. सुनी-सुनाई पर जाएं तो यह भी बदले हुए समीकरणों का प्रतीक ही है. भाजपा के एक बड़े नेता के करीबी सूत्र के मुताबिक पिछले तीन महीने में महाराष्ट्र की रणनीति बदली गई है.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सबसे करीबी मुख्यमंत्री हैं देवेंद्र फड़णवीस. लेकिन फड़णवीस के अपने शहर नागपुर में उनसे ज्यादा महत्व रखते हैं केंद्रीय मंत्री निडिन गडकरी. नागपुर में ही संघ का मुख्यालय है और गडकरी जब भी अपने शहर में होते हैं तो वे सुबह का नाश्ता संघ मुख्यालय में ही करते हैं. पिछले कुछ महीनों के दौरान नितिन गडकरी को लेकर जिस तरह की खबरें आ रही थी उससे सबसे ज्यादा नुकसान उनका ही हुआ. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि इस बार शिवसेना-भाजपा के गठबंधन की बातचीत से नितिन गडकरी को पूरी तरह अलग रखा गया और दिल्ली से प्रकाश जावडेकर के जरिए मातोश्री से संबंध बढ़ाया गया.

भाजपा की खबर रखने वाले एक मराठी पत्रकार बताते हैं, ‘एक साल में एक मराठी नेता का कद सबसे ज्यादा बढ़ा है और जिसकी तरफ मीडिया का ध्यान नहीं गया क्योंकि वो नेता मीडिया से खुद बचना चाहता है, वे हैं मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर. वे इस वक्त अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों के बेहद करीब माने जाते हैं. मानव संसाधन मंत्रालय जैसा भारी-भरकम महकमा भी उनके पास है, राजस्थान में चुनाव के प्रभारी भी वे हैं और भाजपा उन्हें नए संकटमोचक के तौर पर भी स्थापित करना चाहती है.’

सूत्रों की मानें तो प्रकाश जावड़ेकर पर अमित शाह का भरोसा बहुत बढ़ा है और वे भाजपा अध्यक्ष के विश्वस्त सूत्र के तौर पर मशहूर हो गए हैं. मातोश्री और दिल्ली के बीच जब दूरियां बढ़ने लगी थी तो यहां भी सूत्रधार का काम प्रकाश जावड़ेकर ने ही किया. मुंबई में कोई छोटा नेता हो या बड़ा, सब जानते हैं कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस और मातोश्री के प्रमुख उद्धव ठाकरे के बीच सहज संबंध नहीं हैं. भाजपा का शीर्ष नेतृत्व किसी भी सूरत में देवेंद्र फड़णवीस को तेवर कम करने की सलाह नहीं देना चाहता था. क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो मुंबई शहर में ही मातोश्री की सत्ता मुख्यमंत्री से मजबूत हो जाएगी जो सही नहीं जान पड़ता है. इसलिए प्रकाश जावड़ेकर के जरिए मातोश्री तक पहुंचा गया. उन पर भरोसा इसलिए भी बढ़ा क्योंकि बातें महीनों भर चली लेकिन मीडिया में कुछ भी लीक नहीं हुआ. घर की बातें घर में रही जो अमित शाह भी चाहते थे और उद्धव ठाकरे भी.

आखिरकार जब प्रकाश जावड़ेकर ने पिता उद्धव और बेटे आदित्य के साथ मिलकर गठबंधन का फॉर्मूला तैयार कर लिया और दिल्ली से उस फॉर्मूले पर सहमति बन गई तो सम्मान की बात आई. फिर तय किया गया कि अमित शाह खुद मातोश्री आएं और उद्धव ठाकरे से बात करें. लेकिन भाजपा की शर्त थी कि प्रेस कांफ्रेंस न्यूट्रल जगह पर हो और गठबंधन का ऐलान फड़णवीस करें. शुरू में उद्धव ठाकरे चाहते थे कि अमित शाह और वे गठबंधन की घोषणा करें. बाद में फड़णवीस और आदित्य ठाकरे अपनी बात कहें. लेकिन ऐसा हो न सका. अमित शाह ने आखिरकार उद्धव को मना लिया कि मुख्यमंत्री मराठी भाषा में प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत करेंगे और उसके बाद उद्धव ठाकरे अपनी बात कहेंगे. अमित शाह सबसे आखिर में दो तीन लाइन कहेंगे. चूंकि अमित शाह खुद सबसे आखिर में प्रेस से बात करने के लिए तैयार हो गए थे इसलिए उद्धव को भी तैयार होना पड़ा.

अब भाजपा के नेता थोड़ी राहत में हैं कि उन्हें सामना के जरिए आलोचना नहीं सुननी पड़ती. शिवसेना के नेताओं को भी पता लग गया है कि इस बार ढाई साल के लिए ही सही, ठाकरे सरकार बनेंगे. बस एक दिक्कत और है. जो काम भाजपा-शिवसेना ने कर लिया है, कुछ वैसा ही शरद पवार करना चाहते हैं. पवार सीनियर के भतीजे अजित पवार अब राज ठाकरे से लंबी बातचीत करते हैं. सुनी-सुनाई है कि राज ठाकरे बहुत जल्द कांग्रेस-एनसीपी महागठबंधन में आ सकते हैं.