26 नवंबर, 2008 की शाम. मुंबई के ताजमहल होटल के पास कैफ़े लेओपोल्ड में रोज की तरह विदेशियों का जमघट था. जर्मनी से आई लुफ्तहांज़ा फ्लाइट के उड़ान दल कर्मी भी उस शाम वहीं थे. इन्हीं में एक थीं डेज़िरे बाउमान. उनके जीवन का वह भारत में पहला दिन था. लेकिन उनकी सारी खुशी और जिज्ञासा कुछ ही क्षणों में अंतहीन डरावना सपना बन गयी. वे हज़ार गुना चाह कर भी उस दिन को भूल नहीं पातीं. उस शाम की याद आते ही वे सिहर उठती हैं. उनका गला रुंध जाता है. आंसू छलक जाते हैं.

26 नबंबर, 2008 को मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकवादियों का सबसे वीभत्स हमला हुआ था. जर्मनी के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण नेटवर्क ‘एआरडी’ ने हाल में इस हमले पर आधे घंटे की एक खोजपूर्ण डॉक्यूमेन्ट्री फ़िल्म प्रसारित की. फिल्म का आरंभ डेज़िरे बाउमान के अनुभवों के साथ ही होता है.

‘जान बचाने की चिंता सबसे ऊपर थी’

तब तक भारत से पूरी तरह अनजान डेज़िरे बाउमान कहती हैं, ‘एक ज़ोरदार धमाका हुआ. मैं बिल्कुल समझ नहीं पाई कि हुआ क्या है....हमें लगा कि वे (आतंकवादी) वहीं कहीं हैं. उन्होंने नयी गोलियां भरीं. मैं केवल यही सुन पायी कि वे टूटते कांच के टुकड़ों पर चल रहे थे. उनके क़दम हमारे पास आते लग रहे थे. मेरा एक सहकर्मी ज़ोर से चिल्लाया, भागो यहां से... रास्ता अनगिनत शवों से पटा हुआ था. लेकिन, उस क्षण जान बचाने की चिंता सबसे ऊपर थी... सब कुछ अनदेखा करते हुए, एक के बाद दूसरा पैर उठाते हुए, हम ताजमहल होटल की तरफ भागे. सड़क के दूसरे छोर पर वह हमें दिख भी रहा था. … उस भय की कामना मैं अपने सबसे बड़े शत्रु के लिए भी नहीं कर सकती!’

उधर, ताजमहल होटल में भी हाहाकार मचा हुआ था. इसके बाद पूरे मुंबई में अगले 60 घंटे उथल-पुथल भरे रहे. 166 प्राणों की अनायास बलि चढ़ गयी. सारी दुनिया इसे टेलीविजन पर देख रही थी.

दूसरी तरफ, लाहौर में टीवी के सामने बैठा एक आदमी फूला नहीं समा रहा था. वह अपनी कारस्तानी पर मन ही मन लड्डू फोड़ रहा था. यह शख्स था डेविड कॉलमैन हेडली. उसी ने इस हमले की योजना बनायी थी. उस समय वह 48 साल का था. हेडली वॉशिंगटन में रहने वाले एक पाकिस्तानी पिता और अमेरिकी मां के घर दाउद सैयद गिलानी के नाम से पैदा हुआ था.

हेरोइन तस्करी

सेबैस्टियन रोटेला भी अमेरिकी नागरिक और पत्रकार हैं. उन्होंने हेडली के बारे में काफ़ी छानबीन की है. सेबैस्टियन ने अमेरिकी गुप्तचर सेवाओं सीआईए, एनएसए और डीआईए के लिए काम कर चुके और बहुत-सी गोपनीय जानकारियों के साथ 2013 में रूस चले गये एडवर्ड स्नोडन के दस्तावेज़ों को भी देखा है. वे ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ और ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के लिए लिखते हैं.

रोटेला ने इस जर्मन डॉक्यूमेन्ट्री में बताया, ‘हेडली को 1988 में फ्रैंकफ़र्ट हवाई अड्डे पर हेरोइन के साथ पकड़ा गया. यहीं से उसके जीवन में एक नया मोड़ आया. उसने पकड़ा तो जर्मन कस्टम अधिकारियों ने था, किंतु मेरा अनुमान है कि डीईए (अमेरिकी मादक द्रव्य प्रवर्तन प्रशासन) को उसकी गतिविधियों की भनक मिल गयी थी. उसे अमेरिका को सौंप दिया गया. वहां हेडली ने डीईए से एक डील की. डील यह थी कि जेल की सज़ा घटवा देने पर वह हेरोइन की तस्करी करने वाले अपने साथियों का भेद खोल देगा.’ हेडली डीईए का मुखबिर बन गया. उसे केवल चार साल जेल की सज़ा हुई, जबकि उसके दोनों साथियों को आठ-आठ साल की.

जेल से छूटते ही फिर तस्करी

जेल से छूटते ही हेडली पाकिस्तानी होरोइन की तस्करी फिर से करने लगा. 1998 में वह फिर पकड़ा गया. डीईए से उसने फिर वही डील की. इस बार उसने पांच लोगों को पकड़वाया था. बदले में अच्छे चालचलन की परिवीक्षा (प्रोबेशन) की शर्त पर छह महीने के भीतर ही वह रिहा भी हो गया. रिहा होते ही इस बार उसने न्यूयॉर्क में तस्करी की दुनिया में अपने पैर पसारे.

हेडली का गोरखधंधा अच्छा ही चल रहा था. तभी उसके जीवन में फिर से एक मोड़ आया. 11 सितंबर 2001 वाले दिन की सुबह, अल क़ायदा के आत्मघाती आतंकवादियों ने अमेरिका के चार यात्री विमानों का अपहरण कर लिया. उनके चालकों को कब्जे में लेकर उन्होंने दो विमानों की न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और एक की अमेरिकी रक्षामंत्रालय पेंटागन से टक्कर करायी. चौथे विमान के चालकों ने उसके यात्रियों और आतंकवादियों में छिड़ गई हाथापायी के बीच उसे पेन्सिलवेनिया में ज़मीन से टकरा दिया.

आतंकवादियों से ट्रेनिंग लेने की धुन

पत्रकार सेबैस्टियन रोटेला का कहना है कि क़रीब तीन हज़ार लोगों के प्राण लेने वाली इस असाधारण घटना से डेविड हेडली की तबीयत बाग़बाग़ हो गयी. अपनी एक महिला मित्र से उसने कहा कि वह जन्म से पाकिस्तानी है इसलिए अब पाकिस्तान जायेगा और वहां के आतंकवादियों से ट्रेनिंग लेगा. उसकी महिला मित्र ने यह बात एक शराबघर के बारकीपर से कही. बात डीईए और एफ़बीआई (फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्स्टिगेशन/ संघीय जांच कार्यालय) तक भी पहुंची. हेडली को पूछताछ के लिए डीईए के मुख्यालय में बुलाया गया. वहां एफ़बीआई के जांचकर्ता भी आये थे. लेकिन अंतिम परिणाम यही रहा कि डीईए ने हेडली के सिर पर अपना वरदहस्त रखते हुए उसके बारे में कोई जांच नहीं होने दी.

डेविड हेडली के वकील हॉवर्ड लीडर ने जर्मन डॉक्यूमेन्ट्री बनाने वालों से कहा, ‘9/11 के कुछ ही दिन बाद, जब सरकार हताशापूर्वक हर तरह की जानकारियां पाने में लगी थी, ऐसा कुछ होना मैंने कभी नहीं सुना था. हेडली के प्रोबेशन की अवधि पूरी होने में अभी ढाई साल बाक़ी थे. उसे कम करने के लिए जजों को राज़ी कराना मेरा और मेरे सहकर्मियों का दिन-प्रतिदिन का काम होता. लेकिन सरकार खुद ही ऐसा करने लगे, ऐसा तो मैंने कभी नहीं सुना था.’

हेडली के वकील का आगे कहना था, ‘इस मामले में सीआईए और एफ़बीआई ने भी अपने हाथ ज़रूर काले किये हैं. महिला जज ने कहा कि उसे सरकार से निर्देश मिला है और वह प्रोबेशन अवधि का अंत करने के लिए तैयार है. उसने इसकी सराहना की कि वह (डेविड हेडली) अपने आप को एक बड़े ख़तरे में डालने के लिए तैयार था, और उसकी सफलता के लिए शुभकामना भी की.’

हेडली किस ‘बड़े ख़तरे’ के लिए तैयार था, यह अटकलबाज़ी का विषय है. हेडली ने खुद यह कहा कि वह अपने विवाह के लिए लाहौर जाना चाहता है. 2002 की शुरुआत में हेडली लाहौर पहुंचा. फ़रवरी में उसने लश्कर-ए-तैयबा के एक शिविर में जिहादी आतंकवाद की विचारधारा और तौर-तरीके सीखना शुरू कर दिया. दो ही महीने पहले, दिसंबर 2001 में, नाटो-सैनिक अफग़ानिस्तान में उतारे गये थे. उनमें जर्मन सेना बुंडेसवेयर के भी कुछेक हज़ार सैनिक थे. पाकिस्तान नाटो-सैनिकों के लिए रसदपूर्ति का मुख्य रास्ता था.

पश्चिमी देश पाकिस्तान के चापलूस बने

आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में पश्चिमी देश पाकिस्तान को अपना साथी मानने और उसकी चापलूसी करने लगे. अपने सैनिकों की सुरक्षा के लिए वे पाकिस्तान और अफ़गा़निस्तान में अपने गुप्तचरों और सूचना सूत्रों का जाल बुनने लगे. 2012 से 2016 तक जर्मन गुप्तचर सेवा बीएनडी के अध्यक्ष रहे गेरहार्ड शिंडलर इस डॉक्यूमेंट्री में कहते हैं, ‘बीएनडी को एक तरफ तो रणनीतिक महत्व की जानकारियां जुटानी थीं और दूसरी तरफ़ सैनिक कार्रवाइयां भी करनी थीं. स्वाभाविक है कि पाकिस्तान की इसमें एक बहुत बड़ी भूमिका होनी थी.’ यही बात अमेरिका और ब्रिटेन जैसे नाटो के अन्य सदस्य़ देशों पर भी लागू होती है.

अमेरिकी गुप्तचर सेवा सीआईए के पूर्व निदेशक माइकल हेडन आतंकवाद के खिलाफ अभियानों में एक प्रमुख नाम रहे हैं . जर्मन टेलीविज़न की डाक्यूमेन्ट्री में उनका कहना था, ‘पाकिस्तान हमारा मित्र हुआ करता था, लेकिन वो नरक जैसा मित्र था. बेहद मुश्किल साथी था. एक बार जब मैं वहां गया था और पाकिस्तानियों को मनाना चाहता था कि वे अल क़ायदा के खिलाफ कुछ करें, तो मैंने पाया कि हमारे दृष्टिकोण एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं.’

अमेरिका ने डेविड हेडली को पाकिस्तान भेजा

इसी विरोधाभासी स्थिति में अमेरिका ने डेविड हेडली को 2002 में पाकिस्तान भेजा. उसका काम था आतंकवादी संगठनों के बारे में जानकारियां जुटाना. वहां लाहौर में उसने एक ऐसे आतंकवादी गिरोह से संपर्क किया, जो पाकिस्तान के बाहर आतंकवादी हमलों की योजनाएं बनाता है. इसका नाम था लश्कर-ए-तैयबा. हेडली ने जिससे रिश्ते जोड़े, वह था पाकिस्तान का एक ‘स्टार जासूस’ साजिद मीर.

साजिद मीर का काम अन्य देशों में आतंकवादी हमलों की तैयारी करना था. वह मुख्य रूप से अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि पश्चिमी देशों के आतंकवादियों की भर्ती किया करता था. हेडली इन सारी शर्तों को पूरी करता था, इसलिए साजिद मीर ने उसे लश्कर-ए-तैयबा में भर्ती कर लिया. सीआईए के पूर्व निदेशक माइकल हेडन के शब्दों में ‘यह हमारे देश के लिए एक बढ़ता हुआ ख़तरा था. हम देख रहे थे कि पश्चिमी रंगरूटों के लिए पाक-अफ़ग़ान सीमा-क्षेत्र में ट्रेनिंग शिविर बन रहे थे और वे वहां ट्रेनिंग लेकर पश्चिमी देशों में वापस जा रहे थे.’

‘आतंकवादी महत्वपूर्ण मददगार हैं’

लश्कर-ए- तैयबा के हाथ अफ़गानिस्तान में हुए कई हमलों में पाये गये हैं. जर्मन सैनिक भी उसके निशाने पर रहे हैं. जर्मन गुप्तचर सेवा बीएनडी के 2006 से 2011 तक अध्यक्ष रहे एर्न्स्ट उरलाऊ कई बार पाकिस्तान जा चुके हैं और पाकिस्तान की आधिकारिक गुप्तचर सेवा आईएसआई के सर्वोवोच्च अधिकारियों के साथ वार्ताएं कर चुके हैं. डॉक्यूमेंट्री में उनका कहना है, ‘पाकिस्तानियों के लिए वे लोग, जो अफ़ग़ानिस्तान सहित कहीं भी उथल-पुथल मचा सकते थे, आतंकवादी हमले कर सकते थे, बहुत महत्वपूर्ण मददगार हैं.’

जर्मनी सहित नाटो के सभी सदस्य देशों की सरकारें भलीभांति जानती थीं और आज भी जानती हैं कि पाकिस्तान उनका एक ऐसा पार्टनर है, जो साथ-साथ आतंकवादियों को भी सहायता और समर्थन देता है. पर यही बात खुल कर दो टूक कहने का या तो उनमें साहस नहीं है या इतनी ईमानदारी नहीं है. अपनी छानबीन द्वारा आईएसआई के काले कारनामों को भलीभांति जान चुके अमेरिकी पत्रकार सेबैस्टियन रोटेला के शब्दों में ‘लश्कर को हम इस्लामी अतिवाद और अल क़ायदा का प्रवेशद्वार कह सकते हैं. वैसे तो ये सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, अंतर यही है कि लश्कर पाकिस्तानी गुप्तचर सेवा के अधीन है, जबकि अल क़ायदा नहीं.’

हर पाकिस्तानी सरकार आईएसआई की मुठ्ठी में

लश्कर ही नहीं पाकिस्तान की हर सरकार भी आईएसआई के ही अधीन होती है. जर्मन डॉक्यूमेंट्री में आईएसआई को राज्यसत्ता के अंदर राज्यसत्ता माना गया है जिसके पास पाकिस्तान की असली सत्ता है. लेकिन, साथ ही कमाल यह भी है जर्मनी सहित हर प्रमुख पश्चिमी देश और उसकी गुप्तचर सेवा आईएसआई के साथ सहयोग करने और उसे खुश रखने के लिए लालायित भी रहती है. जर्मन बीएनडी के पूर्व अध्यक्ष एर्न्स्ट उरलाऊ कहते हैं, ‘पाकिस्तान में आईएसआई के साथ बीएनडी के सबसे घनिष्ठ संबंध थे. आईएसआई के बिना उस समय न तो कुछ होता था और न हो सकता था. सभी संबद्ध पक्षों को साफ़-साफ़ मालूम था कि यह पर्दे के पीछे चल रहा एक खेल है.’

2012 में बीएनडी के अध्यक्ष बने गेरहार्ड शिंडलर भी इस आकलन की पुष्टि करते हैं. डॉक्यूमेंट्री में वे कहते हैं, ‘तब तक, हर हाल में, बीएनडी के लिए साफ़ हो गया था कि आईएसआई वास्तव में दोमुंहा (सांप) है. समस्या यह थी कि आईएसआई इतनी भारीभरकम मशीनरी है कि यह पता ही नहीं चल पाता था कि उसका कौन-सा विभाग हमारे साथ सहयोग कर रहा है और कौन-सा विभाग तालिबान या अल क़ायदा से हाथ मिला कर हमारे विरुद्ध काम कर रहा है.’ इसके बावजूद पाकिस्तानी सेना के अब तक 380 अफ़सरों को जर्मनी में हैम्बर्ग की सैन्य आकादमी में नेतृत्वकारी भूमिकाओं के लिए प्रशिक्षित किया गया है.

आईएसआई की सफलता में जर्मनी की भूमिका

इन प्रशिक्षित लोगों में से कई आईएसआई के ऊंचे पदों पर पहुंचे हैं. उदाहरण के लिए, 1990 से 1992 तक आईएसआई के निदेशक रहे लेफ्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी ने 1975 में जर्मनी में हैम्बर्ग की सैन्य अकादमी में सैन्य नेतृत्व का प्रशिक्षण कोर्स किया है. 1980 से 1984 तक वे जर्मनी में पाकिस्तानी दूतावास के सैन्य अटाशे और 1994 से 1997 तक राजदूत रहे हैं. जर्मन शुरू से ही जानते थे कि जनरल दुर्रानी का आईएसआई से संबंध है. आईएसआई का प्रमुख रहते हुए दुर्रानी ने ऐसे लड़ाकों के हाथ मज़बूत किये, जिन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में हज़ारों सामान्य नागरिकों की हत्या की है. विडंबना तो यह है कि जर्मनी आज भी पाकिस्तानी नेताओं और आईएसआई के साथ अच्छे संबंधों के लिए प्रयत्नशील रहता है.

पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ का चेहरा गुस्से से तमतमा जाता है, जब कोई लश्कर-ए-तैयबा को आतंकवादी गिरोह कह देता है. ‘आप उन्हें आतंकवादी क्यों कहते हैं?’ डाक्यूमेंट्री में एक सवाल के जवाब में वे तमक कर पूछते हैं, ‘हम तो उन्हें मुजाहिदीन कहते हैं. लश्कर-ए- तैयबा संसार की सबसे अच्छी सहायता संस्था है.’

पाकिस्तान का हर नया-पुराना नेता यही चाहता है कि यदि वह किसी शैतान को भगवान बताता है, तो दुनिया को उसे भगवान ही मानना चाहिये, न कि कोई प्रश्न उठाना चाहिये. कोई पाकिस्तानी विश्वास ही नहीं करता कि लश्कर के संस्थापक और मुखिया हाफ़िज़ सईद का नाम विश्व में सबसे अधिक तत्परता से खोजे जा रहे आतंकवादियों की सूची में है.

लश्कर ने हेडली को जिहादी बनाया

2002 में लाहौर पहुंचने के बाद डेविड हेडली ने लश्कर-ए- तैयबा के ही शिविर में विदेशों में आतंकवाद के जिहादी हमलों की योजना बनाना सीखा. एक पाकिस्तानी महिला से शादी की. दाढ़ी बढ़ा कर ठेठ इस्लामी जीवनशैली अपना ली. 2005 की गर्मियों में उसे न्यूयॉर्क में अपनी पहली पत्नी के साथ देखा गया. वह आपे से बाहर थी. उसे पता चला था कि हेडली ने पाकिस्तान में भी एक परिवार बना लिया है.

हेडली की इस अमेरिकन पत्नी ने वहां की आंतरिक गुप्तचर सेवा एफ़बीआई को फ़ोन किया था. कहा कि उसे आतंकवाद-निरोधक विभाग से बात करनी है, यह बताने के लिए कि उसका पति लश्कर-ए-तैयबा के लिए काम करता है और वह पाकिस्तान के ट्रेनिंग शिविरों में रह चुका है. एफ़बीआई वालों ने डीईए कार्यालय को फ़ोन किया. डीईए का संबद्ध अधिकारी चकरा गया. उसका कहना था कि वह (हेडली) ऐसा आदमी नहीं है कि अमेरिका में कोई आतंकवादी हमला करेगा. बाहरी तौर पर बात वहीं थम गई. भीतरी तौर पर हो सकता है कि डीईए के अधिकारी ने कहा हो कि हेडली हमारा आदमी है और हमने ही उसे पाकिस्तान जाने और तस्करों से मेलजोल बढ़ाने के लिए कहा है.

हेडली आईएसआई में भर्ती हुआ

हेडली का इस बार भी कोई बाल बांका नहीं हुआ. वह पाकिस्तान लौट आया. जनवरी 2006 में उसे आईएसआई के एक मेजर इक़बाल का फ़ोन आया. उससे कहा गया कि उसे आईएसआई में भर्ती कर लिया गया है. अब उसे पाकिस्तान के हित में आईएसआई के लिए काम करना है. मेजर इक़बाल एक ऐसा नाम है जिसकी अंतरराष्ट्रीय पुलिस ‘इंटरपोल’ दुनिया भर में खोज कर रही थी. खोज में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि ‘इंटरपोल’ के पास उसका कोई फ़ोटो नहीं था.

मेजर इक़बाल द्वरा डेविड हेडली को सीधे आईएसआई में भर्ती कर लेना उसकी पदोन्नति के समान था. साजिद मीर लश्कर के आतंकवादियों को निर्देश देता था, जबकि मेजर इक़बाल आईएसआई के आतंकवादियों का निर्देशक था. हेडली से कहा गया कि उसे मुंबई में एक बड़ा हमला करने के लक्ष्य तय करने हैं. वॉशिगटन में 10 मार्च 2006 को जारी और नौ मार्च 2016 तक वैध अपने नाम के एक नये अमेरिकी पासपोर्ट के साथ वह मुंबई गया और वहां पंचसितारा होटलों में रहने लगा. वहां उसने ‘इमीग्रेशन लॉ सेन्टर’ नाम से वीसा दिलवाने का एक दफ्तर खोला. विज़िटिंग कार्ड छपवाया. ख़ुद को कभी ‘डिप्लोमैट’ तो कभी ‘बिजनेसमैन’ बताया. ओबेरॉय ट्राइडेन्ट होटल, सीएसटी रेलवे स्टेशन, नरीमन हाउस के यहूदी-अमेरिकी सेंटर, लेओपोल्ड कैफ़े और होटल ताजमहल पैलेस को हमले के लिए चुना.

मुंबई हमले से पहले तीसरी शादी

हमले से पहले, 2007 में हेडली ने तीसरी शादी की. हनीमून मनाने के लिए वह नयी पत्नी फ़ायज़ा को लेकर मुंबई गया.पत्नी को शक हुआ कि हनीमून तो बहाना है, वह किसी दूसरे मतलब से मुंबई में है. दोनों के बीच झगड़ा हुआ. फ़ायज़ा ने विस्फोटक जानकारियों के साथ अमेरिकी दूतावास से संपर्क किया. पर अमेरिकियों ने उसकी कुछ नहीं सुनी. मुंबई में हमले से पहले वाले सप्ताहों में भारतीय गुप्तचर सेवा रॉ को भी पश्चिमी देशों की गुप्तचर सेवाओं से किसी हमले के कम से कम पांच इशारे मिले. पर होनी होकर रही.

ऐसा कैसे हुआ, इसके बारे में रॉ के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद ने ‘सीएनएन न्यूज़ 18’ चैनल के एक कार्यक्रम में कहा , ‘हम जानकारियां जुटाते हैं. उन पर अमल हमारे हाथ में नहीं होता. उन्हें अमल के लिए आगे बढ़ा दिया जाता है. भारत में गुप्तचर सेवाओं का ढांचा ही ऐसा है कि सूचना जमा करने और उस पर अमल करने वाले तंत्र अलग-अलग हैं. उनके बीच एक दूरी है.’

हर लोकतांत्रिक देश की कमज़ोरी

विक्रम सूद के मुताबिक गुप्तचर सेवाओं और कार्यपालिका के बीच की यह दूरी लगभग हर लोकतांत्रिक देश की कमज़ोरी है. राजीव गांधी की हत्या और कारगिल में भारतीय सैनिकों की अपनी खंदकों में वापसी के पहले पाकिस्तानियों के वहां पहुंच कर डट जाने के समय भी यही कमी रही. विक्रम सूद का कहना था, ‘ताज होटल का सिक्योरिटी एलर्ट कुछ सप्ताह बाद उठा लिया गया, क्योंकि तब तक कुछ हुआ नहीं था. 26/11 जैसी बातें केवल किसी एक ग़लती का परिणाम नहीं, ग़लतियों के एक सिलसिले का परिणाम होती हैं.’

संसार के एक सबसे बड़े और घने बसे शहर मुंबई में आतंकवादियों के साथ लड़ाई तीन दिनों तक चली. विमान द्वारा दिल्ली से आये विशेष कमांडो ही आतताइयों का काम तमाम कर सके. मुंबई हमले में विशेष दिलचस्पी रखने वाले अमेरिकी पत्रकार सेबैस्टियन रोटेला ने जर्मन डॉक्यूमेंट्री में इसका कारण बताते हुए कहा, ‘यह हमला आतंकवादियों के लिए इतना कारगर क्यों रहा? इसलिए, क्योंकि वह एक सकार द्वारा प्रायोजित हमला था. आईएसआई के पैसे से, उसके द्वारा नियंत्रित और निर्देशित था. लश्कर और आईएसआई की मिलीभगत थी. यही इसका सबसे भयावह पक्ष है.’

हेडली को मिले बधाई-संदेश

हेडली को अपनी पाकिस्तानी पत्नी और निर्देशक आका से कोड-भाषा में बधाई-संदेश के ईमेल मिलेः ‘पढ़ाई पूरी होने पर तुम्हें हार्दिक बधाई. जश्न वाकई बहुत बढ़िया था. पूरे दिन यह फ़िल्म देखते रहे.’ ‘पढ़ाई’ इस हमले का कोडवर्ड था.

इस ‘पढ़ाई’ में उत्तीर्ण होने के बाद हेडली और उसके पीछे छिपे लोगों ने यूरोप की तरफ़ रुख किया. उनका नया लक्ष्य डेनमार्क की राजधानी कोपेनहागन था. हेडली कई बार वहां गया. अपने मोबाइल फ़ोन के कैमरे से मुख्य रेलवे स्टेशन, एक मंहगे होटल द अंग्लेतेर, मुख्य यहूदी सिनागोग तथा पैगम्बर मुहम्मद के कार्टून प्रकाशित करने वाले दैनिकपत्र ज्यिलांद्स-पोस्टन के संपादकीय भवन के फ़ोटो लिये और वीडियो फ़िल्में बनायीं.

सेबैस्टियन रोटेला की खोज के मुताबिक योजना थी, मुंबई जैसा ही एक और हमला. हथियारबंद आतंकवादी शहर के मध्य में स्थित ज्यिलांद्स-पोस्टन के संपादकीय भवन पर धावा बोल देते. लोगों को बंधक बनाते. मीडिया के लिए ख़बरें बनतीं. बंधकों के सिर धड़ से अलग कर दिये जाते. कटे हुए सिर संपादकीय कार्यालय की खिड़कियों से बाहर सड़क पर फेंक दिये जाते.यह सब संसार के एक सबसे शांतिपूर्ण शहर में होता.’

हेडली की हैम्बर्ग यात्रा

हेडली ने उन जगहों का एक सटीक नक्शा बनाया, जहां ‘मिकी माउस’ कोड-नाम से हमले करने की योजना थी. यह काम मुंबई हमले के एक ही महीने बाद, दिसंबर 2008 में होना था. अपनी तैयारी के दौरान उसने जर्मनी की भी यात्रा की. हैम्बर्ग में उसने संभावित मददगारों से संपर्क किया. हैम्बर्ग को वह उसी समय से जानता था, जब मादक द्रव्यों की तस्करी किया करता था. उसका सोचना था कि हैम्बर्ग में वह ज़रूरी हथियार जुटा सकता है. ऐसे लोग भी पा सकता है, जो डेनमार्क में नियोजित हमले के काम आ सकते हैं. हैम्बर्ग के अपराध-जगत में हथियारों, मादकद्रव्यों और इस्लामी अतिवादियों सहित सब कुछ मिल जाता है.

पाकिस्तान की अपनी पिछली यात्रा के समय हेडली अल क़ायदा के इलियास कश्मीरी से मिला. कश्मीरी उन दिनों पाकिस्तान का और शायद पूरी दुनिया के सबसे ख़तरनाक आतंकवादियों में शुमार हुआ करता था. हेडली अल कायदा का साथी बन गया. इलियास कश्मीरी अन्य अपराधों के साथ-साथ न्यूयॉर्क में विफल रहे एक बम-हमले के लिए भी जाना जाता था. सीआईए उसकी तलाश में लगी हुई थी. इलियास ने हेडली का परिचय ब्रिटेन में अल क़ायदा के एक गिरोह से करवाया. यह गिरोह 2009 से ब्रिटिश गुप्तचर सेवाओं की नज़र में चढ़ चुका था.

ब्रिटिश गुप्तचर सेवा की हेडली पर नज़र

ब्रिटिश गुप्तचर सेवा एमआई6 भी हेडली की हरकतों पर नज़र रखने और अपनी जानकारियां अमेरिका को बताने लगी. हेडली पांच अगस्त 2009 को कोपेनहेगन से अमेरिका के अटलांटा पहुंचा और उसी शाम अटलांटा से शिकागो. शिकागो से वह 29 अक्टूबर की शाम सवा छह बजे कोपेनहागन के लिए उड़ने वाला था. उसकी उड़ान से कुछ ही पहले व्हाइट हाउस में एक आपात बैठक हुई. सीआईए के निदेशक ने राष्ट्रपति बराक ओबामा से कहा कि अब कोई न कोई निर्णय लेना ही होगा. ओबामा ने निर्णय लिया कि उसे (हेडली को) शिकागो हवाई अड्डे पर ही गिरफ्तार कर लिया जाये.

एफ़बीआईके एजेन्टों ने शिकागो हवाई अड्डे पर ही हेडली को धरदबोचा और उसे शहर में ही स्थित अपने मुख्यालय में ले गये. पूछताछ के समय उसने एक बार फिर लेन-देन वाली अपनी पुरानी चाल चली. बहुत कुछ उगला और इस बार भी अपनी मुख्य शर्तें मनवाने में सफल रहा. 166 लोगों की अकारण मौत के लिए ज़िम्मेदार होते हुए भी उसे मृत्युदंड के बदले 35 साल जेल की सज़ा सुनायी गयी.

न मृत्युदंड, न भारत को प्रत्यर्पण

न मृत्युदंड, न भारत के हाथों में कभी प्रत्यर्पण. भविष्य में न तो वह मुंह खोलेगा और न उससे संबंधित सारे प्रमाणों, सारी फ़ाइलों को खोला जायेगा! क्यों? क्योंकि हेडली के पेट और उससे संबंधित फ़ाइलों में संभवतः ऐसी-ऐसी सच्चाइयां छिपी हुई हैं, जिनके उजागर होने से अमेरिका का मुंह काला हो सकता है. बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों की पाकिस्तान की आईएसआई जैसी आतंकवादी संस्थाओं के साथ मिलीभगत की कलई खुल सकती है.

2014 में बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स के यहूदी संग्रहालय पर एक आतंकवादी हमला होता है. बाद में पेरिस, कोपेनहागन, पुनः पेरिस और पुनः ब्रसेल्स में. इन सब में मुंबई वाले हमले-जैसी ही स्क्रिप्ट मिलती है. मुंबई वाला हमला और आईएसआई वाला फॉर्मूला इस्लामी-जिहादी हमलों की सफलता का सबसे अनुकरणीय गुर बन गया.

‘यह बहुत ग़ंदा धंधा है’

रिचर्ड केम्प 2009 में ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर सेवा प्रभारी थे. गुप्तचर सेवाओं के काम के बारे में उनका कहना है, ‘यह बहुत ग़ंदा धंधा है. अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोपीय संघ आतंकवाद की रोकधाम के लिए बड़ी-बड़ी धनराशियां देते हैं, जो अंततः हमारे ही विरुद्ध आतंकवादी हमले करवाने के लिए ख़र्च की जाती हैं.’ आईएसआई की खुशामद में घुटने टेकने वाली जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा बीएनडी के अध्यक्ष रहे गेरहार्ड शिंडलर भी स्वीकार करते हैं, ‘यह धंधा ही कुछ ऐसा है कि अपने काम की मांग को पूरा करने के लिए हमें अपने नैतिक मूल्य पीछे रखने होते हैं. क्योंकि धंधा ऐसा है, और क्योंकि अंततः सफलता ही निर्णायक होती है.’

इसका अर्थ तो यही हुआ कि गुप्तचर सेवाओं के लिए नैतिकता की कोई अनुल्लंघनीय लक्षमण रेखा नहीं होती. साध्य ही सर्वोपरि है, साधन नहीं. सफलता दिलाने वाला हर हथकंडा पवित्र है, बाक़ी सब महत्वहीन है. डेविड हेडली और आईएसआई का उदाहरण यह भी दिखाता है कि गुप्तचर सेवाएं एक-दूसरे की विरोधी ही नहीं, सहयोगी भी होती हैं और आतंकवाद की आड़ में खुद ही एसे आतंकवादी पैदा करती हैं, जिनसे उन्हें वास्तव में लड़ना चाहिये.

असद दुर्रानी के दुर्दिन

22 फ़रवरी 2019 का समाचार है कि पाकिस्तानी सेना ने आईएसआई का निदेशक रहे असद दुर्रानी की पेंशन सहित सारे लाभ छीन लिये हैं. उन्होने भारत की रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत के साथ मिल कर जो पुस्तक प्रकाशित की है, वह सेना की आचारसंहिता का उल्लंघन है. यह पुस्तक मुंबई वाले 2008 के अंतंकवादी हमले, कश्मीर समस्या और गुफ्तचर सेवाओं के उन पर असर के बारे में है. दुर्रानी विदेश भी नहीं जा सकते.