क्या आपको बीते साल की उत्तर प्रदेश के निजामपुर गांव की वह बारात याद है, जिसमें बारातियों से ज्यादा पुलिस के जवान शामिल हुए थे! दरअसल उस बारात के दूल्हा संजय जाटव चाहते थे कि उनकी बारात घोड़ी पर निकले. जबकि स्थानीय ठाकुर समुदाय को इस बात से सख़्त ऐतराज था. नतीजन पुलिस और प्रशासन को मोर्चा संभालना पड़ा. तब कहीं जाकर शादी सकुशल संपन्न हो पाई थी.

लेकिन राजस्थान में जोधपुर के दुगर गांव से ताल्लुक रखने वाले सवाई राम इस मामले में इतने खुशकिस्मत नहीं निकले. बीती फरवरी में अपनी शादी के दौरान जब वे घोड़ी पर सवार होकर ससुराल पहुंचे तो दबंगों ने बारात पर हमला कर उन्हें घोड़ी से नीचे उतार दिया. बारातियों के साथ गाली-गलौज और मारपीट हुई, सो अलग. सवाईराम ने इसका आरोप राजपूत समुदाय के लोगों पर लगाया. राजस्थान का यह मामला ज्यादा सुर्खियों में इसलिए भी रहा क्योंकि सवाईराम खुद एक पुलिसकर्मी हैं!

ज़ाहिर तौर पर, यह बात सामने आते ही प्रशासन में हड़कंप मच गया. तुरत-फुरत कार्रवाई हुई. आरोपितों को पकड़कर मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस मुस्तैदी का एक कारण यह भी था कि घटना मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृह जिले जोधपुर में हुई थी और गृह मंत्रालय गहलोत के ही पास है.

लेकिन इतना हो-हल्ला होने के बाद भी प्रदेश में इस तरह की घटनाओं पर अंकुश नहीं लगाया जा सका. इसके कुछ ही दिन बाद चित्तौड़गढ़ की एक दलित दुल्हन का अपनी बिंदौली (शादी की एक रस्म) में बग्गी पर चढ़ना कुछ दबंगों को इतना नागवार गुज़रा कि उन्होंने लड़की के पिता और भाइयों को पीट-पीटकर लहुलुहान कर दिया.

राजस्थान में हर साल शादियों के मौसम में ऐसी दर्जनों ख़बरों का सामने आना आम बात है. अलग-अलग रिपोर्ट बताती हैं कि पिछले पांच साल में प्रदेश में दलितों को घोड़ी से उतारने के 80 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं. सिर्फ 2018 की ही बात करें तो इस दौरान ऐसी 33 घटनाएं दर्ज़ की गई थीं. वहीं 2019 के शुरुआती दो महीनों में ही ऐसी नौ घटनाओं की जानकारी मौजूद है.

समाजशास्त्री राजीव गुप्ता इन घटनाओं के कारणों के बारे में हम से तफ़सील से बात करते हैं. वे कहते हैं, ‘असल में ये प्रतीकों की लड़ाई है जो समाज ही नहीं बल्कि सरकार, प्रशासन और यहां तक कि निजी दफ़्तरों में भी देखी जा सकती है. खुद को उच्च भाव से देखने वाला कोई भी व्यक्ति अपने से निचले स्थान वाले किसी व्यक्ति को सांकेतिक तौर पर भी अपनी बराबरी में आते देखना पसंद नहीं करता, फिर चाहे वो कुछ पल के लिए ही क्यों न हो.’

राजीव गुप्ता आगे जोड़ते हैं, ‘चूंकि इस जानवर (घोड़ा/घोड़ी) का ऐतिहासिक संबंध राजशाही से जुड़ा है इसलिए इस पर बैठने के कई सारे संकेत निकलते हैं. पहला तो शासकीय है ही. लेकिन घोड़ी रखना या लाना संपन्नता का द्योतक भी है. और चूंकि उसे चलाने के लिए विद्वता की भी जरूरत होती है. इसलिए जब-जब कोई दलित घोड़ी या घोड़े पर सवार होता है तो वह जाने-अनजाने कई तरह के सामाजिक दुराग्रहों पर एक साथ कुठाराघात कर रहा होता है. यह बात कइयों को बर्दाश्त नहीं होती.’

राजस्थान में दलितों के लिए मुश्किलें इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यहां उनका इस तरह दमन करने में पिछड़ा वर्ग ( मुख्यतौर पर जाट और गुर्जर) और अनुसूचित जनजाति से जुड़े कुछ समुदाय (खासकर मीणा) भी कोई कसर नहीं छोड़ते.

सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र महला इस बारे में बताते हैं, ‘आजादी से पहले सामंतों के खिलाफ लड़ाई में पिछड़े वर्ग और दलितों ने एक दूसरे को भरपूर सहयोग दिया. बाद में भूमि अधिग्रहण कानून और आरक्षण की वजह से राजपूत तो प्रशासनिक और आर्थिक तौर पर पिछड़ते गए, वहीं उनकी जगह पिछड़े वर्ग (जाटों) ने ले ली. यहीं से एक नए तरह के सामंतवाद का उभार हुआ.’ महला आगे जोड़ते हैं, ‘चूंकि सदियों से पिछड़ा वर्ग (जाट) दलितों के सीधे संपर्क में था. इसलिए आगे चलकर वह प्रतिस्पर्धा भी इन्हीं से करने लगा. संवैधानिक अधिकारों की मदद से पिछड़ा वर्ग खुद तो आगे बढ़ गया. लेकिन जब-जब दलितों ने ऐसा करने की कोशिश की तो उनसे वह सहन नहीं हुआ. और ऐसी घटनाएं सामने आने लगीं.’

राजस्थान में अलग-अलग स्तर पर वर्ग-संघर्ष से जूझ रहे दलितों को हाल ही में बड़ा धक्का तब लगा जब मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी उनके साथ ऐसी ही एक घटना को अंजाम दिया. भीलवाड़ा जिले के मांडन कस्बे में मुंडन के बाद एक दलित बच्चे को घोड़ी पर बिठाया गया था. लेकिन घोड़ी के मस्जिद के सामने से गुजरने पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताते हुए उस बच्चे को नीचे गिरा दिया जबकि उस समय मस्जिद में कोई मज़हबी रवायत जारी नहीं थी. यह मामला इसलिए भी ज्यादा चौंकाता है क्योंकि बीते कुछ वर्षों के दौरान देशभर में सामाजिक-राजनैतिक उत्थान के लिए दलित-मुस्लिम एकता के नारे जोर-शोर से कहे-सुने जा रहे हैं.

दलित सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता ताराचंद वर्मा इस बारे में कहते हैं, ‘ऊंच-नीच के इस संक्रमण से इस्लाम भी अछूता नहीं है.’ बकौल वर्मा ‘ग्रामीण परिवेश के मुस्लिमों में दलितों के प्रति दुर्भावना आसानी से महसूस की जा सकती है. यह निराशाजनक है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारी सामाजिक चेतना में एक समुदाय विशेष के प्रति दुराग्रह या घृणा का जो भाव मौजूद है, उसे राजनीति और शिक्षा मिलकर भी दूर नहीं कर पाईं.’

इस तरह की बढ़ती घटनाओं के लिए लिए वर्मा प्रशासन और पुलिस की नीयत पर भी बड़ा सवाल खड़ा करते हैं. उनके शब्दों में ‘कई मामलों में कानून के रक्षक ही आरोपितों को किसी न किसी रूप में समर्थन देते दिखे हैं. यदि ऐसा कोई मामला पुलिस के पास पहुंचता है तो शांति व्यवस्था का हवाला देकर दलितों पर ही समझौते के लिए दबाव बनाया जाता है और कोशिश की जाती है कि वे घोड़ी पर चढ़ने ही न पाएं.’ वर्मा के मुताबिक अव्वल तो पुलिस इस तरह के मामले दर्ज़ करने में आना-कानी करती है. किसी तरह ऐसा हो भी जाए तो जांच में जबरदस्त ढिलाई और लापरवाही बरती जाती है.

सामाजिक संगठन ‘दलित मानव अधिकार केंद्र’ के निदेशक व अधिवक्ता सतीश कुमार वर्मा की बात को आगे ले जाते हैं. वे कहते हैं कि यदि घोड़ी से उतारने के कुछ मामलों में पुलिस कार्रवाई कर भी लेती है तो बाद में दलितों को अलग-अलग तरह से इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ता है. इसके उदहारण गिनवाते हुए वे कुछ साल पहले राजधानी जयपुर के एक कस्बे में हुई घटना की याद दिलाते हैं, जब पुलिस के हस्तक्षेप के बाद दबंगों ने उस कुएं में ज़हर डाल दिया, जिसमें से दलित पानी भरते थे.

दलितों को लेकर शासन और प्रशासन किस हद तक बेपरवाह हैं इसका ज़िक्र करते हुए कुमार कहते हैं, ‘गांवों में दलितों के साथ इस तरह की घटनाओं की रोकथाम के लिए, ग्राम पंचायत राज एक्ट-1995 के तहत सामाजिक न्याय समितियां बनाए जाने का प्रावधान था. लेकिन इनके गठन को लेकर कभी कोई गंभीरता नहीं बरती गई. इसी तरह ब्लॉक और जिला स्तर पर भी ऐसी कमेटियां बनाने के अलग नियम मौजूद हैं, लेकिन वे भी फाइलों से बाहर नहीं आ पाए.’

बकौल कुमार, ‘राज्य में दलितों की सुरक्षा के लिए एसटी/एससी अत्याचार निवारण अधिनियम- 1995 के (नियम-16 के) तहत एक उच्च स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति का गठन किया जाना निर्देशित है जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करता है. लेकिन 2012 के बाद प्रदेश में इससे जुड़ी कोई बैठक नहीं हुई.’

इस बारे में सतीश कुमार ने 2015 में हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की थी जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार को एक महीने के भीतर यह कमेटी गठित कर, खुद को सूचित करने का आदेश दिया था. लेकिन कुमार की मानें तो तीन वर्ष बाद भी हाई कोर्ट के उस आदेश का पालन नहीं पाया है.

सतीश कुमार द्वारा दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट का फैसला
सतीश कुमार द्वारा दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट का फैसला

दलितों को घोड़ी से उतारे जाने के पीछे कुछ लोगों की दलील है कि घुड़चढ़ी या बंदौली के वक़्त दलित जानबूझकर समुदाय विशेष के मकानों के बाहर तेज आवाज़ में गाना-बजाना कर उन्हें उत्तेजित करते हैं. लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ सतीश कुमार इस तरह की बातों को सिरे से नकारते हैं. नाराज़गी के साथ वे कहते हैं, ‘ऐसे तर्क देने वाले लोग उन मामलों में क्या कहेंगे जब खामोशी से गुज़र रहे दलितों के जनाजों पर हमले कर उनके शव तक गिरा दिए जाते हैं.’

दलित-सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी भी इन दलीलों को सिर्फ जवाबी कुतर्क घोषित करते हैं. साथ ही एक गौर करने लायक तथ्य की तरफ इशारा करते हैं, ‘गांवों में हर बारात गलियों में वहीं रुककर नाच-गाना करती है जहां कुछ खुली जगह होती है. और चूंकि गांव के प्रभावशाली परिवारों के मकानों के बाहर इस तरह की जगह अमूमन मिल ही जाती है, इसलिए कुछ देर वहां रुकना हो जाता है, लेकिन कई लोग इसका गलत मतलब निकाल लेते हैं.’

हालांकि मेघवंशी इस बात से राहत भी जताते हैं कि दलितों को घोड़ी से उतारे जाने की हालिया घटनाओं की राजपूत समुदाय के प्रबुद्ध लोगों ने जमकर निंदा की है. मेघवंशी बीते कुछ महीनों के ऐसे कई उदाहरण भी गिनाते हैं जिनमें राजपूत समुदाय ने आगे बढ़कर दलित दूल्हा-दुल्हन की घुड़चढ़ी का स्वागत किया. इस चर्चा को बढ़ाते हुए मेघवंशी पिछले महीने जयपुर में आयोजित ‘सामाजिक सद्भावना संवाद’ कार्यक्रम का भी ज़िक्र करते हैं जिसमें शामिल अलग-अलग सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस तरह की घटनाओं को रोकने का संकल्प लिया था.

इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह भियाड़ अपने समुदाय के उन लोगों को जमकर आड़े हाथों लेते हैं जो दलितों के साथ इस तरह का व्यवहार करते हैं. वे कहते हैं कि किसी की खुशियों में खलल डालने वाले लोगों के ख़िलाफ समाज और प्रशासन को मिलकर सख़्त से सख़्त कदम उठाने होंगे, तभी ये घटनाएं रुकेंगी. भियाड़ ये भी कहते हैं कि चंद लोगों की वजह से पूरे समुदाय को शर्मसार होना पड़ता है.

सामाजिक कार्यकर्ता यशवर्धन सिंह शेखावत भी भियाड़ की बातों से सहमति जताते हुए आपसी संवाद को इस समस्या का हल बताते हैं. शेखावत कहते हैं, ‘किसी जमाने में घोड़ी चढ़ना ठीक उसी तरह शान का प्रतीक समझा जाता था जैसे कि आज गाड़ियों पर लगी लाल बत्ती को. लेकिन समाज को समझना होगा कि अब, जब बत्तियों के ही दिन लदने की तैयारी में हैं तो हम घोड़ी पर अटके रहकर किस युग में जीना चाहते है?’

इस तरह के संवेदनशील मामलों को व्यवहारिक सहजता के साथ किस तरह संभाला जा सकता है, इसके उदाहरण के तौर पर शेखावत अपने बचपन का दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं. वे कहते हैं, ‘एक दिन गांव के एक ठाकुर साहब बड़ी तैश में हमारे दादा जी के पास आए और बोले कि गांव का एक दलित अपनी बिंदौली घोड़ी पर निकालने की तैयारी कर रहा है और हमें हर हाल में ये गड़बड़ रोकनी होगी. बड़ी गंभीरता के साथ दादा जी ने जवाब दिया, ये गड़बड़ जरूर रोकी जाएगी; बस एक बार घोड़ी भी आकर कह दे कि वह उस दलित को अपने ऊपर नहीं बिठाना चाहती!’