भारतीय वायु सेना के जांबाज़ पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान दो दिन तक पाकिस्तान की ग़िरफ़्त में रहने के बाद शुक्रवार, एक मार्च को सकुशल स्वदेश लौट आए. पूरे देश ने उनकी वापसी का जश्न मनाया. अभिनंदन भारतीय वायुसेना के पहले ऐसे लड़ाकू पायलट हैं जिन्होंने किसी एफ-16 विमान को मार गिराया है.

लेकिन इस जश्न के बीच कुछ सवाल हैं जो पीछे नहीं छूटने चाहिए. ये सवाल मिग-21 बायसन ड़ाकू विमानों से जुड़े हैं. विंग कमांडर अभिनंदन ने इन्हीं के सहारे भारतीय सीमा में घुस आए पाकिस्तानी एफ-16 लड़ाकू विमानों को खदेड़ा था. उस समय आईं ख़बरों की मानें तो अभिनंदन जब पाकिस्तानी विमानों का पीछा कर रहे थे तो काफ़ी मशक्क़त के बाद वे अपने विमान से मिसाइल छोड़ सके. इससे अंतत: एक पाकिस्तानी विमान गिराने में तो उन्हें सफलता मिली. लेकिन उनका अपना विमान गलती से पाकिस्तान की हवाई सीमा में दाख़िल हो गया और पाकिस्तानी सेना के निशाने पर आ गया. अभिनंदन को मज़बूरन पैराशूट से पाकिस्तानी सरज़मीं पर उतरना पड़ा.

ये ख़बर सूत्रों के हवाले से आई थी. इसलिए इसमें थोड़ा कुछ आगा-पीछा हो सकता है. लेकिन मिग-21 विमानों से जुड़े जो तथ्य-आंकड़े उपलब्ध हैं उनमें आगे-पीछे की ग़ुंज़ाइश नहीं दिखती. आंकड़ों और तथ्यों का विश्लेषण करने वाली वेबसाइट इंडियास्पेंड ने यहां भी अपना काम किया है. इसके नतीज़े में जाे तस्वीर उभरती है वह चिंताजनक से आगे वाली है. इसीलिए ‘वायु एयरोस्पेस एंड डिफेंस’ के संस्थापक संपादक पुष्पिंदर सिंह कहते हैं, ‘जो मुल्क अपनी वायु सेना को गंभीरता से लेते हैं उनमें भारत शायद दुनिया का आख़िरी देश है जो मिग-21 का इस्तेमाल करता है. यह हमारे लिए राष्ट्रीय शर्म की बात है कि 2019 में हम अपने वायु सैनिकों को ये विमान उड़ाने के लिए दे रहे हैं.’

सिंह आगे कहते हैं, ‘हर विमान की उम्र होती है. मिग-21 की भी है, जो 20 साल पहले पूरी हो चुकी है. इसके बावज़ूद इन्हें सुधारकर, इनका कुछ उन्नयन (अपग्रेड) कर, इनसे काम लिया जा रहा है. इनकी उम्र बढ़ाने की कोशिश हो रही है. भारत सरकार की योजना के मुताबिक 2022 तक इनसे अभी और काम और लिया जाना है. इसके बाद इन्हें चरणबद्ध तरीके से मिग-23 और मिग-27 के साथ बाहर किया जाएगा.’ इसी तरह पूर्व एयर मार्शल (पश्चिमी कमान) पदमजीत सिंह अहलूवालिया कहते हैं, ‘मिग विमान 1960 और 1970 के दशक की तकनीक के हिसाब से बने हैं. जबकि आज हम 2020 पर पहुंचने वाले हैं. इसीलिए यह विचित्र बात है कि भारतीय वायु सेना को अब भी इतने पुराने विमानों पर निर्भर रहना पड़ रहा है. इन विमानों का उस एफ-16 विमान से भी कोई मेल नहीं है जिन्हें पाकिस्तान इस्तेमाल करता है.’

मिग विमानों को ‘उड़ते ताबूत’ कहा जाता है

भारतीय वायु सेना में पहली बार 1960 के दशक में शामिल किए गए मिग विमानों को 1990 के दशक में उपयोग से बाहर हो जाना चाहिए था. लेकिन हुआ क्या? बायसन मानकों के अनुरूप इनको उन्नत कर इनसे अब तक काम लिया जा रहा है. और तो और 1980 के दशक तक मिग के ही उन्नत संस्करणों (मिग-23, मिग-27 आदि) को वायु सेना के लिए तरज़ीह दी जाती रही. उन्हें शामिल किया जाता रहा. उनमें से भी सब के सब अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं. इससे इनकी तमाम कार्यप्रणालियां अक़्सर अहम मौकों पर धोखा दे जाती हैं. इसकी वज़ह से ये विमान लगातार दुर्घटनाग्रस्त भी हो रहे हैं. इन विमानों की दुर्घटनाएं अब तो इतनी आम हो चली हैं कि इन्हें भारतीय वायु सेना के पायलटों के लिए ‘उड़ते ताबूत’ का तमगा तक दे दिया गया है.

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक रूस के बने इन विमानों में से 1971 से 2012 के बीच 482 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं. यानी हर साल 12 के करीब. इसके बाद जैसा कि मार्च-2016 में केंद्र सरकार ने ख़ुद संसद में बताया है, ‘साल 2012 से 2016 के बीच वायु सेना के कुल 28 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए. इनमें आठ यानी एक चौथाई मिग-21 थे. उनमें छह मिग-21 ऐसे थे जिनको उन्नत कर दिया गया था.’ इसके बाद सरकार ने मई-2012 में संसद में जो जानकारी दी उसके मुताबिक ‘साल 1971 से 2012 के बीच दुर्घटनाग्रस्त हुए 482 मिग विमानों की वज़ह से 171 पायलटों, 39 आम नागरिकों, आठ सैन्यकर्मियों और विमान के चालक दल के एक सदस्य की जान चली गई.’

मिग-21 विमान, एफ-16 के सामने कहां ठहरते हैं?

भारतीय वायु सेना बीते 50 साल से मिग विमानों का इस्तेमाल कर रही है. ये वायु सेना के बेड़े में सबसे पुराने विमान हैं. सेवानिवृत्त एयर मार्शल वीके जिम्मी भाटिया भी कहते हैं, ‘हमारे पास अब भी पुराने मिग विमानों का बेड़ा है. हालांकि क़रीब एक दशक पहले हमने इन्हें बायसन मानकों के अनुरूप उन्नत करना शुरू किया था. इसके तहत विमानों में राडार, दिशासूचक क्षमता आदि बेहतर की गई. लेकिन यह भी सच है कि इस उन्नयन के बावज़ूद इन विमानों की उम्र पूरी हो चुकी है.’ भाटिया वायु सेना की पश्चिमी कमान के प्रमुख रह चुके हैं.

भाटिया आगे कहते हैं, ‘जहां तक पाकिस्तानी वायु सेना द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे एफ-16 विमानों का ताल्लुक़ है तो उनकी तकनीक काफी उन्नत है. ख़ास तौर पर उनके राडार, दिशासूचक क्षमता और अन्य क्षमताएं. मारक क्षमता भी एफ-16 की मिग के मुकाबले बेहतर है. उम्र के हिसाब से भी ये मिग की तुलना में अपेक्षाकृत नए हैं. पाकिस्तानी वायु सेना को इनका इस्तेमाल करते हुए अभी 40 साल नहीं हुए हैं. एफ-16 के ब्लॉक-50 जैसे कुछ मॉडल तो उसे अभी 10 साल पहले मिले हैं. हालांकि मिग-21 बायसन रूसी मिसाइलों को ले जाने में अब भी सक्षम हैं और यही एक इकलौता ऐसा बिंदु है जहां वे एफ-16 के मुकाबले कमतर नहीं लगते. बाकी उम्र तो उनकी पूरी हो ही चुकी है.’

वायु सेना की पश्चिमी कमान के पूर्व प्रमुख सेवानिवृत्त एयर मार्शल पदमजीत सिंह अहलूवालिया कहते हैं, ‘मिग-21 मूलभूत लड़ाकू विमान है. इसका न तो इंजन विश्वसनीय है और न ही इससे सटीक निशाना साधने वाले उन्नत हथियार संचालित हो सकते हैं. जबकि आधुनिक लड़ाकू विमानों आधुनिक उच्च क्षमता वाले राडार, उतने बेहतर हथियार, ज़्यादा वज़न उठाने की क्षमता, छिपकर दुश्मन को चकमा देने और सटीक निशाना साधने की काबिलियत, आदि से लैस रहने की ज़रूरत होती है.’ अलबत्ता इस तमाम कमतरी के बावज़ूद वायु सेना के शीर्ष अधिकारी इस विमान के इस्तेमाल का बचाव भी करते हैं. उनके मुताबिक, ‘मिग हमारे लड़ाकू विमानों की सूची का एक हिस्सा है. मुख्य विमान नहीं है. दुश्मन की चुनौती, समय और अभियान की ज़रूरत के हिसाब से हम इसका और अन्य विमानों का इस्तेमाल करते हैं.’

ज़रूरत नए विमानों की है

यानी कुल मिलाकर स्थिति यह है कि वायु सेना को नए लड़ाकू विमानों की वर्तमान में पूरी शिद्दत से ज़रूरत महसूस हो रही है. यह ज़रूरत आज से नहीं बल्कि 1980 के दशक से महसूस की जा रही है. इसीलिए देश ने हल्के लड़ाकू विमान ‘तेजस’ को विकसित करने का कार्यक्रम शुरू किया. इसे भी तीन दशक के क़रीब हो गए हैं. अब कहीं जाकर जुलाई-2016 में वायु सेना को पहला तेजस विमान मिला है. उसे भी उड़ाने के लिए अंतिम रूप से हरी झंडी 20 फरवरी 2019 को मिल पाई है. यानी जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ (केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल) के काफ़िले पर हुए आतंकी हमले में 42 जवानों की जान गंवाने के एक सप्ताह बाद.

बहुआयामी भूमिका निभाने वाले मध्यम दर्ज़े के लड़ाकू विमान (एमआरसीए) का भी यही हाल है. कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र की यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार ने 2007 में एमआरसीए हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की थी. इसके तहत चुनी हुई कंपनियों से 126 एमआरसीए हासिल किए जाने थे. इनमें 18 तैयार हालत में भारत आने थे जबकि 108 भारत में बनाए जाने थे. उनकी तकनीक भी भारत काे हस्तांतरित किए जाने पर सहमति बनी थी. लेकिन 2014 में बनी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया को किनारे कर दिया. मोदी सरकार ने सीधे फ्रांस सरकार से बात की और अब नए सौदे के तहत 36 रफाल विमान फ्रांसीसी कंपनी डसॉ भारतीय ज़रूरतों के हिसाब से तैयार कर भारत भेजने वाली है. अलबत्ता यह पूरा सौदा पारदर्शिता के अभाव की वज़ह से विवादों में भी है.

तिस पर पुष्पिंदर सिंह की मानें तो ‘रफाल विमान वास्तव में मिग विमानों की जगह नहीं ले सकते. ये बहुत उच्चस्तरीय, जटिल और परिष्कृत किस्म के विमान हैं. जबकि युद्ध के मोर्चे पर छोटे, हल्के और सस्ते लड़ाकू विमानों की ज़रूरत कहीं ज़्यादा होती है.’ पूर्व एयर मार्शल भाटिया भी कहते हैं, ‘समय, परिस्थिति और चुनौती के हिसाब से वायु सेना को अलग-अलग आकार तथा दर्ज़े के विमानों की ज़रूरत होती है. और हक़ीक़त ये है कि इस वक़्त वायु सेना के पास हर तरह के लड़ाकू विमानों ज़बर्दस्त कमी है. हमें हमारी ज़रूरतों काे पूरा करने के लिए 400 के लगभग लड़ाकू विमानों की तुरंत आवश्यकता है. हम इस आवश्यकता को नज़रंदाज़ करने की स्थिति में नहीं हैं.’

आंकड़े भी इन्हीं बातों की पुष्टि करते हैं. इनके मुताबिक, ‘वायु सेना के पास इस समय लड़ाकू विमानों की 31 दस्ते (स्क्वाड्रन) हैं. जबकि उसको ज़रूरत 42 दस्तों की है. यह अंतर इसलिए है क्योंकि नए विमान आने की रफ़्तार बहुत धीमी है और पुराने चलन-संचालन से बाहर होते जा रहे हैं.’ दिसंबर-2017 में आई संसदीय समिति की एक रिपोर्ट में ही यह उल्लेख है. इस पर भी चिंताजनक बात यह है कि अगले एक दशक के भीतर मिग-21, मिग-27 और मिग-29 विमानों के 14 दस्ते भी बाहर हो जाएंगे. उस सूरत में अगर जल्द नए विमान हासिल नहीं किए गए तो 2027 तक लड़ाकू विमानों के 19 और 2032 तक 16 दस्ते ही वायु सेना के पास रह जाएंगे.

विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान की रिहाई के जश्न के बीच इन तमाम तथ्यों पर विचार भी उतना ही ज़रूरी है.

(यह रिपोर्ट मूल रूप से इंडियास्पेंड में सहायक संपादक एलिसन सलदान्हा ने लिखी है)