माना जाता है कि चुनावी जनादेश किसी सरकार का जनता द्वारा बनाया गया रिपोर्ट कार्ड होता है. भारत में भी वह घड़ी आ पहुंची है. आम चुनाव में एक से भी कम महीना बचा होने के बीच सरकार और विपक्ष के बीच की जुबानी जंग चरम पर पहुंचती दिख रही है. इस जंग का आखिरी फैसला मतदाताओं को करना है. मतदाताओं के जिन वर्गों की इस फैसले में अहम भूमिका रहने वाली है उन्हें लुभाने की मोदी सरकार ने आखिरी वक्त तक कोशिश की है. आइए जानते हैं ये वर्ग कौन से हैं.

किसान

मोदी सरकार ने अंतरिम बजट में देश के छोटे किसानों को राहत देने के लिए इस योजना के तहत सालाना 6,000 रुपये देने का एलान किया था. बीती 24 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में इस योजना की शुरुआत की. इसके तहत एक करोड़ से अधिक किसानों के बैंक खाते में 2,000 रुपये के रूप में पहली किस्त भेजी गई. बताया जाता है कि इस योजना से देश के 12 करोड़ छोटे और सीमांत किसान (दो हेक्टेयर तक की जमीन) लाभान्वित होंगे.

बीते साल नवंबर में देश भर के किसानों ने दिल्ली में मार्च कर मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया था. सत्याग्रह के साथ बातचीत में ऐसे कई किसानों ने सरकार को चुनाव में सबक सिखाने की भी चेतावनी दी थी. इससे पहले छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा की हार के पीछे एक बड़ी वजह किसानों की नाराजगी को माना गया था. इन राज्यों के नतीजों के बाद जानकारों का कहना था कि मोदी सरकार यदि आम चुनाव से पहले इस नाराजगी को दूर नहीं कर पाई तो उसका फिर से सत्ता में वापस लौटना मुश्किल हो सकता है.

नौजवान

साल 2014 के चुनाव से पहले भाजपा ने सत्ता में आने पर युवाओं को हर साल दो करोड़ नौकरियां देने वादा किया था. लेकिन कई शोध रिपोर्टों की मानें तो इस सरकार के कार्यकाल में रोजगार मिलने की जगह नौकरीशुदा लोगों को अपना रोजगार गंवाना पड़ा है. इसकी बड़ी वजह साल 2016 में नोटबंदी जैसे फैसले को भी माना जा रहा है. स्वतंत्र परामर्शदाता संगठन सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) ने हाल ही में अनुमान जताया था कि अकेले 2018 में ही देश में 1.10 करोड़ लोगों को नौकरियां गंवानी पड़ीं.

हालांकि सरकार इस तरह की खबरों को खारिज करती रही है. कुछ समय पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया था कि उनकी सरकार के कार्यकाल के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के करोड़ों अवसर पैदा हुए हैं. प्रधानमंत्री का कहना था, ‘चाहे पर्यटन हो या विनिर्माण या सेवा क्षेत्र, पिछले साढ़े चार साल के दौरान रोजगार के करोड़ों अवसर सृजित हुए हैं.’ नरेंद्र मोदी के मुताबिक सरकार सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) की हरसंभव तरीके से मदद कर रही है. इसके अलावा मोदी सरकार ने हाल में कुछ बड़े ऐलान भी किए हैं. मसलन कुछ समय पहले रेल मंत्री पीयूष गोयल का कहना था कि अगले दो वर्षों में रेलवे में चार लाख कर्मचारियों की भर्ती की जाएंगी. हालांकि सरकार के आलोचकों का कहना है कि वह रोजगार के मुद्दे पर युवाओं को कोई ठोस या फिर तात्कालिक राहत देने की जगह उन्हें राष्ट्रवाद का झुनझुना थमाती हुई दिखी है.

सवर्ण

बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) कानून-1989 में एक अहम बदलाव किया था. उसने इस कानून के तहत मामला दर्ज होने पर आरोपित की तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. इसके बाद भाजपा के सहयोगी दलों के साथ दलित-आदिवासी समुदाय ने भी मोदी सरकार से इस फैसले को निष्प्रभावी करने की मांग की थी. बढ़ते दबाव को देखते हुए सरकार को शीर्ष अदालत के फैसले को बेअसर करने के लिए अध्यादेश का रास्ता अपनाना पड़ा. हालांकि, इसके बाद भाजपा शासित राज्यों और केंद्र की मोदी सरकार को सवर्णों की नाराजगी के रूप में नई चुनौती का सामना करना पड़ा.

हिंदी पट्टी के राज्यों में सवर्णों को भाजपा समर्थक माना जाता है. इस लिहाज से मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के सवर्ण मतदाताओं ने सत्ताधारी भाजपा पर दबाव बनाने के लिए अक्टूबर-नवंबर में होने वाले चुनाव में ‘नोटा’ विकल्प के इस्तेमाल की चेतावनी दी थी. बहुत से लोग मानते हैं कि इन राज्यों में भाजपा को सवर्णों के इस रुख का नुकसान सत्ता गंवाकर उठाना पड़ा. माना जा रहा है कि यदि सवर्णों का पूरा साथ भाजपा को मिला होता तो राजस्थान और मध्य प्रदेश के कांटे के मुकाबले में वह कांग्रेस के मुकाबले 20 साबित हो सकती थी.

इन नतीजों के सामने आने के महीने भर के भीतर ही जनवरी में केंद्रीय कैबिनेट ने सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में गरीब सवर्णों को 10 फीसदी सामान्य आरक्षण देने का फैसला कर दिया. इसका लाभ उन परिवारों को मिलेगा जिनकी सालाना आय आठ लाख रु तक है. बिना किसी चर्चा के अचानक लिए गए इस फैसले से विपक्ष सहित एक बड़ा तबका चौंक गया. आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग वक्त-वक्त पर पहले उठती रही है. लेकिन, इसे लेकर फिलहाल सरकार पर कोई दबाव नहीं दिख रहा था. इस लिहाज से माना गया कि सरकार ने चुनाव से पहले सवर्णों के एक बड़े तबके पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए यह फैसला किया है.