निर्देशक : अभिषेक चौबे

लेखक : सुदीप शर्मा, अभिषेक चौबे

कलाकार : सुशांत सिंह राजपूत, भूमि पेडनेकर, मनोज बाजपेयी, रणवीर शौरी, आशुतोष राणा

रेटिंग : 4/5

चंबल के बीहड़ की पृष्ठभूमि पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म आज भी शेखर कपूर की झकझोर कर रख देने वाली ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) ही है. जिस तरह मुंबई की गरीबी के यथार्थवादी चित्रण में ‘सलाम बॉम्बे!’ का कोई सानी नहीं है, उसी तरह चंबल के क्रूर जीवन को ‘बैंडिट क्वीन’ से बेहतर आज तक कोई पेश नहीं कर पाया है. चंबल के ये बीहड़ बदला प्रधान गाथाओं पर बनने वाले हिंदी सिनेमा के लिए जाने जाते रहे हैं, और ‘मेरा गांव मेरा देश’ व ‘गंगा जमुना’ जैसी साठ-सत्तर के दशक की फिल्मों से लेकर ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘पान सिंह तोमर’ तक इन फिल्मों की मुख्य थीम नायक/नायिका द्वारा अपने खिलाफ हुए अन्याय का बदला लेना रही है.

‘सोनचिड़िया’ इस मायने में इन फिल्मों से अलग है कि वह रिवेंज लेने की इस परिचित थीम को बॉलीवुड के परिचित दायरों में बांधकर एक्सप्लोर नहीं करती, बल्कि इसे सर के बल पलटने के अलावा खुद को बागियों के अंतर्मन में झांकने की महागाथा भी बना देती है. यहां सिस्टम का सताया हुआ ऐसा कोई बागी नहीं है जिसे सरकार से, जमींदार से, ऊंची जात वालों से बदला लेना है. बल्कि बागी होने के फैसले से जूझते हुए कुछ गंवई इंसान हैं जो लगातार ये सवाल करते हैं कि आखिर हम बागियों का ‘धर्म’ क्या है.

यह फिल्म फैक्ट और फिक्शन का मारक फेंटा लगाने वाली एक काल्पनिक कहानी कहते हुए चंबल के इन बागियों के मनोविज्ञान को टटोलती है, और अपनी महीन लिखाई, आलातरीन निर्देशन, अति की प्रभावशाली सिनेमेटोग्राफी और अलहदा पार्श्व संगीत की वजह से अथाह हिंसा के बावजूद ध्यान में डूबा हुआ एक मेडिटेटिव सिनेमा बन जाती है.

धीमी गति का यह सुलगता हुआ सिनेमा अपनी गहरी बातें कहने के लिए काफी बिल्ड-अप का सहारा लेता है. अगर आप उन लोगों में हैं जो कि समझते हैं कि सिनेमा में धीमे लेकिन उम्दा बिल्ड-अप के परिणाम हमेशा अच्छे मिलते हैं तो यह शर्तिया आपके मिजाज की फिल्म है. न सिर्फ सुदीप शर्मा की परतदार पटकथा सलीके से धीरे-धीरे खुलती है और सत्तर के दशक के एक असली लाल पट्टीधारी बागी को अपनी काल्पनिक कहानी में जबरदस्त अंदाज में पिरोती है (हमें तो भईया टेरंटिनो की ‘इनग्लोरियस बॉस्टर्ड्स’ में लगा फैक्ट और फिक्शन का मारक फेंटा याद आ गया!), बल्कि कई मामूली-गैरमामूली लगते सब-प्लॉट्स को अपनी मुख्य कहानी में बेहद कुशलता से मिलाते चलती है.

यह फिल्म अपनी स्टाइल भले ही हॉलीवुड की वेस्टर्न जॉनर वाली फिल्मों से लेती है और उससे हमारे बीहड़ों की मिट्टी में सनी एक कहानी कहती है, लेकिन कहीं भी अतिरंजना का शिकार नहीं होती. अगर फूलन देवी का जीवन शेखर कपूर से बेहतर कोई नहीं दिखा पाया (‘बैंडिट क्वीन’), तो एक वक्त में आतंक का पर्याय रहे चंबल के बागियों की ‘सोनचिड़िया’ से बेहतर कैरेक्टर-स्टडी आपको वर्तमान समय के सिनेमा में नहीं मिलने वाली.

फिल्म, चंबल में पाई जाने वाली लेकिन यदा-कदा ही नजर आने वाली दुर्लभ सोनचिरैया नाम की चिड़िया का रूपक भी बेहद प्रभावशाली अंदाज में उपयोग करती है. ‘बीहड़ में सब अपनी-अपनी सोनचिरैया ढूंढ़ रहे हैं’ जैसे मुक्ति और पश्चाताप वाले कई फलसफों से लदे मारक देसी संवाद आपको विशाल भारद्वाज की याद दिलाएंगे, लेकिन लिखा इन्हें सुदीप शर्मा ने है. साफ तौर पर उनके अलावा फिल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे पर भी विशाल का विशाल प्रभाव है और ऐसा होने से ‘सोनचिड़िया’ को विशाल भारद्वाज के लीग की ही सुंदर सिनेमैटिक लैंग्वेज मिलती है. पार्श्व-संगीत सुनकर भी आपको लगेगा कि ये भी विशाल का रचा हुआ है, लेकिन उन्होंने सिर्फ फिल्म का संगीत दिया है. बैकग्राउंड स्कोर नरेन चंदावरकर और बेनेडिक्ट टेलर ने मिलकर रचा है और कई-कई दृश्यों में तो यह अद्भुत के स्तर का है. पन्ने पर लिखे सीन को जितना बेहतर एक्टरों ने समझा है, उतना ही संगीतज्ञों ने भी.

हिंदी सिनेमा को सिर्फ हिंदी भाषा तक सीमित रखने की चाहत रखने वाले दर्शकों को क्लिष्ट बुंदेली बोली से थोड़ी परेशानी हो सकती है. चौबे की ‘उड़ता पंजाब’ के वक्त भी कई दर्शकों ने इस बात पर आपत्ति की थी कि इतनी ज्यादा पंजाबी जुबान इस्तेमाल करने वाली फिल्म हिंदी फिल्म कैसे हो सकती है. लेकिन ये सब तंग बातें हैं, और सिनेमा को भाषा-बोली की बंदिशों में बांधना गलत है. एक जमाने में हमारे हिंदुस्तान ने ‘बैंडिट क्वीन’ में शुद्ध रूप वाली मुश्किल बुंदेली बोली को क्रूर गालियों के साथ अपनाया था तो अब उसका सरल रूप अंग्रेजी सबटाइटल्स के साथ रिलीज हुई ‘सोनचिड़िया’ में अपनाने में कैसी परेशानी.

‘सोनचिड़िया’ जातिवाद, पितृसत्ता, दमित महिलाओं की स्थिति, हिंसा से पैदा दुस्वप्नों जैसी कई थीम्स को समानांतर पटकथा का हिस्सा बनाती है और खासकर भूमि पेडनेकर के बहादुर पात्र इंदुमति तोमर के बहाने अपनी सबसे बड़ी खासियत चित्रित करती है. पारिवारिक हिंसा से लेकर यौन उत्पीड़न तक, और जातिवाद के जहर से लेकर चंबल के हिंसक इतिहास में महिलाओं के होते शोषण पर उतनी ही ज्वलंत कमेंट्री करती है जितनी कि एक जमाने में ‘बैंडिट क्वीन’ ने की थी (हमने इतना जिक्र अभी तक ‘बैंडिट क्वीन’ का कर दिया है कि आपको समझ आ ही गया होगा कि इस महान फिल्म को देखने के बाद ‘सोनचिड़िया’ देखना ज्यादा फायदेमंद है). लेकिन, ये मत समझिए कि यह सब एक गुजरे हुए जमाने के दर्द हैं, सिर्फ बीहड़ ही बेरहम था, क्योंकि अभिषेक चौबे बिना ढिंढोरा पीटे ही एक पुरानी कहानी और आज के मीटू एरा के बीच पैरेलल खींचने में सफल रहते हैं.

कहना न होगा कि भूमि पेडनेकर फिल्मी सुंदरता से कोसों दूर खड़े ऐसे किरदार में बेहद प्रभावशाली काम करती हैं. उनको सलाम! उतनी ही ईमानदारी से सुशांत सिंह राजपूत भी बागी बनते हैं और वे भी फिल्मी सुंदरता से खुद को कोसों दूर रखते हैं. ‘बागी धर्म’ पर सवाल उठाने वाला उनका किरदार धीरे-धीरे आप पर चढ़ता है और फिल्म खत्म होने के बाद लेमनचूस खाने की इच्छा के साथ-साथ आप जीवन से हताश लेकिन सच के साथ खड़े उनके किरदार को भी घर लेकर आते हैं.

फिर ‘सोनचिड़िया’ उस तरह की फिल्म भी नहीं है, जो अपने मुख्य सितारों को लार्जर देन लाइफ अभिनय करने का मौका दे और चर्चित ‘स्टार्स’ को सेंटर स्टेज देकर बाकी ‘एक्टर्स’ को किनारे खड़ा कर दे. यहां सभी कलाकार ‘किरदार’ अभिनीत करते हैं और भूमि और सुशांत भी स्टार वाले रूप में नजर नहीं आते. यह एक फिल्मकार की बहुत बड़ी जीत होती है कि महंगे सितारों को बीहड़ में अगर वो ले भी जाए तब भी उसके लिए सुशांत और रणवीर शौरी में कोई फर्क न रहे.

मनोज बाजपेयी, मान सिंह नाम के काल्पनिक बागी की कम बड़ी भूमिका में हैं लेकिन बहुत बढ़िया अभिनय करते हैं. मजेदार तथ्य यह है कि उनकी शुरुआती फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में भी वे मान सिंह नाम के बागी बने थे लेकिन वो असली बागी पर आधारित किरदार था जबकि यहां सौम्य-सज्जन काल्पनिक बागी का रोल भी वे अकल्पनीय परिपक्वता से अभिनीत करते हैं.

रणवीर शौरी बड़ी भूमिका में हैं और अक्सर ही शहरी किरदार निभाने वाला यह अंडररेटिड अभिनेता बागी के रोल में आपको अति का प्रभावित करने वाला है. वकील सिंह नाम के उसके गर्म-मिजाज पात्र को जब मनोज बाजपेयी से जुड़ा एक सच पता चलता है तब तो शौरी जैसे अभिनय के शीर्ष छूते हैं.

आशुतोष राणा बागियों का सफाया करने वाले खतरनाक पुलिसवाले की भूमिका में हैं और फिल्म का उनका कठोर चेहरा बड़े से बड़े बागी के चेहरे को पसीने से तर करने के लिए काफी मालूम होता है. चूंकि ‘सोनचिड़िया’ ओवर द टॉप अभिनय करने वाले हीरो या विलेन देने वाली फिल्म नहीं है इसलिए उनका किरदार शायद कई दर्शकों के लिए कम असर छोड़े. लेकिन सदैव भागती-दौड़ती एक एक्शन-फिल्म में ‘गोकुल पांडे’ या ‘लज्जा शंकर पांडे’ बनने से ज्यादा जरूरी एक यथार्थवादी किरदार बने रहना होता है. इस मुश्किल काम में राणा सौ प्रतिशत खरे उतरते हैं.

इन सभी कलाकारों के दमदार अभिनय के अलावा लिखाई, ब्लैक ह्यूमर, निर्देशन, अनुज राकेश धवन की सिनेमेटोग्राफी, खूबसूरत स्लो-मोशन दृश्य और उनमें सुनाई देने वाला अलहदा पार्श्व संगीत मिलकर ‘सोनचिड़िया’ को दुर्लभ और उम्दा फिल्म बनाते हैं. अब ऐसा सिनेमा सम्मोहन नहीं तो और क्या कहलाएगा!