‘हिंदुस्तान, लोकतंत्र का एक पैरोडी अकाउंट है

कुछ वक्त पहले जब स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने यह ट्वीट किया था तब हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर था. केवल सरकार द्वारा खींची लकीर पर सीधे चलने वालों की बातों का बोलबाला था और जो भी उस सरकारी लकीर से थोड़ा-सा भी इधर या उधर चल रहा था उसे गालियां पड़ने और ट्रोल होने में केवल क्षण-भर का समय लग रहा था. लेकिन आज जब दोनों देशों के बीच हालात बेहतर मालूम होते हैं, और शांति की बात करना वापस से मुख्यधारा के डिस्कोर्स में शामिल हो रहा है, तब भी इस ट्वीट में कही गई बात की गहराई कानों में लगातार गूंजनेवाली विशेषता रखती है.

हाल के समय में हमारे देश में घटी कई घटनाएं जैसे हमारे लोकतंत्र का मजाक उड़ाती हुई प्रतीत हो रही हैं. ऐसे में ट्विटर की शब्दावली में यह सवाल करना गलत नहीं लगता कि क्या सच में हमारा देश लोकतंत्र का पैरोडी अकाउंट बनता जा रहा है? केवल मनोरंजन क्षेत्र से जुड़ी घटनाओं का ही जिक्र करें तो नवजोत सिंह सिद्धू से लेकर हार्दिक पंड्या प्रकरण तक से ऐसा लग रहा है कि हमारे सिनेमा से लेकर टीवी चैनल और ऑनलाइन मंच जैसे मनोरंजन के तमाम साधक भारत सरकार और बेकाबू होती भीड़ से लगातार डर रहे हैं और इस डर से दबकर खुद ही लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे हैं.

नवजोत सिंह सिद्धू ने जो बातें भयावह पुलवामा अटैक के तुरंत बाद कही थीं और जो तुरंत ही विवादास्पद हो गईं – कि बातचीत चलती रहनी चाहिए और हम पूरी पाकिस्तान कौम को आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते – अब वही बातें युद्धोन्माद की गाढ़ी धुंध के छंटने के बाद चारों ओर से सुनाई दे रही हैं. इसमें कोई शक नहीं कि 2017 में भाजपा से कांग्रेस की तरफ मुड़े सिद्धू अपनी वक्त के साथ बदलती राजनीति के हिसाब से बयान देते रहे हैं लेकिन जो बात अपनी संपूर्णता में कहीं से गलत नहीं प्रतीत होती, उस पर देश-भर में बवाल खड़ा होना बेकाबू भीड़ के खतरे को सच्चाई में तब्दील होता हुआ दिखा रहा है.

इस बयान के बाद न सिर्फ सोशल मीडिया पर सिद्धू के खिलाफ नफरत कई दिनों तक बरसती रही, बल्कि न्यूज चैनलों से लेकर मुखर राष्ट्रवादी शख्सियतों तक ने उन्हें बुरा-भला कहा. भाजपा और अकाली दल के नेताओं से लेकर प्रो-बीजेपी समर्थकों तक ने उनसे जैसे भाजपा छोड़कर कांग्रेस में जाने का बदला लेना शुरू कर दिया और उनके बयान को सत्ताधारी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने खूब उछाला.

दबावों के चलते कपिल शर्मा के कॉमेडी शो से सोनी टीवी ने उन्हें अनाधिकारिक तौर पर बाहर का रास्ता दिखा दिया और निर्देशक अशोक पंडित (जो कि प्रो-बीजेपी होकर अब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में खासा दबदबा रखते हैं) ने सिद्धू और पाकिस्तानी कलाकारों के साथ काम न करने का ऐलान कर दिया. अशोक पंडित इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन डायरेक्टर्स एसोसिएशन (इफ्तदा) नामक फिल्म संस्था के प्रेसीडेंट हैं और फिल्म इंडस्ट्री में इस संस्था का काफी दबदबा है. उनका साथ कई और प्रभावशाली फिल्म एसोसिएशन्स ने भी दिया और एक तरह से यह असंभव हो गया कि सिद्धू किसी भी टीवी शो के लिए देश में मौजूद किसी भी सेट पर शूटिंग कर सकें.

जब कॉमेडियन कपिल शर्मा ने सिद्धू की वकालत की तो उन्हें भी ट्रोल किया गया. हैशटैग के साथ ‘बॉयकॉट कपिल शर्मा’ ट्रेंड होने लगा और वापस से एक राष्ट्रवादी बयान देकर उन्हें खुद को नफरत की इस आंधी से बचाना पड़ा. हमेशा की तरह पाकिस्तानी कलाकारों पर भी बैन बरसता रहा और मीडिया रिपोर्ट्स आती रहीं कि सलमान खान ने आतिफ असलम के एक गाने को अपने बैनर की आने वाली फिल्म ‘नोटबुक’ के म्यूजिक एलबम से हटा दिया है.

एक ये बात कभी समझ नहीं आती है कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच जब भी तनाव होता है तो पाकिस्तानी कलाकार ‘सॉफ्ट टारगेट’ क्यों बन जाते हैं? उनके हाथ में न पाकिस्तानी सरकार की कमान है न ही आतंकवादियों से सीधे संबंध मालूम होते हैं. फिर क्यों उन पर हर बार तनावपूर्ण स्थिति में पत्थर बरसाए जाते हैं. क्या इस उन्मादी भीड़ वाले टिपिकल बर्ताव से हमारी मुश्किल समस्याओं का हल निकल जाएगा?

हमें खुद से यह भी पूछना चाहिए कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान तनाव के दौरान क्या ‘पाकिस्तानी’ कलाकारों से दूरी बनाकर क्या हम हिंदुस्तानी कोई ‘राष्ट्रधर्म’ निभा रहे होते हैं? क्या ऐसे वक्त में ‘पाकिस्तानी’ फैज अहमद फैज की अमनपसंद बातें करने वाली नज्मों को नहीं पढ़ना-सुनना चाहिए? क्या कबीर को भी गाने वाली ‘पाकिस्तानी’ गायिका आबिदा परवीन का इस दौरान ‘मन लागत यार फकीरी में’ सुनना कुफ्र होगा? क्या पाकिस्तानी नुसरत फतेह अली खान साहब के कालजयी गीतों से इस दौरान दूरी बना लेना राष्ट्रवादी होना होगा? क्या तनाव के इन दिनों में मंटो के अफसानों को पढ़ने से पहले गूगल करके देखना होगा कि उन्होंने कौन-सा अफसाना बॉम्बे में रहकर लिखा था और कौन-कौन से बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाकर? और फिर वही पढ़ना होगा जो उन्होंने राष्ट्रवादी होकर बम्बई में लिखे थे?

ये सारे सवाल आप से हैं. जवाब भी आपको ही खोजने होंगे. भीड़ से पूछेंगे तो वो तो गाली देगी.

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बहरहाल, तनाव कम से कमतर होते ही सिद्धू के वापस कपिल शर्मा शो में लौट आने की अच्छी-खासी उम्मीद है. इस बात का इशारा करने वाली मीडिया रिपोर्ट्स भी आना शुरू हो गई हैं और आप अब यह भी उम्मीद कर सकते हैं कि इस शो में बात-बेबात सुनाई देने वाले अर्चना पूरन सिंह के गर्जना रूपी ठहाके जल्द ही आपके कानों को भेदना बंद कर देंगे. लेकिन, इस पूरे गैरजरूरी विवाद से एक बात जो शीशे की तरह साफ हो गई है वो यह कि फिल्म इंडस्ट्री से लेकर हमारे टीवी चैनल तक अब तुनकमिजाज और अतार्किक भीड़ तथा हमारी चुनी हुई दक्षिणपंथी सरकार से दिन-ब-दिन ज्यादा डरने लगे हैं.

एक दूसरा वाकया हार्दिक पंड्या का भी है. इसमें कोई शक नहीं कि केवल नौंवी तक पढ़े इस क्रिकेटर ने जनवरी के दूसरे हफ्ते में प्रसारित हुए कॉफी विद करण में बेहद निचले दर्जे की बातें की थीं. जिन्हें शुद्ध हिंदी में ‘छिछोरी’ बातें कहा जाता है, ठीक वही. लंबे समय तक क्रिकेट जैसा खेल कवर चुकीं कोई भी महिला स्पोर्ट्स रिपोर्टर आपको निजी बातचीत में बताएगीं कि इस खेल की दुनिया में काफी लंबे समय से ऐसे कई क्रिकेटर मौजूद रहे हैं जो कि सुंदर लड़कियों को केवल ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ की तरह देखते हैं. हार्दिक पंड्या ने जो-जितनी हल्के दर्जे की बातें कॉफी विद करण में लड़कियों के बारे में बोली हैं ये इस खेल से जुड़े कई क्रिकेटरों की मानसिकता रही है. लकड़ी के बल्ले से गेंद मारने और उस गेंद को पकड़ने-फेंकने के सरल से एक खेल से जब कुछ लोग करोड़ों रुपए कमाने लग जाते हैं, एक पूरा देश उन्हें पूजने लग जाता है, तो उन लोगों के लिए ऐसी गैरजिम्मेदाराना हरकतों को अपनी ‘लाइफस्टाइल’ बना लेना एकदम आसान और कूल हो जाता है. अगर सब नहीं, तो हार्दिक पंड्या की सोच वाले ऐसे खिलाड़ी इस खेल में कम भी नहीं.

लेकिन मजबूत लोकतंत्र तो वही हुआ न, जहां सभी को अपनी बात कहने की छूट हो और जहां सभी को उस बात को सुनने न सुनने का हक मिले. कॉफी विद करण में अपनी मिसोजिनिस्ट, सेक्सिस्ट और रेसिस्टबातों के बाद हार्दिक पंड्या और केएल राहुल को कुछ वक्त के लिए क्रिकेट मैचों से सस्पेंड किया गया था और बीसीसीआई के प्रशासकों ने वादा किया था कि क्रिकेटरों को शिष्टाचार के सबक सिखाए जाएंगे. लेकिन सबसे अजीब जो वाकया हुआ वो यह कि सोशल मीडिया वगैरह पर हुई चौतरफा आलोचना के डर से हॉटस्टार ने इस एपीसोड को विवाद भड़कते ही जनवरी के दूसरे हफ्ते में अपने ऑनलाइन मंच से हटा लिया.

इन दिनों आप स्टार इंडिया नामक मीडिया हाउस द्वारा संचालित इस ऑनलाइन एप पर स्टार प्लस चैनल के सारे धारावाहिक देखने के अलावा स्टार वर्ल्ड इंडिया चैनल पर प्रसारित होने वाला कॉफी विद करण का मौजूदा सीजन छह भी देख सकते हैं. लेकिन इसका सिर्फ एक एपीसोड देखने को कभी नहीं मिलने वाला. हार्दिक पंड्या और केएल राहुल के इस एपीसोड क्रमांक 12 को न सिर्फ हॉटस्टार ने अपने मंच से हटाया बल्कि स्टार वर्ल्ड इंडिया चैनल ने भी इसका रिपीट टेलीकास्ट करने से तौबा कर ली.

साफ है कि तुनकमिजाज और अतार्किक भीड़ बन चुके सोशल मीडिया की वजह से ऐसा कदम टीवी चैनल और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के एक दिग्गज मीडिया घराने को उठाना पड़ा. लेकिन क्या ऐसा करना सही है? हमें इस एपीसोड के लिए हार्दिक पंड्या की लाख आलोचनाएं करनी ही चाहिए लेकिन साथ ही इस एपीसोड के अस्तित्व में बने रहने की भी वकालत करना जरूरी है. क्योंकि बात बिना बात बुरा मानने वाली हिंदुस्तानी भीड़ के दबाव में चीजों को हटा लेना, उन्हें बैन कर देना, पब्लिक मेमोरी से गायब करना हमारे हिंदुस्तान का एक ऐसा स्थापित चलन बनता जा रहा है जिसे रोकना बेहद जरूरी है.

फिर ये भी अहम है कि एपीसोड क्रमांक 12 का अस्तित्व खत्म कर देने से (वैसे इंटरनेट पर कभी कोई चीज हमेशा के लिए खत्म नहीं होती!) ‘छवियों’ के वापस साफ-सुथरा हो जाने का एजेंडा भी पूरा हो जाता है. हार्दिक पंड्या का इंस्टाग्राम कुछ नहीं बदलने की ताकीद कर ही रहा है. अगर इस एपीसोड को लाखों-करोड़ों लोगों को देखने दिया जाता तो पूरे हिंदुस्तान को समझ आता कि मिसोजिनिस्ट और सेक्सिस्ट बातें करते वक्त हार्दिक खुद को कितना कूल समझ रहे थे. साधिकार अपने प्रिव्लेज्ड होने का अहंकारी शो-ऑफ कर रहे थे और सोदाहरण ही दिखा रहे थे कि क्रिकेट जैसे सरल खेल को सर पर बिठा लेने के नुकसान कैसे-कैसे हो सकते हैं. अखबारों और वेब पर खबरें पढ़कर हार्दिक की कही बातें जान लेना अलग बात है और उनके मुखारविंद से महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई होते हुए सुनना अलग ही तरीके से दिल को ठेस पहुंचाता है.

कभी-कभी खराब चीजों का जिंदा रहना बेहद जरूरी होता है. ताकि लोकतंत्र में खुद को भीड़ बनने से बचाए रखने वाले जिम्मेदार नागरिक सही-अच्छी बातों का महत्व और बेहतर समझ सकें.

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