पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले के बाद जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के खिलाफ एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में प्रस्ताव लाया गया है. यूएनएससी के तीन सदस्यों - अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस द्वारा लाए गए इस प्रस्ताव का मकसद मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करवाना है. संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित किए जाने के बाद मसूद की संपत्ति जब्त की जाएगी, उसकी खुलेआम आवाजाही रोकी जाएगी और हथियार रखने पर पाबंदी के साथ-साथ उसे ऐसी ही कई पाबंदियों का भी सामना करना पड़ेगा. सुरक्षा परिषद में अगले कुछ दिनों में इस प्रस्ताव पर फैसला होगा.

सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर के खिलाफ इस तरह का प्रस्ताव इससे पहले भी कई बार लाया जा चुका है. लेकिन, इसके पांच सदस्य देशों में से एक चीन इस पर हर बार अड़ंगा लगा देता है. इस बार भी चीन ने इसे लेकर भारत को कोई आश्वासन नहीं दिया है.

यूएन में मसूद के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर चीन के बार-बार वीटो करने के बाद यह सवाल उठता है कि आखिर चीन क्यों मसूद अजहर जैसे आतंकी को बचा रहा है. कूटनीतिक मामलों की गहरी समझ रखने वाले अधिकांश जानकार कहते हैं कि कोई भी राष्ट्र किसी दूसरे के सहयोग में तब तक खड़ा नहीं होता जब तक कि उसमें उसके राष्ट्रीय हित शामिल न हों. इनका मानना है कि चीन जैसा देश तो बिना बड़ी वजह के ऐसा कभी नहीं कर सकता क्योंकि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक संबंधों के मामले में कोई जोखिम नहीं लेता. इन विशेषज्ञों का कहना है कि मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित न होने देने के पीछे चीन के कई बड़े हित छिपे हुए हैं.

चीन पाकिस्तान को अलग-थलग नहीं पड़ने देना चाहता

ब्रसेल्स स्थित साउथ एशिया डेमोक्रेटिक फोरम के निदेशक जिगफ्रीड ओ वोल्फ एक जर्मन न्यूज़ एजेंसी को दिए साक्षात्कार में बताते हैं कि मसूद अजहर को बचाना पाकिस्तान को लेकर चीनी कूटनीति का एक अहम हिस्सा है. उनके मुताबिक इस मामले पर चीन काफी आगे का सोचकर चल रहा है. दरअसल, उसे पता है कि हाफिज सईद के बाद अगर भारत मसूद अजहर को भी संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में शामिल करवाने में सफल हो गया तो वह पाकिस्तान को आतंकवाद प्रायोजित राष्ट्र घोषित कराने के अपने लक्ष्य के काफी करीब पहुंच जाएगा. जिगफ्रीड कहते हैं कि ऐसी स्थिति में अमेरिका सहित पश्चिमी देश पाकिस्तान पर तमाम प्रतिबंध लगा देंगे. उनके मुताबिक ये संभावित प्रतिबंध इस्लामाबाद के लिए तो कई तरह की राजनीतिक और आर्थिक मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं, साथ ही इनसे चीन पर भी खासा असर पड़ेगा क्योंकि वह इस समय पाकिस्तान का सबसे बड़ा आर्थिक सहयोगी है.

प्रोफेसर जिगफ्रीड यह भी बताते हैं कि मसूद अजहर को बचाने के अलावा भी चीन हर तरह से इस इस कोशिश में लगा है कि पाकिस्तान अलग-थलग न पड़े. उनके अनुसार अगर आज रूस पाकिस्तान के करीब आ रहा है इसमें सबसे बड़ी भूमिका चीन की है. इसके अलावा चीन पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय अलगाव को कम करने के लिए ही अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र और मध्य एशिया के मामलों को लेकर होने वाली बहुपक्षीय वार्ताओं में उसे शामिल कर रहा है.

सीपीईसी परियोजना में मसूद अजहर का सहयोग

विदेश मामलों के कुछ जानकार एक और बात भी बताते हैं. इनके मुताबिक पिछले चार सालों में चीन ने पाकिस्तान में बड़ा निवेश किया है. इसमें 50 अरब डॉलर से बनाया जा रहा चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) भी शामिल है. बताते हैं कि चीन को डर है कि अगर उसने मसूद का समर्थन नहीं किया या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की पैरवी नहीं की तो उसका इतना बड़ा निवेश कहीं डूब न जाए. उसे लगता है कि ऐसा न करने पर जैश-ए-मोहम्मद जैसे गुट उसके और पाकिस्तान सरकार के ही खिलाफ हो सकते हैं.

जैश-ए-मोहम्मद को लेकर इतिहास भी कुछ ऐसा ही कहता है. 2002 में जब पाकिस्तान सरकार ने जैश को बैन किया था तो उसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति मुशर्रफ तक पर कई हमले हुए थे और देश में स्थिति संभालनी मुश्किल हो गई थी. ऐसी हालत में अगर चीन मसूद अजहर के खिलाफ होने वाली अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई का साथ देता है तो पाकिस्तान के लिए चीन का सहयोग लेना या उसे सहयोग देना काफी मुश्किल हो जाएगा.

भारतीय खुफिया एजेंसियों से जुड़े कुछ लोग यह भी बताते हैं कि चीन के आर्थिक गलियारे के निर्माण को लेकर मसूद ने उसकी एक बड़ी समस्या को हल किया है. दरअसल, यह गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर, पेशावर और बलूचिस्तान सहित ऐसे कई संवेदनशील इलाकों से गुजरता है जहां कई आतंकी संगठनों का साया हर समय बना रहता है. यह उन इलाक़ों से होकर भी गुज़रता है, जहां तालिबान के लड़ाके सक्रिय हैं. बताते हैं कि इन सभी इलाकों में मसूद अजहर और चीन की करीबियों की वजह से आतंकी संगठन गलियारे के निर्माण में कोई रोड़ा नहीं अटकाते. साथ ही ये निर्माण कार्य में लगे चीनी नागरिकों को भी पूरी सुरक्षा देते हैं.

चीन की वीगर मुसलमानों पर कार्रवाई का मसूद अजहर संबंध

भारतीय मीडिया में हालिया सालों के दौरान आई कुछ रिपोर्ट्स में देश की खुफिया एजेंसियों के हवाले से बताया गया है कि चीन मसूद अजहर के जरिये अपनी एक अंदरूनी समस्या को भी हल करने की कोशिश में लगा हुआ है. मसूद अजहर चीन की कम्यूनिस्ट सरकार द्वारा उत्तरी-पश्चिमी राज्य शिंजियांग में फैले अलगाववाद और इस्लामिक आतंकवाद को खत्म करने में भी उसकी मदद कर रहा है.

एक करोड़ से ज्यादा की वीगर मुसलमानों की आबादी वाले इस राज्य में दशकों से ‘ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट’ चल रहा है जिसका मकसद चीन से अलग अपना एक देश बनाना है. इस आंदोलन की वजह से ही चीनी सरकार ने वीगरों की धार्मिक स्वतंत्रता पर भी कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं. चीनी सरकार के इस रुख की वजह से सरकार और वीगर मुसलमानों के बीच कई बार हिंसक झड़पें हो चुकी हैं. पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में कई आतंकी हमले भी हुए हैं.

चीनी खुफिया एजेंसियों का कहना है कि शिंजियांग प्रांत के वीगर मुसलमानों को पाकिस्तान और अफगानिस्तान में स्थित आतंकी समूहों से बड़ी मदद मिल रही है. इन आतंकी समूहों में तालिबान, अलकायदा और पाकिस्तान की लाल मस्जिद पर कार्रवाई के बाद बिखरे वे आतंकी भी शामिल हैं, जो इस कार्रवाई के लिए चीन को जिम्मेदार मानते हैं.

बताया जाता है कि शिंजियांग प्रांत में वीगर अलगाववाद पर लगाम कसने के मकसद से साल 2015-16 में चीनी सरकार ने आतंकवाद को आतंकवाद से काटने का निर्णय लिया. मीडिया में आई कई रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन ने मसूद अजहर से इसके लिए एक समझौता किया. इस समझौते के तहत अजहर को पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को वीगर अलगाववादियों की मदद करने से रोकना था. चीनी सरकार ने मसूद को यह जिम्मेदारी उसकी लगभग हर आतंकी संगठन में गहरी पैठ को देखते हुए दी थी. 2007 में जब लाल मस्जिद पर पाक सेना ने कार्रवाई की थी तब यहां के अधिकांश आतंकी जैश-ए-मोहम्मद की शरण में ही आए थे. इसके अलावा अजहर मसूद की पाकिस्तान-तालिबान आतंकियों के बीच भी अच्छी पकड़ मानी जाती है.