भूतपूर्व सोवियत संघ के तानाशाह योज़ेफ़ या जोसेफ स्टालिन की 1953 में मृत्यु होने से पहले उसके नृशंस अत्याचारों से वहां 31 वर्षों तक हाहाकार मचा रहा. उसकी सनक न केवल लाखों आम लोगों के प्राण ले रही थी, उसके अपने ही मित्रों, मंत्रियों, नाते-रिश्ते के लोगों और परिवार के सदस्यों तक की जान भी सुरक्षित नहीं थी. स्टालिन के दो बेटों और एक बेटी में से अंततः केवल बेटी स्वेतलाना ही 85 वर्ष की लंबी जिंदगी जी सकी.

स्वेतलाना जब केवल छह साल की थी, तो पिता के दुर्व्यवहारों से दुखी उसकी मां ने गोली मार कर या तो स्वयं ही आत्महत्या कर ली या पिता ने ही या फिर उसके आदेश पर किसी और ने गोली मार कर उसकी हत्या कर दी थी. मां से मिल सकने वाली गरमाहट के अभाव और पिता के दमनकारी स्वभाव ने स्वेतलाना के पहले प्रेम और बाद की तीन शादियों को साल-दो साल से आगे नहीं बढ़ने दिया.

तीन शादियां, दो बच्चे

स्वेतलाना ने तीन शादियां कीं. दो शादियों से उसके दो बच्चे हुए. पिता की मृत्यु के बाद इन्हीं दोनों बच्चों के साथ वह मॉस्को के एक फ्लैट में रहने लगी. बदनाम ‘स्टालिना’ शब्द अपने नाम में से हटा कर उसने मां का कुलनाम ‘अलिलुयेवा’ अपना लिया. अध्यापन और अनुवादन कार्य से आजीविका चलाने और 1960 वाले दशक की शुरुआत में स्वेतलाना अपने गोपनीय संस्मरण भी लिखने लगी.

अक्टूबर 1963 की बात है. स्वेतलाना गले में टॉन्सिल के एक ऑपरेशन के लिए मॉस्को के केन्तोसेवो अस्पताल में थी. वहीं भारत के कुंवर ब्रजेश सिंह से उसका परिचय हुआ. ब्रजेश सिंह भारत में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के पास की कालाकांकर रियासत के राजघराने के एक सदस्य और एक कम्युनिस्ट थे. उनके व्यक्तित्व से सौम्य, सुसंस्कृत और ज्ञानी पुरुष होने का भाव टपकता था. वे ब्रॉन्काइटिस (श्वासनली-शोथ) और फेफड़े की एक गंभीर बीमारी से पीड़ित भी थे.

सच्चे प्रेम की प्यासी स्टालिन की दुखियारी बेटी

परिचय के बाद दोनों ने काला सागर तट पर बसे सुरम्य शहर सोची में कुछ समय तक साथ-साथ स्वास्थ्यलाभ किया. दो बच्चों की मां बन चुकी स्टालिन की दुखियारी बेटी और पहले से ही दो पत्नियों वाले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राजकुंवर सदस्य का यह परिचय, देखते ही देखते, अगाध प्रेम में परिणत हो गया. दोनों एक-दूसरे के बिना रह नहीं सकते थे. लेकिन ब्रजेश सिंह को किसी कारण से शीघ्र ही भारत जाना पड़ा. इसके बाद तरह-तरह के बहानों से उन्हें सोवियत संघ लौटने नहीं दिया जा रहा था. कोई डेढ़ साल बाद ही वे स्वेतलाना के पास लौट पाये. 1965 में दोनों ने विधिवत विवाह करने की सोची.

स्वेतलाना से कई बार मिल चुकी उसकी जीवनी लेखिका और जर्मन इतिहासकार मार्था शाड का जर्मन-फ्रांसीसी टीवी चैनल ‘आर्टे’ की एक डॉक्यूमेन्ट्री फ़िल्म में कहना है, ‘स्वेतलाना उन्हें (ब्रजेश सिंह को) पाने के लिए सचमुच व्याकुल होने लगी. सब जगह चर्चा होने लगी कि स्वेतलाना फ़िर से शादी करने जा रही है. लेकिन इसके लिए उसे एक विदेशी से विवाह करने की सरकारी अनुमति चाहिये थी.’ यह अनुमति लाख कोशिश करने पर भी मिल नहीं रही थी. तत्कालीन सोवियत नेता इसे अपने देश और अपनी कम्युनिस्ट पार्टी की मानहानि मान रहे थे, भले ही ब्रजेश सिंह भी एक कम्युनिस्ट ही थे.

सोवियत प्रधानमंत्री की समझाइश

मार्था शाड कहती हैं, ‘और तब वह (स्वेतलाना) पहली बार क्रेमलिन में प्रधानमंत्री अलेक्सेई कोसीगिन से मिलने गयी. वे उसी कमरे में बैठते थे, जिसमें उसके पिता बैठ कर सरकार चलाते थे. कोसीगिन ने उसे समझाया कि उसे एक बीमार भारतीय से शादी नहीं करनी चाहिये. उसे किसी स्वस्थ रूसी पुरुष से शादी करनी चाहिये.’ स्वेतलाना को इस विवाह की अनुमति नहीं मिली. एक ही वर्ष बाद, 31 अक्टूबर 1966 को कुंवर ब्रजेश सिंह की स्वेतलाना की बांहों में मृत्यु हो गयी.

ब्रजेश सिंह की अंतिम इच्छा थी स्वेतलाना के साथ स्वदेश लौटना और वहीं अंतिम सांस लेना. वे चाहते थे कि यह संभव न होने पर भी उनका दाह संस्कार किया जाये और उनके पार्थिव शरीर की राख को भारत ले जाकर गंगा में विसर्जित कर दिया जाये.

स्वेतलाना और ब्रजेश सिंह के बीच क़ानूनी विवाह भले ही नहीं हो पाया था, लेकिन वह तन-मन से उन्हीं को अपना सच्चा पति मानने लगी थी. उसने निश्चय किया कि उनके अस्थिकलश के साथ वह भारत जायेगी. गंगा में उनकी राख विसर्जित करेगी.

भारत जाने की अनुमति की लड़ाई

इस निश्चय के बाद स्वेतलाना को सोवियत दफ्तरशाही से एक और लड़ाई लड़नी पड़ी - एक ग़ैर कम्युनिस्ट देश भारत जाने के लिए अनुमति पाने की लड़ाई. उस समय तत्कालीन सोवियत संघ सहित यूरोप के सभी कम्युनिस्ट देशों में नियम था कि उनके नागरिक केवल सरकारी काम से ही ग़ैर-कम्युनिस्ट देशों में जा सकते हैं, निजी काम या घूमने-फिरने के उद्देश्य से बिल्कुल नहीं. स्टालिन की बेटी होने के कारण सोवियत नेताओं को यह भी डर था कि पश्चिमी देशों की गुप्तचर सेवाएं भारत में उस पर डोरे डालेंगी और हो सकता है कि वह किसी पश्चिमी देश में पलायन कर जाये.

स्वेतलाना एक बार फिर प्रधानमंत्री कोसीगिन से मिली. कुछ स्रोतों का कहना है कि इस बार कोसीगिन ने उससे कहा कि एक विधवा के तौर पर उसका भारत जाना तो और भी ख़तरे से ख़ाली नहीं है. पुरातनपंथी हिंदुओं के बीच विधवा को भी उसके पति के साथ ही जला देने की सती प्रथा के बारे में क्या उसने नहीं सुना है? कोसीगन ने कहा कि उसके साथ भी ऐसा ही हो सकता है.

स्वेतलाना ने ब्रेज़नेव को राज़ी किया

संयोग से लेयोनिद ब्रेज़नेव 1964 से सेवियत संघ के नये सर्वोच्च नेता थे. मार्था शाड के अनुसार अपनी जान-पहचान और और कुछेक तरक़ीबों के बल पर स्वेतलाना उन्हें राज़ी करने में सफल रही. ब्रेज़नेव की सहमति के बाद सभी प्रमुख पदाधिकारियों को उनकी हां में हां मिलानी पड़ी कि वह एक या दो सप्ताह के लिए भारत जा सकती है. इस सब में कई महीने बीत गये. स्वेतलाना अंततः दिसंबर 1966 में भारत पहुंची. उसके इस बीच वयस्क हो गए उसके दोनों बच्चे मॉस्को में ही रह गये.

उस समय अमेरिका विश्व में कम्युनिस्ट विचारधारा और कम्युनिस्ट सरकारों के विस्तार को रोकने में लगा हुआ था. इसी उद्देश्य से वियतनाम में एक भयंकर युद्ध चल रहा था. भारत में भी काफ़ी उथल-पुथल थी. भारत-पाकिस्तान युद्ध को डेढ़ ही साल बीता था. इंदिरा गांधी जनवरी 1966 में हुए चुनावों के बाद पहली बार देश की प्रधानमंत्री बनी थीं. संसद में कांग्रेस पार्टी का बहुमत काफ़ी घट गया था. एक अलग पंजाबी सूबे के लिए सिखों के आंदोलन के कारण पंजाब का बंटवारा हुआ था. हरियाणा एक नया राज्य बना था. बिहार सूखे और भुखमरी की मार सह रहा था.

स्वेतलाना का भारत पहुंचना समाचार नहीं बना

इन सब कारणों से स्वेतलाना का भारत पहुंचना कोई फड़कता हुआ समचार नहीं बन पाया. बल्कि, इंदिरा गांधी की सरकार और उन दिनों उनके वाणिज्य मंत्री दिनेश सिंह के लिए यह एक नया सिरदर्द ही था. दिनेश सिंह, जो फ़रवरी 1969 में भारत के विदेश मंत्री भी बने, कुंवर ब्रजेश सिंह के भतीजे थे. दिसंबर 1966 में दिल्ली पहुंचने के बाद स्वेतलाना, ब्रजेश सिंह के अस्थिकलश के साथ, सीधे कालाकांकर में उनके पारिवारिक घर पहुंची. परिवार के लोगों के साथ उसने गंगा में अस्थि-विसर्जन किया और क़रीब दो महीने वहां बिताये.

दिनेश सिंह की पुत्री और कांग्रेस पार्टी की एक नेता रत्ना सिंह ने ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ को बाद में बताया था कि स्वेतलाना कालाकांकर के उनके पारिवारिक महल में ही रही. उनका कहना था, ‘उसे हमारे परिवार के बारे में काफ़ी कुछ पता था. यह तक जानती थी कि मेरे पिता की छह बेटियां हैं. हम सब के लिए वह कोई न कोई उपहार भी लाई थी. मृत्यु से जुड़े सारे कर्मकांडों में उसने भाग लिया.’

स्वेतलाना भारत में ही रहना चाहती थी

रत्ना सिंह के अनुसार सोवियत सरकार चाहती थी कि स्वेतलाना मार्च 1967 तक मॉस्को लौट जाये. दूसरी ओर, स्वेतलाना की बड़ी इच्छा थी कि रत्ना सिंह के पिता और केंद्रीय मंत्री दिनेश सिंह अपने पद के प्रभाव का उपयोग करते हुए इस समय-सीमा को बढ़वा दें. पर दिनेश सिंह ऐसा नहीं करवा पाये क्योंकि रत्ना सिंह के मुताबिक सोवियत सरकार समय-सीमा बढ़ाने के मूड में बिल्कुल नहीं थी.

रत्ना सिंह ने यह भी बताया कि ब्रजेश सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक पुराने नेता रहे एजेड अहमद के निकट मित्र थे और भारत के स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में तीन बार जेल भी जा चुके थे. कालाकांकर में रहने के दौरान स्वेतलाना ने इलाहाबाद जा कर समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया से भी संपर्क किया और उनसे ब्रजेश सिंह का एक स्मारक बनवाने में सहयोग देने का भी आग्रह किया. लोहिया ने इस टिप्पणी के साथ सहायता का आश्वासन दिया कि ‘स्टालिन की बेटी तो दर-दर ठोकरें खा रही है और नेहरू की बेटी प्रधानमंत्री बनी बैठी है.’

शादी की गहमागहमी में स्वेतलाना भुला दी गयी

रत्ना सिंह ने कहा कि बाद में स्वेतलाना एक हॉस्टल में रहने लगी थी और रूसी उस पर नज़र गड़ाए हुए थे. उन्हीं दिनों उनका परिवार एक शादी की तैयारी में भी व्यस्त हो गया था, ‘मेहमानों की भीड़-भाड़ में हम उसे भूल ही गये थे. फिर समाचार आया कि वह दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास में पहुंच गई है. हम एकदम भौचक्के रह गये.’’ स्वेतलाना क़रीब दो महीने तक कालाकांकर में बिताने के बाद सोवियत दूतावास के दबाव में आ कर दिल्ली चली गई थी.

कालाकांकर के ग्रामीण स्वेतलाना को ‘रूसी तानाशाह की बेटी’ के तौर पर जानते थे. कुछ थोड़े से लोग आज भी उसे इसी तरह याद करते हैं. जिन लोगों ने उसे देखा है, वे कहते हैं कि वह घुटने तक का स्कर्ट और ब्लाउज़ पहना करती थी. उसके कटे हुए सुनहले बाल थे और वह अक्सर डाकघर में और शामों को गंगा के किनारे वाले घाट पर जाया करती थी.

ब्रजेश सिंह की राख का विसर्जन

कुंवर ब्रजेश सिंह की राख का विसर्जन एक सुबह को हुआ था. उस समय हज़ारों की भीड़ जमा हो गयी थी. औरतें घरों के छज्जों पर से विसर्जन देख रही थीं. स्वेतलाना ने बाद में अपनी एक पुस्तक ‘केवल एक वर्ष’ (ओनली वन ईअर) में लिखा कि ब्रजेश सिंह के देहांत के तीन वर्ष पूर्व उसने उनकी नोटबुक में लिखा देखा, ‘मेरा दाहसंस्कार कर मेरी राख को किसी नदी में विसर्जित कर दिया जाये. किसी धार्मिक कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है.’

इसे जानने के बाद स्वेतलाना ने जब उनसे पूछा कि उनका अभिप्राय किस नदी है, तो उन्होंने गंगा का नाम लिया. कालाकांकर में अपना अधिकतर समय वह ‘राजभवन’ के पास ही स्थित ‘प्रकाश गृह’ के उस कमरे में बिताया करती थी, जो कभी ब्रजेश सिंह का कमरा हुआ करता था. पास के ही एक अध्यापक हर शाम पांच बजे ‘प्रकाश गृह’ में ही स्वेतलाना को हिंदी सिखाने आते थे. स्वेतलाना रूसी के अलावा अंग्रेज़ी, जर्मन और फ्रेंच भाषाएं भी अच्छी तरह जानती थी.

35 बिस्तरों वाला एक अस्पताल

स्वेतलाना कालाकांकर में ही रहना और ब्रजेश सिंह की स्मृति में वहां 35 बिस्तरों वाला एक अस्पताल बनवाना चाहती थी. हिंदी के प्रख्यात कवि सुमित्रानंदन पंत ने 1969 में इस अस्पताल की नींव भी रखी और स्वेतलाना की सहायता से वह बना भी. लेकिन तब वह भारत में नहीं, अमेरिका में रह रही थी. सोवियत संघ की नाराज़गी के डर से इंदिरा गांधी की सरकार ने उसे भारत में राजनैतिक शरण या दूसरा कोई ऐसा दर्जा देने से मना कर दिया, जिसके बल पर वह आजीवन या लंबे समय तक भारत में रह पाती.

दिल्ली स्थित सोवियत दूतावास के भारी दबाव के बीच स्वेतलाना को फ़रवरी 1967 में दिल्ली जाना पड़ा. महीने के अंत में उसकी 42वीं वर्षगांठ भी थी. दिल्ली में उसे सोवियत दूतावास के ही एक आवास में ठहराया गया, ताकि उस पर नज़र रखी जा सके. सोवियत राजदूत निकोलाई बेनिदिक्तोव समझा-बुझा रहे थे कि उसका मॉस्को लौट जाना कितना ज़रूरी है.

संस्मरणों की पांडुलिपि

समझा जाता है कि स्वेतलाना के दिल्ली में होने की आहट पाते ही, मॉस्को में भारत के राजदूत रहे टीएन कौल, किसी समय उससे मिले. उन्होंने उसके संस्मरणों की वह पांडुलिपि उसे लौटाई, जो 1963 तक वह मॉस्को में गुप्त रूप से लिख रही थी. उसे डर था कि यह पांडुलिपि यदि कभी रूसी गुप्तचर सेवा ‘केजीबी’ के हाथ लग गयी तो उसका शेष जीवन जेल में कटेगा. स्वेतलाना ने इस पांडुलिपि को रूस से सुरक्षित बाहर ले जाने के विचार से उसे टीएन कौल को सौंप दिया था. संभव है कि यह सुझाव अपनी मृत्यु से पहले ब्रजेश सिंह ने ही उसे दिया हो. यही पांडुलिपि बाद में चल कर ‘एक मित्र के नाम बीस चिट्ठियां’ (ट्वेन्टी लेटर्स टु ए फ्रैन्ड) के रूप में पुस्तकाकार प्रकाशित हुई और ख़ूब बिकी.

दिल्ली के सोवियत दूतावास के अधिकारी मॉस्को लौट जाने के लिए स्वेतलाना पर जो भारी दबाव डाल रहे थे, उसका उल्टा परिणाम निकलना निश्चित था. यही हुआ. छह मार्च 1967 की शाम उसने राजदूत निकोलाई बेनिदिक्तोव से कहा कि वह मॉस्को वापसी के लिए तैयारी करने जा रही है. एक टैक्सी बुलायी और टैक्सी वाले से कहा कि वह सीधे अमेरिकी दूतावास चले.

अमेरिकी राजदूत चेस्टर बोल्स की भूमिका

अमेरिकी दूतावास भी पास ही था, लेकिन स्वेतलाना के पहुंचने तक वह बंद हो चुका था. असाधारण स्थितियों के लिए जो अधिकारी वहां ड्यूटी पर था, उसे स्वेतलाना ने बताया कि वह कौन है और क्यों आयी है. वह बेचारा घबरा गया. उसकी समझ में नहीं आया कि वह क्या करे. उसने सीधे राजदूत चेस्टर बोल्स को फ़ोन किया कि वे तुरंत दूतावास में आ जाएं क्योंकि एक ऐसा मामला सामने आ गया है, जिसे फ़ोन पर नहीं बताया जा सकता.

चेस्टर बोल्स रात करीब नौ बजे आये. स्वेतलाना ने उनसे कहा कि वह सोवियत तानाशाह स्टालिन की बेटी है. मास्को लौटने के बदले अमेरिका जाना चाहती है. राजदूत बोल्स ने उसे कागज़ का एक पन्ना दिया. कहा, इस पर लिखें कि आप अपने देश के बदले अमेरिका क्यों जाना चाहती हैं. स्वेतलाना जब सब कुछ लिख रही थी, अमेरिकी राजदूत ने ‘केवल देखने के लिए’ (आइज़ ओनली) चेतावनी के साथ उस समय के अमेरिकी विदेशमंत्री डीन रस्क को एक तार भेजा कि मामला क्या है. उन्होंने यह भी लिखा कि ‘मैंने उसे अमेरिका पहुंचाने का कोई वादा नहीं किया है. मैं उसके लिए भारत छोडना केवल संभव बना रहा हूं.’’ तार के अंत में उन्होंने लिखा, ‘(भारतीय समय के अनुसार) मध्यरात्रि तक यदि मुझे कोई उत्तर नहीं मिला, तो मैं अपनी ज़िम्मेदारी पर (अमेरिका का) वीसा दे दूंगा.’

आधी रात तक कोई उत्तर नहीं

जैसा कि चेस्टर बोल्स को डर था, आधी रात तक कोई उत्तर नहीं आया. उन्होंने स्वेतलाना को तुरंत वीसा दिया. अमेरिकी गुप्तचर सेवा सीआईए के एक अधिकारी को कहा गया कि वह स्वेतलाना के साथ तुरंत पालम हवाई अड्डे जाए और उसे रात एक बजे रोम जाने वाले विमान में बिठा दे. सात मार्च को उसके रोम पहुंचने के बाद ही यह समाचार जारी हुआ कि स्टालिन की बेटी स्वेतलाना मॉस्को के बदले रोम में है.

सोवियत संघ में यह समाचार कहीं प्रकाशित नहीं हुआ. केवल सोवियत नेता इसे जानते थे और बौखला रहे थे. भारत के साथ संबंध बिगड़ने की नौबत आती दिख रही थी. लेकिन भारत ने किसी तरह स्थिति संभाली और स्पष्ट किया कि स्वेतलाना के पलायन की भारत को न तो कोई भनक थी और न ही इसमें उसका कोई हित या हाथ है.

‘लोकतांत्रिक भारत मुझे नहीं चाहता...’

अमेरिकी राजदूत ने बाद में बताया कि उन्होंने स्वेतलाना से कहा कि ‘देखिये, मॉस्को में आपकी बेटी और बेटा है. क्या आपने उनके बारे में सोचा है? क्या आपको पक्का विश्वास है कि आप अपने घर लौटना नहीं चाहतीं? यदि कुछ भी शक-संदेह है, तो अभी ही अपने रूसी दूतावास में लौट जाइये. अगले विमान से मॉस्को चले जाइये.’ स्वेतलाना का दो टूक उत्तर था, ‘यदि यही आपका निर्णय है, तो मैं आज ही प्रेस के सामने जा कर कह दूंगी कि लोकतांत्रिक भारत मुझे नहीं चाहता, अब अमेरिका भी मुझे लेने से मना कर रहा है.’

रोम पहुंचने के बाद स्वेतलाना वहां से स्विट्ज़रलैंड में जेनेवा गयी. स्विस सरकार ने उसे टूरिस्ट वीसा दिया और छह सप्ताह उसके वहां रहने और घूमने-फिरने का इंतज़ाम किया. वहां से वह अप्रैल 1967 में अमेरिका पहुंची. अमेरिकी विदेश मंत्रालय को ऐसे किसी व्यक्ति की ज़रूरत थी, जो हवाई अड्डे पर उसे पहचान कर उसका मार्गदर्शन कर सके. इसके लिए स्टालिन के समय में मॉस्को में अमेरिका के राजदूत रह चुके जॉर्ज केनन को चुना गया. वे स्वेतलाना को जानते थे. उनकी बेटी ग्रेस केनन और स्वेतलाना मॉस्को के एक ही स्कूल में पढ़ा करती थीं.

सोवियत नेताओं को तार भिजवाया

जॉर्ज केनन ने स्वेतलाना को तुरंत पहचान लिया. उन्होंने सोवियत नेताओं को एक तार भिजवाया कि स्वेतलाना अब अमेरिका पहुंच गयी है और उसके बच्चों को भी यह बता दिया जाये. बताया जाता है कि उस समय 21 साल के उसके बेटे योज़ेफ़ और 17 साल की बेटी येकातरीना ने मां के इस पलायन को कभी माफ़ नहीं किया. क्रेमलिन ने अपनी प्रचार मशीनरी चालू कर दी. कहा, ‘स्टालिन की बेटी पगला गयी है. सीआईए ने उसका अपहरण कर लिया है. एक भयंकर षड़यंत्र रचा गया है.’

अमेरिका पहुंचते ही स्वेतलाना को उसके संस्मरण प्रकाशित करने के लिए बढ़-चढ़ कर प्रस्ताव मिलने लगे. ये वही संस्मरण थे, जिनकी पांडुलिपि मॉस्को में भारत के राजदूत रहे टीएन कौल के हाथों उसने भारत भिजवायी थी और कौल ने कालाकांकर से दिल्ली लौटने पर दिल्ली में उसे वापस दी थी. 30 लाख डॉलर में उसे बेचने का अनुबंध हुआ. बाद में स्वेतलाना ने कुछ और पुस्तकें भी लिखीं. पुस्तकों की रॉयल्टी से खूब पैसा मिला. स्टालिन की दुखियारी बेटी अमेरिका पहुंचते ही मालामाल हो गयी और ‘मीडिया स्टार’ बन गयी. हर तरफ़ से उस पर निमंत्रणों की बरसात होने लगी. जब तक यह सुखद स्थिति रही, स्वेतलाना कालाकांकर में ब्रजेश सिंह की याद में बने अस्पताल के लिए पैसे भी भेजती रही.

कई बार विवाह, हर बार तलाक़ भी

स्वेतलाना को विवाहों के भी नये-नये प्रस्ताव मिलने लगे. उसने कई बार विवाह किये. हर बार तलाक़ भी दिये. एक और बेटी भी हुई - ओल्गा. समय के साथ पास का पैसा ख़र्च होता गया. उसे लोगों से डर लगने लगा. वहम होने लगा कि सीआईए उस नज़र रख रही है, उसे अपने लिए इस्तेमाल करना चाहती है. मॉस्को रह गये दोनों बच्चों की याद भी सताने लगी. 1984 में स्वेतलाना उनसे मिलने मॉस्को पहुंची. अमेरिका में जन्मी ओल्गा भी साथ में थी. वहां उसने अपने एक भतीजे से कहा, ‘मॉस्को की सड़कों पर से गुज़रती हूं तो मुझे लगता है, हर जगह क़ब्रों पर लगने वाले सलीब खड़े हैं.’

स्वेतलाना कुछ समय ब्रिटेन में भी रही. वहां भी उसका मन नहीं लगा. तब वह फिर अमेरिका चली गयी. कहा जाता है कि स्वेतलाना ने क़रीब 40 बार घर बदले. हर बार पास का पैसा घटता गया. घर छोटे होते गये. अंत में कोई घर-द्वार नहीं रहा. उसे विस्कॉन्सिन के एक वृद्धाश्रम में शरण लेनी पड़ी. स्वेतलाना बूढ़ी और बीमार दिखने लगी. शरीर थुल-थुल हो गया. चेहरा झुर्रियों से पट गया. पिता का नाम सुनते ही भड़क जाती. चीखने-चिल्लाने लगती. इसी दयनीय अवस्था में, भारत की क़ानूनी बहू बनने से वंचित रह गयी स्टालिन की जगप्रसिद्ध बेटी ने, 22 नवंबर 2011 दिन, अंतिम सांस ली. उसे कैंसर हो गया था.

अपने अंतिम दिनों में स्वेतलाना ने अपनी एक अमेरिकी सहेली रोज़ा शैन्ड से कहा था, ‘मैंने सबसे ऊपर रह कर जीवन शुरू किया था, अब सबसे नीचे रह कर अंत कर रही हूं. यही जीवन का सार है.’ उसका बेटा योज़ेफ़ तीन साल पहले ही चल बसा था. बेटी येकातरीना ने मां से कभी बात नहीं की. अमेरिका में जन्मी सबसे छोटी बेटी ओल्गा अमेरिका में ही कहीं रहती है. कहां? कोई नहीं जानता.