गुजरात की पाटीदार नेता रेशमा पटेल जल्द ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का साथ छोड़ सकती हैं. सत्याग्रह से हुई बातचीत में उन्होंने खुद इस बात का इशारा दिया है. गुजरात में रेशमा पटेल उन प्रमुख नेताओं में शुमार थीं जिन्होंने पाटीदार आरक्षण आंदोलन को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई. लेकिन 2017 में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा से जुड़ने की वजह से उन पर आंदोलन को कमजोर करने के आरोप भी जमकर लगे. हालांकि अपने इस फैसले के पीछे उनकी दलील थी कि उन्होंने ऐसा अपने समाज के हित के लिए किया था.

बहरहाल, यहां यह सवाल उठना लाज़मी है कि जिस भाजपा से जुड़ने के लिए रेशमा पटेल ने बड़े स्तर पर अपने समुदाय और समर्थकों की नाराज़गी झेली थी, वहां ऐसा क्या हुआ कि करीब सवा साल में ही उन्हें अलग होने का फैसला लेना पड़ रहा है. वह भी ऐसे मौके पर जब लोकसभा चुनावों में थोड़ा ही समय बचा है.

इस बारे में हम से हुई चर्चा में रेशमा पटेल पहले उन कारणों का ज़िक्र करती हैं जिनके चलते उन्होंने भाजपा के साथ जाने का निर्णय लिया था. वे बताती हैं, ‘कई पाटीदार नेताओं की तरह मेरी भी प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ समाज को आरक्षण का लाभ दिलवाना था. लेकिन हार्दिक पटेल पूरे पाटीदार आंदोलन का इस्तेमाल निजी फ़ायदे के लिए करने लगे थे. वहीं दूसरी तरफ विधानसभा चुनाव में भाजपा के जीतने की संभावना ज्यादा दिख रही थी. ऐसे में मुझे महसूस हुआ कि बतौर सरकार भाजपा से समुदाय के हित सधवाने के लिए उससे जुड़ना ही होगा. हमारे समुदाय के प्रमुख धार्मिक संगठनों का भी यही मानना था. लेकिन शुरुआती हफ़्तों में ही महसूस होने लगा कि हम सभी गलत थे.’

साथ जुड़ने के लिए रेशमा पटेल ने भाजपा के सामने जिन शर्तों को रखा था, उनका ज़िक्र करते हुए वे कहती हैं, ‘तब यह तय हुआ था कि भाजपा की सरकार बनने के तुरंत बाद आंदोलन में मारे गए सभी चौदह युवाओं के घरवालों को जल्द से जल्द मुआवज़ा दिया जाएगा. मृतकों के परिवार के किसी सदस्य को कम से कम अर्धसरकारी या सहकारी नौकरी पर रखा जाएगा. पाटीदारों के अधिकारों के लिए एक अलग आयोग का गठन होगा. समाज के जितने भी युवाओं पर मुकदमे दर्ज़ थे, वे सभी वापस लिए जाएंगे.’ अफ़सोस जताते हुए रेशमा आगे जोड़ती हैं किे तमाम कोशिशों के बावजूद इनमें से बहुत सारे काम नहीं होने दिए गए.

भाजपा के साथ रहे अपने अनुभवों को हम से साझा करते हुए रेशमा पटेल कहती हैं, ‘भाजपा मार्केटिंग भले ही विकास की करती है. लेकिन उसकी राजनैतिक सोच विनाश की है. इस सवा साल में हमने लोगों की सेवा करने की बहुत कोशिश की. लेकिन पार्टी के लोग पद के मद में इतने चूर हैं कि किसी की सुनने के लिए तैयार ही नहीं. यही कारण है कि बीते कुछ सालों के दौरान गुजरात में बड़ी संख्या में सामाजिक और कार्मिक आंदोलन देखने को मिले हैं.’ रोष के साथ वे आगे कहती हैं, ‘पार्टी की नेता होने के बावजूद मुझे लोगों की वाजिब मांगों के लिए मंत्रालय-दर-मंत्रालय, दफ़्तर-दर-दफ़्तर कई-कई चक्कर काटने पड़ते थे.’

रेशमा पटेल इस बात पर भी हमारा ध्यान दिलाती हैं कि न तो अभी तक उन्होंने संगठन को इस्तीफा सौंपा है और न ही उनसे इसकी मांग की गई है. लेकिन साथ ही वे यह आरोप भी लगाती हैं कि जब उन्होंने संगठन के इस रवैये की मुख़ालफ़त शुरू की तो पहले तो उन्हें झूठे आश्वासन देकर फुसलाया गया. और वे तब भी न मानी तो उनके पास धमकी भरे फोन आने शुरू हो गए. वे बताती हैं कि कोई कितना भी धमकाए लेकिन वे इस बार गुजरात की पोरबंदर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का मन बना चुकी हैं.

अपने जनाधार और जीत-हार से जुड़े सवाल पर वे जवाब देती हैं, ‘चुनावी नतीजे जनता के हाथ में हैं. लेकिन मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि मैं इस चुनाव में भाजपा का असली चेहरा लोगों के सामने बेनक़ाब कर सकूं.’ हालांकि वे यह स्पष्ट नहीं करतीं कि इस चुनाव में वे निर्दलीय ही मैदान में उतरेंगी या किसी अन्य संगठन के बैनर तले. इस बारे में उनका कहना है, ‘अभी अलग-अलग जगह से बात चल रही है. लेकिन कुछ भी तय नहीं हुआ है. चुनाव से पहले की परिस्थिति और समर्थकों की राय-शुमारी करने के बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा.’

लेकिन सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि रेशमा पटेल लोकसभा चुनाव से पहले नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का दामन थाम सकती हैं. गुजरात में एनसीपी के अध्यक्ष जयंत बोस्की भी इस संभावना से इनकार नहीं करते. उनके शब्दों में, ‘कांग्रेस के साथ गठबंधन में हमें पोरबंदर सीट का मिलना लगभग तय है. अगर सब-कुछ ठीक रहा तो यहां से रेशमा पटेल का नाम आगे बढ़ाया जा सकता है.’

प्रत्याशी के तौर पर उनकी मजबूती का ज़िक्र करते हुए बोस्की इलाके के जातिगत समीकरणों का हवाला देते हैं. बकौल बोस्की, ‘इस क्षेत्र में कड़ुआ पाटीदार (पाटीदारों की तीन शाखाएं- कड़ुआ, लेऊआ और आंजना गुजरात के अलग-अलग हिस्सों में फैली हैं) सर्वाधिक तादाद में हैं. रेशमा इसी समुदाय से आती हैं. यह भी एक कारण है कि यहां उनका बड़ा जनाधार मौजूद है. इसके बाद यहां दूसरी बड़ी आबादी अहीरों की हैं. पोरबंदर से हमारे एक विधायक कांदल जडेजा इस समुदाय का नेतृ्त्व करते हैं. इसलिए रेशमा यदि हमसे जुड़ती हैं तो यहां उन्हें इस समुदाय का भी समर्थन मिलना तय है.’

पोरबंदर के स्थानीय पत्रकार भरत रांतरिया भी कुछ-कुछ ऐसी ही बात दोहराते हैं. वे बताते हैं, ‘पोरबंदर लोकसभा सीट के तहत आने वाली सात में से पांच विधानसभा क्षेत्रों में पाटीदारों का जबरदस्त प्रभुत्व है. साथ ही यहां सात में दो विधायक कांग्रेस और एक एनसीपी से आते हैं जो मिलकर रेशमा पटेल के पक्ष में अच्छी हवा बना सकते हैं. इसके अलावा पिछले करीब तीन साल के दौरान रेशमा पटेल ने यहां लगातार सक्रिय रहकर खुद भी बड़ी संख्या में अपने समर्थक खड़े किए हैं.’

वहीं, प्रदेश कांग्रेस से जुड़े एक विश्वसनीय सूत्र की मानें तो जरूरत पड़ने पर उनकी पार्टी भी रेशमा पर दांव लगाने से नहीं झिझकेगी. इन दोनों ही संभावित स्थितियों के मद्देनज़र प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार बसंत रावत कहते हैं कि यदि इनमें से एक समीकरण भी सही बैठ गया तो यह घटनाक्रम न सिर्फ रेशमा पटेल के राजनैतिक कैरियर का अहम मोड़ साबित होगा, बल्कि पूरे प्रदेश में लोकसभा चुनावों को प्रभावित करने वाला हो सकता है. उनके शब्दों में, ‘रेशमा ऊर्जावान होने के साथ, जबरदस्त आक्रामक भी हैं. इसलिए लोग उन्हें सुनना पसंद करते हैं. साथ ही वे स्वाभाविक तौर पर महिलाओं को अपने साथ जोड़ने में भी माहिर हैं. यदि कांग्रेस उन्हें अपने या गठबंधन के ज़रिए उचित मौका देती है तो पूरे प्रदेश में प्रचार कर रेशमा, भाजपा के लिए एक नया सिरदर्द बन सकती हैं.’