उत्तर प्रदेश में धुर राजनीतिक विरोधी मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के गठबंधन के बाद दूसरे राज्यों में भी विपक्षी पार्टियों द्वारा ऐसे गठबंधन बनाने की कोशिशें हो रही हैं. विपक्षी पार्टियों के कई बड़े नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि अगर भाजपा को 2019 लोकसभा चुनावों में रोकना है तो अधिक से अधिक राज्यों में विपक्ष को एकजुट होना पड़ेगा. इसलिए धुर विरोधी मानी जाने वाली पार्टियों को अलग-अलग राज्यों में एकजुट करने की दिशा में लगातार कोशिश हो रही है.

इसी कड़ी में देश की राजधानी दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की कोशिशें चल रही थीं. आम आदमी पार्टी वैसे तो राजनीति में नई है लेकिन जितने कम समय में यह 2015 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली में प्रचंड बहुमत हासिल करने में कामयाब हुई, उससे कम से कम दिल्ली के अंदर इसकी ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है. 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में आप ने कुल 70 में से 67 सीटों पर जीत हासिल की थी. बाकी की तीन सीटें भाजपा को मिली थीं. कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाया था.

2014 के लोकसभा चुनावों में राजधानी दिल्ली की सभी सात सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार जीते थे. इन सातों सीटों पर आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थे. लेकिन कांग्रेस के मिले वोटों को अगर आप के वोटों में जोड़ दिया जाए तो इन्हें दिल्ली की सात में से छह सीटों पर भाजपा के विजयी उम्मीदवारों से अधिक वोट मिले थे. सिर्फ पश्चिमी दिल्ली की सीट पर आप और कांग्रेस को मिलाकर भी भाजपा से कम वोट मिले थे.

इसलिए आप और कांग्रेस दोनों को लग रहा है कि अगर वे मिलकर चुनाव लड़ें तो 2019 में भाजपा के प्रदर्शन को 2014 के मुकाबले बिल्कुल उलटा भी किया जा सकता है. यही वजह है कि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की कोशिशें चल रही थीं. दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन का प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफे की एक प्रमुख वजह कांग्रेस-आप का संभावित गठबंधन ही था. खबरों के मुताबिक माकन नहीं चाहते थे कि यह गठबंधन हो जबकि दूसरे कई नेता इस गठबंधन के पक्ष में थे.

आज स्थिति बिल्कुल अलग है. आप-कांग्रेस में इस गठबंधन के बड़े समर्थकों में एक अजय माकन हैं. उधर, माकन के बाद प्रदेश अध्यक्ष का पद संभालने वाली दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री जहां पहले गठबंधन समर्थक थीं, वहीं अब वे इसका विरोध कर रही हैं. यहां इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि जब 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में आप पहली बार चुनाव लड़ी थी और 28 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब हुई थी तो खुद आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल से चुनाव हारने वाली शीला दीक्षित ने कांग्रेस के समर्थन से उनकी सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी.

तो शीला दीक्षित अब इस गठबंधन के खिलाफ क्यों हो गईं? क्यों यह गठबंधन होते-होते रह गया? प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता इस बारे में कहते हैं, ‘शीला दीक्षित इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही हैं कि दिल्ली में आज की स्थिति में आम आदमी पार्टी कांग्रेस से बड़ी पार्टी है. इसलिए वे कम से कम सीटों के मामले में बराबरी का समझौता करने की पक्षधर हैं.’ एक दूसरी वजह पार्टी में यह भी बताई जा रही है कि शीला दीक्षित के बेटे और पूर्व सांसद संदीप दीक्षित पहले तो चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से उनके बारे में पार्टी में यही कहा जा रहा है कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे. कांग्रेस के ये नेता कहते हैं, ‘अगर वे चुनाव लड़ते तो हो सकता है कि शीला दीक्षित का रुख थोड़ा अलग होता. वैसे भी छह सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा के बावजूद आम आदमी पार्टी जिन दो सीटों पर से उम्मीदवार हटाने को तैयार है, उसमें संदीप दीक्षित की पूर्वी दिल्ली सीट भी शामिल है.’

पिछले दिनों शीला दीक्षित समेत प्रदेश कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मिले. इसके बाद शीला दीक्षित ने घोषणा कर दी कि अब आम आदमी पार्टी से गठबंधन नहीं होगा और कांग्रेस सभी सात सीटों पर खुद ही चुनाव लड़ेगी. तो क्या गठबंधन की सारी संभावनाएं खत्म हो गई हैं?

इसके जवाब में दिल्ली में सांसद रहे एक कांग्रेसी नेता कहते हैं, ‘सच्चाई तो यही है कि अभी भी कोशिशें चल रही हैं.’ तो शीला दीक्षित की पूरी प्रतिबद्धता से गठबंधन नहीं करने की घोषणा का क्या कोई मतलब नहीं है? जवाब में वे कहते हैं, ‘अगर आपको याद हो तो 2017 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में शीला दीक्षित खुद कांग्रेस पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार थीं. बाद में क्या हुआ? कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन हो गया. जहां पहले वोट शीला दीक्षित के नाम पर मांगे जो रहे थे, वहीं बाद में अखिलेश यादव और राहुल गांधी के नाम पर वोट मांगा गया. इसलिए ये कहना ठीक नहीं होगा कि दिल्ली में इस तरह की कहानी नहीं दोहराई जा सकती. अब भी गठबंधन की संभावनाएं हैं.’

गठबंधन की संभावनाओं को जिंदा रखते हुए कांग्रेस के एक नेता एक दूसरी वजह भी बताते हैं, ‘प्रदेश स्तर के कुछ नेता भले ही इस गठबंधन के लिए तैयार नहीं हों, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के अधिकांश नेता आप से गठबंधन के पक्ष में हैं. इनमें गुलाम नबी आजाद, अशोक गहलोत, अहमद पटेल जैसे कांग्रेस पार्टी के प्रमुख लोगों का नाम लिया जा सकता है. इन्हें लगता है कि 2019 लोकसभा चुनावों को लेकर जो स्थिति बन रही है, उसमें चुनाव परिणामों के बाद एक-एक सीट का काफी महत्व रहेगा. ऐसे में इन्हें लगता है कि दिल्ली की सात सीटों को भाजपा के लिए एकदम से खुला छोड़ देना जोखिम का काम है. क्योंकि आप और कांग्रेस के अलग-अलग लड़ने से सबसे अधिक फायदा भाजपा का होगा.’

कांग्रेस पार्टी के प्रदेश स्तर के एक पदाधिकारी गठबंधन के लिए हुई बातचीत और आगे की संभावनाओं के बारे में कहते हैं, ‘कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में विवाद सिर्फ एक सीट के लिए है. कांग्रेस तीन सीटें चाहती है और आप कांग्रेस को दो सीट - पूर्वी दिल्ली और चांदनी चौक - देने को तैयार है. एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार उतारकर दोनों पार्टियां उसका समर्थन करने को भी तैयार हैं. इसका मतलब यह हुआ कि आप इस गठबंधन के लिए 4-2-1 का फाॅर्मूला दे रही है तो कांग्रेस 3-3-1 के फाॅर्मूले के साथ खड़ी है.’

वे आगे कहते हैं, ‘अगर राष्ट्रीय नेताओं ने अपना दबाव बनाए रखा और आप ने भी थोड़ा लचीला रुख अपनाया तो अब भी गठबंधन की दो स्थितियां बन सकती है. एक तो यह हो सकता है कि आप निर्दलीय वाली सीट कांग्रेस को देने को तैयार हो जाए और दोनों पार्टियों के बीच 4-3 का फाॅर्मूला बने. वहीं दूसरी स्थिति यह है कि दो सीटों पर दो प्रमुख लोगों को चुनाव लड़ाने के लिए दोनों पार्टियां तैयार हो जाएं और 3-2-2 के फाॅर्मूले के साथ समझौता हो. अंदरखाने में इन स्थितियों को लेकर अब भी बातचीत का दौर चल रहा है और अगले कुछ दिन इस गठबंधन के लिहाज से निर्णायक होने वाले हैं.’