उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा नेता मायावती ने हाल में अपनी पार्टी के सभी नेताओं को एक चेतावनी दी. चेतावनी यह थी कि चुनाव प्रचार या किसी अन्य कार्यक्रम के लिए लगाये जाने वाले पोस्टरों में उनका फोटो मायावती के फोटो से छोटा हो, बराबर या उनसे बड़ा नहीं.

बसपा का यह राजनीतिक फैसला उत्तर प्रदेश के उस राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य की भी एक झलक देता है जहां समर्थों और ताकतवरों के कुनबे के आगे किसी दूसरे को नहीं टिकने दिया जाता. अभी-अभी सूबे के आईएएस संवर्ग के अधिकारियों के बीच के ऐसे ही बड़े-छोटे के एक झगड़े से भी यही निष्कर्ष निकलता है. सूबे में प्रोन्नति पाकर आईएएस बने अधिकारियों ने प्रतियोगी परीक्षाओं द्वारा चुन कर आये मूल आईएएस कैडर के अधिकारियों ने अपना एक अलग संगठन, प्रोन्नत आईएएस मंच बना लिया है. इसके पीछे की वजह उन्होंने अपनी उपेक्षा और अपमान को बताया है.

इन अधिकारियों की कई शिकायतें हैं. मसलन उत्तर प्रदेश आईएएस एसोसिएशन का सदस्य होने के बावजूद उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता. एसोसिएशन में डायरेक्ट सेवा के अधिकारियों का ही बोलबाला रहता है, एसोसिएशन मूल कैडर के अधिकारियों के खिलाफ प्रोन्नत अधिकारियों की शिकायतों पर ध्यान तक नहीं देती, उनके अच्छे कार्यों को भी एसोसिएशन आगे नहीं बढ़ाती, जमीन पर काम वे करते हैं, मगर श्रेय कोई और ले जाता है, उनके साथ गैरबराबरी और दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है जबकि मूल कैडर वाले आईएएस कागजी कामों पर भी वाहवाही लूटते हैं वगैरह-वगैरह.

प्रोन्नत आईएएस मंच की स्थापना के लिए लखनऊ में हुई प्रोन्नत अधिकारियों की बैठक में इस तरह की शिकायतें भी सामने आई कि मूल कैडर के अफसर प्रोन्नत अधिकारियों के साथ कई तरह का भेदभाव करते हैं. उनसे हाथ मिलाने तक में संकोच किया जाता है. भेंट-मुलाकात में चाय पानी तक को नहीं पूछा जाता. प्रोन्नत अधिकारियों के खिलाफ छोटी सी शिकायत को भी बड़ा बनाकर दिखाया जाता है, जबकि मूल कैडर वालों के बड़े-बड़े कारनामे भी दबाने की कोशिश की जाती है.

प्रोन्नत आईएएस मंच के मनोनीत संयोजक उमेश प्रताप सिंह कहते हैं, ‘प्रोन्नत आईएएस अधिकारियों के साथ लगातार अपमानजनक घटनाएं घट रही हैं. आईएएस एसोसिएशन में हमारा दर्द सुनती नहीं. एसोसिएशन में मूल संवर्ग के अधिकारियों का ही अधिपत्य है. प्रोन्नत अधिकारी काफी समय से घुटन महसूस कर रहे थे और ऐसे मंच की जरूरत लम्बे समय से महसूस की जा रही थी. यह मंच केवल प्रोन्नत अधिकारियों के मान सम्मान की रक्षा के लिए बनाया गया है. बराबरी के अधिकार को हासिल करने के लिए बनाया गया है.’

हालांकि आईएएस एसोसिएशन इस तरह के आरोपों से इनकार करती है. एसोसिएशन का कहना है कि वह अपने सभी सदस्यों को बराबर मानती है और वरिष्ठता का सम्मान हो इस बात का भी ध्यान रखा जाता है. उत्तर प्रदेश आईएएस एसोसिएशन के वर्तमान अध्यक्ष प्रवीर कुमार कहते हैं, ‘चाहे कोई अफसर किसी भी सेवा से आए, जो एक बार हमारे संवर्ग का हिस्सा बन जाता है, वह हमारे लिए बराबर होता है. एसोसिएशन सभी सदस्यों के हितों का ध्यान रखती है और किसी इक्का-दुक्का अधिकारी के व्यवहार या सोच को पूरी एसोसिएशन की सोच नहीं कहा जा सकता.’

लेकिन इस सफाई के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मूल आईएएस और प्रोन्नत आईएएस अधिकारियों के बीच के रिश्तों में सब कुछ ठीक नहीं है. प्रोन्नत अधिकारियों को शिकायत रहती है कि प्रोन्नत होने के बावजूद उन्हें जिम्मेदारी देने में भेदभाव किया जाता है. उनके मुताबिक मूल संवर्ग के अधिकारी सब कुछ अपने ही कब्जे में रखना चाहते हैं जबकि प्रोन्नत अधिकारियों में ज्यादातर अधिकारी पीसीएस संवर्ग से आते हैं और उनके पास पर्याप्त जमीनी अनुभव होता है.

उत्तर प्रदेश में इस समय आईएएस के 621 पद हैं जिनमें 433 सीधे चयनित आईएएस हैं. शेष 188 पद प्रोन्नत आईएएस अफसरों के लिए हैं. जाहिर है कि संख्या में आधे से भी कम होने के कारण भी प्रोन्नत अधिकारियों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

हालांकि कुछ अधिकारियों का यह भी कहना है कि प्रोन्नत अधिकारियों की मौजूदा संख्या ही उनकी ताकत बन गई है. सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी कैप्टन एसके द्विवेदी कहते हैं, ‘पहले यूपी में प्रोन्नत अधिकारियों की संख्या तुलनात्मक रूप से काफी कम होती थी. 15-20 अधिकारियों के बैच में 3-4 अफसर ही प्रोन्नत वर्ग के होते थे. लेकिन पिछले तीन-चार वर्षों में बड़ी संख्या में प्रोन्नति होने से प्रोन्नत आईएएस अधिकारियों की संख्या काफी बढ़ गई है. यह बढ़ी हुई संख्या ही अब उनकी ताकत बन गई है. इसी कारण उन्होंने अपनी आवाज उठाने के लिए अपना संगठन अलग बना लिया है.’

हालांकि यह भी माना जा रहा है कि इस नए संगठन का असली मकसद शासन में महत्वपूर्ण पदों पर समानुपातिक हिस्सेदारी हासिल करना है. सामान्यतः तबादलों में सरकार की भी बड़ी भूमिका होती है. लेकिन यह भी सच है कि राज्य में अफसरों के तबादले का जिम्मा जिस नियुक्ति सचिव के पास होता है वह मूल आईएएस कैडर का ही होता है. इसलिए प्रायः चार वर्ष की सेवा वाले मूल कैडर के अधिकारी को बड़े जिलों का जिलाधिकारी बना दिया जाता है. जबकि 15-20 वर्ष के अनुभव वाले प्रोन्नत अधिकारियों को बेहद छोटे जिलों की कमान दी जाती है. ऐसा ही अन्य महत्वपूर्ण पदों के बारे में भी होता है. प्रोन्नत अधिकारियों ने अपना अलग संगठन बना लिया है तो अब प्रोन्नत अधिकारियों को यकीन है कि इससे आईएएस एसोसिएशन पर भी दबाव बढ़ेगा और उन्हें महत्वपूर्ण पदों में हिस्सेदारी के मामले में भी बराबरी हासिल हो सकेगी.

वैसे इस बात का उदाहरण भी मौजूद है कि उत्तर प्रदेश की आईएएस बिरादरी दबाव में किस तरह कमजोर पड़ जाती है. मायावती के कार्यकाल में जिस तरह एक नाॅन कैडर शशांक शेखर सिंह को राज्य में मुख्य सचिव से भी ऊंचे कैबिनेट सचिव के पद पर बिठा दिया गया था उस समय आईएएस संवर्ग विरोधस्वरूप चूं भी नहीं कर सका था. शशांक शेखर सिंह की नियुक्ति का प्रश्न रहा हो या उनकी कार्यशैली का मामला, आईएएस बिरादरी की ओर से कोई आवाज तक नहीं उठी. वह इतने दबाव में आ गई थी कि आईएएस एसोसिएशन तक निष्क्रिय हो गई थी और लंबे समय तक कोई भी अधिकारी उसका अध्यक्ष बनने तक को तैयार नहीं था.

बहरहाल प्रोन्नत अधिकारियों द्वारा नया संगठन बनाने से बराबरी का हक मिले या न मिले इस बात ने सूबे की सबसे बड़ी अफसर बिरादरी के बीच बड़े और छोटे की लड़ाई को सड़क पर तो पहुंचा ही दिया है और इस कलह का प्रतिकूल प्रभाव राज्य के विकास पर पड़ना अवश्यंभावी है.