भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक माना जाता है- मानहानि का मामला. यानी वह मामला जब कोई व्यक्ति या संस्था यह आरोप लगाते हुए अदालत में मुक़दमा दर्ज़ करा देता है कि अमुक व्यक्ति के बयान या किसी काम से उसके मान-सम्मान को क्षति पहुंची है. मानहानि के मामले आपराधिक और दीवानी दोनों तरह के हो सकते हैं. आम तौर पर इस तरह के मामले ज़्यादातर मीडिया के ख़िलाफ़ ही दर्ज़ कराए जाते हैं. उसे दबाने के लिए. लिहाज़ा आपराधिक मानहानि के मामले में संबंधित पत्रकार को जेल की सज़ा हो सकती है.

उधर, दीवानी मामले में संबंधित मीडिया समूह को भारी वित्तीय नुकसान होने की संभावना रहती है. और अगर यह सब न हो तब भी मुक़दमे की अक़्सर लंबी खिंचने वाली सुनवाई भी किसी सज़ा से कम नहीं होती. ख़ास तौर पर तब जब मामला किसी दूरदराज़ के इलाके में दायर कराया जाए.

हालांकि मानहानि के दीवानी मामलाें की राह में एक बड़ी स्वाभाविक बाधा भी है. वह है अदालत की फीस. जो व्यक्ति अदालत में मानहानि का दीवानी मामला दायर कराता है उससे अदालती फीस के तौर पर एक निश्चित रकम वसूली जाती है. यह उस रकम का कुछ प्रतिशत हिस्सा होता है जो संबंधित व्यक्ति अपनी मानहानि के एवज़ में प्रतिवादी से मांगता है. ऐसे मामलों के लिए देश के तमाम राज्यों में अदालती फीस का यह प्रतिशत अलग-अलग निर्धारित है. यही वह बिंदु है जो ज़्यादातर बड़े कारोबारियों को मानहानि के दीवानी मामले दायर करने के लिए गुजरात और ख़ास तौर पर अहमदाबाद खींच लाता है. कैसे? इसे समझने की कोशिश करते हैं.

गुजरात और अहमदाबाद ही क्यों?

अभी कुछ समय पहले ही देश के जाने-माने कारोबारी अनिल अंबानी ने ‘द सिटीज़न’ नामक वेब पोर्टल और उसकी संपादक सीमा मुस्तफ़ा के ख़िलाफ़ अहमदाबाद की अदालत में मानहानि का दीवानी मुक़दमा दायर किया है. इसमें अनिल अंबानी ने सीमा मुस्तफ़ा से 7,000 करोड़ रुपए का मुआवज़ा मांगा है. इस पोर्टल ने रफाल लड़ाकू विमानों के सौदे के संबंध में कुछ ख़बरें छापी थीं. इन ख़बरों में आरोप लगाया गया है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सरकारी एचएल (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) कंपनी को दरकिनार कर एक निजी कंपनी (अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस) को लाभ पहुंचाया.

यही नहीं. अनिल अंबानी ने अहमदाबाद की अदालत में ही एनडीटीवी के ख़िलाफ़ भी इसी विवाद के सिलसिले में एक अन्य दीवानी मुक़दमा दायर किया है. इसमें एनडीटीवी से 10,000 करोड़ रुपए का मुआवज़ा मांगा गया है. इसके अलावा द टेलीग्राफ में छपी ख़बर की मानें तो अनिल अंबानी की कंपनी ने कई कांग्रेस नेताओं और आम आदमी पार्टी के राज्य सभा सदस्य संजय सिंह के ख़िलाफ़ भी इसी विवाद में मानहानि के दीवानी मुक़दमे दायर कर रखे हैं. इन सभी मुक़दमों में अनिल अंबानी की कंपनी ने सभी प्रतिवादियों से कुल मिलाकर लगभग 72,000 करोड़ रुपए के मुआवज़े की मांग की है.

अनिल अंबानी ही नहीं, 2017 में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के कारोबारी बेटे जय शाह ने भी अहमदाबाद की अदालत को ही चुना था. उन्होंने न्यूज़ पोर्टल ‘द वायर’ के ख़िलाफ़ 100 करोड़ रुपए का मानहानि का मामला दायर किया था. पोर्टल ने जय शाह के कारोबारी लेन-देन पर संदेह जताया था. बाद में इस मामले को रद्द कराने के लिए ‘द वायर’ को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी थी.

मानहानि का मुकदमा दायर करने के लिए इन कंपनियों/कारोबारियों द्वारा गुजरात को चुनने की जब वज़हें जानी गईं तो उनमें एक यह निकली कि इनमें से कुछ के दफ़्तर इसी राज्य में हैं. लेकिन दूसरी इससे अहम ज़्यादा मार्के की वज़ह यह समझ आई कि गुजरात में ऐसे मुक़दमों की कोर्ट फीस बहुत कम है. गुजरात कोर्ट फीस एक्ट-2004 के मुताबिक अदालती मामला कितने ही बड़े मुआवज़े का क्यों न हो अदालती फीस के तौर पर 75,000 रुपए से ज्यादा नहीं लिए जा सकते. इसके अलावा एक बात और है. गुजरात उच्च न्यायालय ऑरिजिनल सिविल ज्यूरिस्डिक्शन का प्रयोग नहीं करता. यानी गुजरात उच्च न्यायालय में इस तरह के मामले सीधे नहीं पहुंच सकते. निचली अदालत से होते हुए उनके फ़ैसलों के ख़िलाफ़ अपील के तौर पर ही पहुंचते हैं. यानी ऐसे सभी मामलों में निचली अदालत में दावा दायर किया जा सकता है.

वहीं देश के अन्य राज्यों में स्थिति अलग है. मसलन- बॉम्बे, कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ऑरिजिनल सिविल ज्यूरिस्डिक्शन का प्रयोग करते हैं. यानी निश्चित राशि सीमा वाले दीवानी मामले ही निचली अदालतों में दायर होते हैं. निर्धारित सीमा से ऊपर वाले मामलाें को सीधे उच्च न्यायालय में दायर करना पड़ता है. इसके अलावा कोर्ट फीस का मामला भी है. जैसे- तमिलनाडु में 10 से 25 लाख रुपए तक राशि सीमा के दीवानी मामले सिटी सिविल कोर्ट में दायर किए जाते हैं. और निचली अदालतें 10 लाख रुपए से ऊपर की राशि वाले सभी मामलों में याचिकाकर्ता से कुल राशि का तीन फ़ीसदी हिस्सा कोर्ट फीस के तौर पर वसूलती हैं. अगर मामला 25 लाख रुपए से ज़्यादा का होता है तो वह सीधे मद्रास उच्च न्यायालय में पहुंच जाता है, जो कुल राशि का एक फ़ीसदी हिस्सा कोर्ट फीस के रूप में लेता है.

यानी रिलायंस ने अगर एनडीटीवी के ख़िलाफ़ 10,000 करोड़ रुपए की मानहानि का मामला तमिलनाडु में दायर किया होता तो उसकी सुनवाई सीधे मद्रास उच्च न्यायालय में होती. यहां कोर्ट फीस के तौर पर रिलायंस को 100 करोड़ रुपए चुकाने पड़ते.

मसला शक्ति असंतुलन का भी है

वैसे मानहानि और संपत्ति आदि से संबंधित दीवानी मामलाें में अंतर है. संपत्ति से जुड़े मामलों में तो सीधे तौर हुए नुकसान का आकलन किया जा सकता है. उस हिसाब से मुआवज़े की रकम उचित है या नहीं यह अनुमान भी लगाया जा सकता है. लेकिन मानहानि के दीवानी मामले व्यक्ति की साख से जुड़े होते हैं. उस साख किसी के आरोप वग़ैरह से कितनी चोट पहुंची है, कितना नुकसान हुआ है, इसका अनुमान कैसे लगाया जाए. इसीलिए ऐसे मामले दायर करने वाले अनाप-शनाप मुआवज़े का दावा कर लेते हैं. जैसा कि रिलायंस ने किया भी है.

अब यहां सवाल उठता है कि अनिल अंबानी जैसे कारोबारी ताे देश-दुनिया में कहीं भी जाकर, कितनी भी फीस चुकाकर ऐसे मामले दायर कर सकते हैं. लेकिन आम आदमी का क्या हो. वह कहां जाए. तो क्या सभी जगहों पर कोर्ट फीस कम की जानी चाहिए? साथ ही निचली अदालतों के लिए दीवानी मामलों की सुनवाई की निर्धारिश राशि सीमा बढ़ाई जानी चाहिए?

इन सवालों के पक्ष में कई दलीलें हैं. जैसे कि एक तो यही कि अगर निचली अदालतों के लिए दीवानी मामलों की सुनवाई की निर्धारिश राशि सीमा बढ़ाई जाती है तो यह आम आदमी के हित में है ही, न्यायिक व्यवस्था के फ़ायदे की बात भी है. क्योंकि इससे उच्च न्यायालयों पर दीवानी मामलों की सुनवाई का बोझ कम होगा. इससे वे अपीलीय जैसे मामलों की सुनवाई पर अच्छी तरह ध्यान केंद्रित कर सकेंगे.

हालांकि यहां गुजरात जैसे राज्यों की व्यवस्था को भी दोषहीन नहीं कहा जा सकता. क्योंकि यहां कोर्ट फीस कम करके मुकदमा दायर करने वाले को सुविधा दी गई है. लेकिन प्रतिवादी की मुश्किलें कम करने का कोई इंतज़ाम नहीं है. और फिर अगर मुकदमा दायर करने वाला कोई अनिल अंबानी जैसा कारोबारी हो या बड़ा नेता तथा उसका सामना करने वाला कोई आम पत्रकार तो कल्पना की जा सकती है कि शक्ति असंतुलन की क्या स्थिति बनती होगी. बनती भी है. इस शक्ति असंतुलन की स्थिति में न्यायिक ख़ामियों अपने हित में इस्तेमाल करने की संभावनाएं भी बनती हैं. ख़ास तौर पर कुछ ताक़तवर लोगों के हाथों.

लिहाज़ा एक सशक्त दलील है कि मानहानि के दीवानी मामलों के लिए पूरे देश में एक जैसी और विशिष्ट व्यवस्था बनाई जानी चाहिए. जिससे शक्ति असंतुलन और ताक़तवर लोगों के हाथों न्याय व्यवस्था के दुरुपयोग को रोका जा सके. यह व्यवस्था इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि ऐसे मामले आम तौर पर आलोचनाओं का मुंह बंद करने और स्वतंत्र पत्रकारिता पर लगाम लगाने के लिए ही दायर किए जाते हैं.