सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद से जुड़े मामले को मध्यस्थता के ज़रिये हल किए जाने की बात कहते हुए शुक्रवार को इसके लिए एक तीन सदस्यीय पैनल का गठन किया है. इस पैनल की अगुआई सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एफ़एम कलीफुल्ला करेंगे. बाक़ी दो सदस्य वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू और आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर हैं. शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि पैनल एक हफ़्ते के अंदर मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू करे, चार हफ़्ते में शुरुआती रिपोर्ट दे और आठ हफ़्तों में पूरी रिपोर्ट सौंपे.

लेकिन प्रक्रिया शुरू होना तो दूर, सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देश दिए जाने के तुरंत बाद पैनल के एक सदस्य पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. ये सदस्य हैं श्री श्री रविशंकर. सोशल मीडिया पर कई लोगों का कहना है कि इतने बड़े मामले में किसी निष्पक्ष व्यक्ति को मध्यस्थ बनाया जाना चाहिए, जबकि अयोध्या मामले में रविशंकर का रुख़ मंदिर निर्माण के पक्ष में रहा है. तथ्यों पर ग़ौर करें तो इस बात में वजन लगता है.

‘मुसलमानों को विवादित ज़मीन पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए’

रविशंकर कहते रहे हैं कि अगर इस मामले के सभी पक्ष राज़ी हों तो वे मध्यस्थता कर कोई रास्ता निकालने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ़ वे ऐसे बयान भी देते हैं जो मंदिर समर्थकों और कट्टर हिंदू संगठनों को ख़ासे भाते हैं. मसलन, पिछले साल मार्च में उन्होंने कहा था कि अगर अयोध्या का मसला जल्दी नहीं सुलझा तो भारत के हालात ‘सीरिया’ (गृह युद्ध) जैसे हो जाएंगे.

इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में आध्यात्मिक गुरु ने कहा था कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला किसी के भी पक्ष में हो, उससे दूसरे पक्ष में बेचैनी और ‘विश्वासघात’ की भावना पैदा होगी. रविशंकर के मुताबिक़ इससे ‘हारने’ वाला पक्ष अतिवाद का शिकार होकर भारत में ‘सीरिया’ जैसे हालात बना सकता है. इसके बाद रविशंकर ने कहा कि मुसलमानों को विवादित ज़मीन पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘अयोध्या मुसलमानों की आस्था से नहीं जुड़ा है... हम भगवान राम को कहीं और पैदा नहीं होने दे सकते.’

वहीं, एनडीटीवी के मुताबिक़ श्री श्री रविशंकर ने यह भी कहा था, ‘इस्लाम के मुताबिक़ आप किसी विवादित जगह पर मस्जिद नहीं बना सकते... अगर कोर्ट मंदिर के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाता है तो रक्तपात होगा. क्या आपको लगता है कि बहुसंख्यक हिंदू ऐसा होने देंगे? उनमें मुस्लिम समुदाय के प्रति द्वेष बढ़ेगा.’ वहीं, मुस्लिमों के ख़िलाफ़ फ़ैसला आने को लेकर रविशंकर ने कहा, ‘वे न्यायपालिका पर विश्वास करना छोड़ सकते हैं, और इसकी संभावना है कि वे कट्टरवाद का सहारा लें.’ इसके अलावा रविशंकर ने यह भी कहा था कि अगर मुस्लिम अयोध्या में किसी और ज़मीन पर मस्जिद बना लें तो इससे हर किसी की जीत होगी.

‘यह हिंदू समुदाय की आस्था का मामला है’

इतना ही नहीं, श्री श्री रविशंकर ने पिछले साल ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खुला पत्र भी लिखा था. इसमें वे ऊपर लिखी गई बातों के अलावा इस मामले को लेकर कुछ संभावित परिणामों का उल्लेख करते हुए कहते हैं, ‘...भले ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और समुदाय के अन्य नेताओं का यह कहना है कि वे इसे स्वीकार करेंगे, पर आने वाले समय में आपके समुदाय में सदियों तक यह भावना कायम रहेगी कि अदालत ने आप लोगों के साथ अन्याय किया है.’

पत्र में आगे लिखा है, ‘...यह हिंदू समुदाय की आस्था का मामला है जिसके लिए वे 500 वर्षों से लड़ाई लड़ रहे हैं. इससे पूरे देश में भारी सांप्रदायिक उथल-पुथल मच सकती है. मुकदमा जीतने पर वे (मुसलमान) गांवों से लेकर पूरे देश में करोड़ों हिंदुओं की सद्भावना तथा विश्वास को स्थायी रूप से खो देंगे.’

वहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखे जाने की स्थिति पर रविशंकर ने लिखा, ‘इस स्थिति में सुरक्षा का भारी जोख़िम देखते हुए शांति बनाए रखने के लिए 50,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की आवश्यकता होगी. यह समाधान भी मुस्लिम समुदाय के लिए फ़ायदेमंद नहीं होगा. स्थानीय मुसलमानों के अनुसार उन्हें नमाज़ पढ़ने के लिए उसी मस्जिद में जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वहां पहले से ही 22 अन्य मस्जिदें मौजूद हैं तथा केवल पांच हज़ार लोग हैं जो उनका उपयोग करते हैं.’ रविशंकर का यह खुला ख़त अभी भी उनकी संस्था की वेबसाइट पर पढ़ा जा सकता है.

‘सौ लोगों को मार कर मुसलमान को ग़ाज़ी की उपाधि मिल जाती है’

रविशंकर इस्लाम धर्म और कु़रआन के जानकारों के हवाले से कहते हैं कि मस्जिद को एक जगह से दूसरी जगह पर स्थानांतरित किया जा सकता है. उनके मुताबिक़ विवादित ज़मीन को भारत के लोगों को उपहार के रूप में प्रदान करके मुस्लिम व्यापक दृष्टिकोण, परोपकार, उदारता और सद्भावना का परिचय देंगे. लेकिन ख़ुद क़ुरआन और मुसलमानों को लेकर रविशंकर पहले क्या सोचते रहे हैं, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार संजय पुगलिया इस बारे में एक घटना का ज़िक्र करते हैं. द क्विंट में प्रकाशित अपने लेख में वे लिखते हैं कि रविशंकर का मुस्लिम-विरोधी रुख़ नया नहीं है. साल 2002 के एक वाक़ये का ज़िक्र करते हुए वे कहते हैं, ‘मैं पांच-छह पत्रकारों के साथ रविशंकर से मिलने गया था. कुछ देर तक देश के हालात पर चिंता जताने के बाद उन्होंने कहा, ‘वो (मुसलमान) बड़े ही कट्टर होते हैं. क़ुरआन में तो लिखा है, पता नहीं सौ या ऐसे ही कुछ लोगों को मार कर मुसलमान को ग़ाज़ी की उपाधि मिल जाती है.’ संजय पुगलिया के मुताबिक़ रविशंकर ने यह बात दो बार दोहराई थी. जब उन्होंने इस बारे में आध्यात्मिक गुरु को टोका तो उन्होंने बात को कहीं और मोड़ दिया.

अदालती फ़ैसले के विरोधी

पैनल में श्री श्री रविशंकर को शामिल किए जाने पर जताई जा रही आपत्तियों का एक कारण यह भी है कि वे इस मामले को अदालत के ज़रिये सुलझाए जाने के विरोधी रहे हैं. वे कहते रहे हैं कि इस मसले का हल अदालत के ज़रिये नहीं हो सकता. पत्र के अलावा वे कई साक्षात्कारों में भी यह कहते रहे हैं कि अयोध्या विवाद अदालत के बाहर ही सुलझाया जा सकता है. उनके मुताबिक़ अदालती फ़ैसले से दोनों समुदायों को नुक़सान होगा. हालांकि अब वे अदालत के ही फ़ैसले के तहत पैनल के सदस्य बनाए गए हैं.