हाल का पुलवामा हमला हो या कारगिल या फिर 26/11, ऐसी हर बड़ी आतंकी घटना के पीछे सुरक्षा एजेंसियों का छोटी-छोटी जानकारियों पर समुचित कार्रवाई न करना देखा गया है. इन घटनाओं के बाद अक्सर ही खबर आती है कि सुरक्षा एजेंसियों को इससे संबंधित खुफिया इनपुट पहले ही भेज दिया गया था. 1993 में मुंबई (तब बंबई) में हुए बम धमाके भी ऐसी ही लापरवाही का नतीजा थे.
धमाके क्यों हुए?
जानकारों के मुताबिक इसके दो कारण थे. पहला, छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी थी. इसके कारणों का पिछले लेख में ज़िक्र किया जा चुका है. जब लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अपना कारवां लेकर अयोध्या की तरफ चले तो तब से ही माहौल बिगड़ने लग गया था. साल 1992 में भी दंगे हुए थे और तकरीबन 700 लोग मारे गए थे. महाराष्ट्र सरकार ने 1992 के दंगों की जांच के लिए श्रीकृष्ण आयोग का गठन भी किया पर उसके सुझावों को लागू करने से पहले ही आयोग को भंग कर दिया. जब 1993 में बम धमाके हुए तो आयोग का पुनर्गठन हुआ और इन धमाकों को भी जांच में शामिल कर लिया गया. पर ताज्जुब है कि श्रीकृष्ण आयोग द्वारा जिन नेताओं और अफ़सरों को उन दंगों का दोषी पाया गया था उनमें से किसी एक को भी सज़ा नहीं हुई.

दूसरा, 1992 के दंगों में मुस्लिम लोगों की मौतों से मुस्लिम समाज को जान-ओ-माल का काफ़ी नुकसान हुआ. इस आहत कुछ लोगों ने इसका बदला लेने की ठानी.
पहली चूक जो भारी पड़ी
1992 के दंगों की तफ़्तीश के दौरान नौ मार्च, 1993 को मुंबई पुलिस के नवपाड़ा थाने ने बेहरामपाड़ा के छुटभैये गुल मोहम्मद नाम के आदमी को पकड़ा. पूछताछ के दौरान उसने बताया कि बाबरी मस्जिद का बदला लेने के लिए शहर में बड़े स्तर पर धमाके होने वाले हैं. उसने यह भी बताया कि वे और कुछ मुस्लिम लड़के हथियारों की ट्रेनिंग लेने के लिए दुबई और फिर पाकिस्तान भेजे गए गए थे. बताया जाता है कि पुलिस ने गुल मोहम्मद की बातों को संजीदगी से नहीं लिया.
उधर, ख़ुफ़िया एजेंसियों को जानकारी मिली थी कि तस्करी के ज़रिये मुंबई शहर में बड़ी मात्रा में हथियार लाए गए हैं. जब हमलावरों को गुल मोहम्मद के पकड़े जाने की ख़बर हुई तो उन्होंने धमाके के समय को आगे खिसका लिया. अप्रैल में होने वाले ये धमाके 12 मार्च को कर दिए गए. ये दो छोटी-छोटी जानकारियां थीं जिन्हें अगर मिला लिया जाता और और समय रहते कार्रवाई की जाती तो शायद धमाके नहीं होते
धमाके कब और कैसे हुए?
12 मार्च, 1993 को शुक्रवार था. दोपहर के एक बजकर 25 मिनट पर मुंबई स्टॉक एक्सचेंज में पहला धमाका हुआ. फिर एयर इंडिया ऑफिस, झवेरी बाज़ार और सेंटूर होटल सहित 12 जगहों पर एक के बाद एक 12 धमाके हुए. 3.40 मिनट तक पूरी मुंबई दहल चुकी थी. कुल 257 लोग मारे गए और तकरीबन 1400 घायल हुए. 27 करोड़ रुपये की संपति ख़ाक हो गई. बमों को कार, स्कूटर और ब्रीफ़केस में रखकर धमाके किये गए थे. यह पहला मौका था जब आरडीएक्स का इस्तेमाल हुआ.
पुलिस कमिश्नर और उनकी टीम
दिसंबर 1992 से लेकर 1993 के दंगों के दौरान श्रीकांत बापट मुंबई पुलिस कमिश्नर थे. सूबे के मुखिया शरद पवांर ने उन्हें हटाकर अमरजीत सिंह सामरा को कमान सौंपी. पर उन्हें अभी डेढ़ महीने ही हुए थे कि ये धमाके हो गए. पूरे पुलिस प्रशासन पर प्रश्न चिह्न लग गया. सामरा बड़े कड़क और बेख़ौफ़ अफ़सर थे. उन्होंने एसीपी ट्रैफ़िक राकेश मारिया को जांच टीम का मुखिया नियुक्त कर सबको चौंका दिया. मारिया ने कोर टीम का गठन किया. 200 पुलिस अफ़सरों और जवानों की टीम हरकत में आ गई.
हमलावरों की चूक और पहली सफलता
राकेश मारिया ने सख्त़ आदेश दिया कि जो कुछ भी संदिग्ध मिले उसकी रिपोर्टिंग की जाए. क़िस्मत से एक मारुति वैन को संदिग्ध हालात में पाया गया. यह अल हुसैनी बिल्डिंग, माहीम में रहने वाली किसी मोबिना मेमन के नाम पर रजिस्टर थी. बम निरोधक दस्ते ने जब उसे खोला तो उसमें एके 56 राइफलों का ज़खीरा मिला. तभी इसी दौरान एक लावारिस स्कूटर मिला जिसमें आरडीएक्स भरा हुआ था. क़िस्मत से वह भी फटा नहीं था.
राकेश मारिया और टीम मोबिना मेमन के पते पर पहुंची तो घर बंद था. पड़ोसियों से पता चला कि हमले से दो दिन पहले ही पूरा मेमन परिवार दुबई चला गया है. पुलिस को घर में तलाशी के दौरान एक स्कूटर की चाबी मिली. यह उसी स्कूटर की थी जो लावारिस मिला था. यह पहली सफलता थी. इसके आधार पर पहली गिरफ़्तारी हुई. यह शख्स असग़र मुकादम था जो टाइगर मेनन का मैनेजर था. इसके बाद ब्लास्ट के तार खुलते गए. असग़र मुकादम ने सब बता दिया कि मुख्य सरगना टाइगर मेमन था और उसी ने अपनी टीम तैयार की थी.
टाइगर मेमन और उसकी टीम
कड़ी पूछताछ के दौरान मुकादम ने बताया कि मुंबई के माहीम इलाके में रहने वाले मेमन परिवार के लड़के इब्राहिम मुश्ताक अब्दुल रज्ज़ाक नदीम मेमन उर्फ़ टाइगर मेमन को 92 के दंगों में खासा नुकसान हुआ. मिज़ाज से गर्म टाइगर मेमन ने स्थानीय मुस्लिम लड़कों को हिंदुओं से बदला लेने के लिए उकसाया. टाइगर और उसका गुर्गा जावेद चिकना फ़रवरी 1993 को दुबई गए थे. मुकादम ने ये भी बताया कि किस-किस लड़के ने कहां पर आरडीएक्स से भरे स्कूटर, ब्रीफ़केस और कारें रखीं. उसने उन बाकी लोगों के नाम भी बता दिए जो इन हमलों में शामिल थे. चूंकि इनमें से ज़्यादातर मुंबई छोड़ कर देश के अन्य शहरों और गांवों में जाकर छुप गए थे इसलिए उन्हें पकड़ने के लिए देश भर में टीमें भेजी गयीं. इनमें से ज़्यादातर लड़के पकड़ में आये.
इनमें एक था बादशाह खान जो बाद में सरकारी गवाह बन गया. बादशाह ख़ान ने बताया कि टाइगर मेमन और उसके भाई याकूब, ईसा, युसूफ और अन्य परिवार के लोगों ने इन बम धमाकों में अहम भूमिका निभाई. उसने यह भी कबूला कि टाइगर ने दाऊद इब्राहिम के साथ मिलकर दुबई में इन धमाकों की योजना बनाई, पैसा इकट्ठा किया और लड़कों को आतंकी ट्रेनिंग लेने के लिए पाकिस्तान भेजा जहां उन्हें आरडीएक्स के इस्तेमाल और बम बनाने की ट्रेनिंग दी गई.
सरकारी तंत्र और आरडीएक्स तस्करी
योजना के मुताबिक़ पाकिस्तान से आरडीएक्स की तस्करी कर उसे मुंबई लाया जाना था. इसके लिए टाइगर मेमन के गुर्गे दाऊद फ़नसे ने कस्टम और पुलिस के अफ़सरों और कांस्टेबलों को मोटी घूस देकर अपनी ओर मिला लिया. इस आरडीएक्स को उसने जानकारों के गोदामों में रखवा दिया. बताते हैं कि कुल 3,000 किलोग्राम आरडीएक्स तस्करी कर मुंबई लाया गया था.
टाइगर मेनन और दाऊद कनेक्शन
टाइगर एक समय दाऊद इब्राहिम के लिए हवाला का काम करता था. धीरे-धीरे वह इस माफिया सरगना का भरोसेमंद बन गया. सरकारी गवाह बने बादशाह खान ने पुलिस को बताया था कि टाइगर ने दुबई में दाऊद इब्राहिम को समझाया कि मुंबई में बम धमाके से पूरा हिंदुस्तान हिल जायेगा और दुनिया भर में हल्ला मचेगा. दाऊद ने पाकिस्तान से आरडीएक्स सप्लाई करवाया था. उसी की मदद से लड़के दुबई गए और वहां से पाकिस्तान. सो इस प्रकार पूरी योजना बनाई गई.
अंततः क्या हुआ?
मुंबई पुलिस ने याकूब मेनन और उसके परिवार के साथ दाऊद इब्राहिम और कई लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाख़िल की. इसी दौरान, टाइगर का छोटा भाई याकूब नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से पकड़ा गया. उसके मुताबिक़ इन धमाकों में टाइगर के अलावा मेमन परिवार का कोई अन्य सदस्य शामिल नहीं था. याकूब कोर्ट में अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर पाया और उसे फांसी की सज़ा हुई. मेमन परिवार के कुछ अन्य लोगों को भी उन लड़कों के साथ-साथ सज़ा हुई. टाइगर मेमन हाथ नहीं आया.
दंगों के दो दिन बाद ही मुंबई ने होश संभाल लिया. लोग दिल के किसी कोने में दर्द और डर रखकर ज़िंदगी की ओर चल पड़े. कोई भी सरकार दंगों के कुछ साल बाद मालूम करने कि ज़हमत नहीं उठाती कि प्रभावित लोगों का क्या हुआ. वे किस हाल में हैं? लावारिस या यतीम हो गए बच्चों का क्या हुआ? न ही मीडिया इस ओर पलट कर इस ओर देखता है और समाज का क्या? जुम्मन फिर जमना दास के गले लग जाता है
बशीर बद्र का शेर है - ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में’
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