जिस दिन बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आपस में सीटों की संख्या के बंटवारे का ऐलान किया, उसी दिन एक और बात भी साफ हो गई थी. वह यह कि सपा-बसपा कांग्रेस का साथ रायबरेली और अमेठी से आगे देने को तैयार नहीं. सपा-बसपा के इस गठबंधन में राष्ट्रीय लोक दल को भी शामिल किए जाने की संभावना थी. आखिर में तीन सीटें देकर उसे साथ लाया गया.

तब पत्रकारों ने इस गठबंधन में कांग्रेस को शामिल किए जाने की संभावना के बारे में अखिलेश यादव से सवाल किया था. इसके जवाब में अखिलेश यादव ने कहा कि कांग्रेस इस गठबंधन का हिस्सा है. अपनी बात को साबित करने के लिए उन्होंने कहा कि रायबरेली और अमेठी में वे उम्मीदवार नहीं दे रहे हैं.

लेकिन क्या वाकई कांग्रेस सिर्फ इतने भर से खुद को गठबंधन का हिस्सा मानने को तैयार है? समाजवादी पार्टी ने बीते शुक्रवार को लोकसभा चुनावों के लिए अपनी पहली सूची जारी कर दी. पार्टी ने छह उम्मीदवारों की घोषणा की है. लेकिन इसके एक दिन पहले उत्तर प्रदेश के लिए कांग्रेस ने अपने 11 उम्मीदवारों की घोषणा की. इस सूची में सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत प्रदेश में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शुमार किए जाने वाले सलमान खुर्शीद, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, अनु टंडन और इमरान मसूद जैसे नेताओं के नाम हैं.

सपा और कांग्रेस द्वारा अपने उम्मीदवारों की सूची जारी करने का क्या यह मतलब निकाला जाना चाहिए कि अब उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-आरएलडी गठबंधन में कांग्रेस के शामिल होने की सारी संभावनाएं खत्म हो गई हैं? इस बारे में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक प्रमुख नेता कहते हैं, ‘यह कहना सही नहीं होगा कि गठबंधन की बातचीत नहीं चल रही है. सपा-बसपा और कांग्रेस, दोनों तरफ से कोशिशें चल रही हैं. इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर जो कुछ प्रमुख विपक्षी नेता हैं, उनकी भी कोशिश यही है कि कांग्रेस के साथ एक महागठबंधन उत्तर प्रदेश में बने ताकि भाजपा को पटखनी दी जा सके. इसके लिए ये लोग सभी पक्षों से बातचीत कर रहे हैं.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘इसलिए आप देखेंगे कि चाहे सपा की सूची हो या फिर कांग्रेस की, इनमें उन्हीं सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए गए हैं जिन पर दोनों पार्टियों की दावेदारी बिल्कुल पक्की है और जिन्हें दोनों में से कोई पार्टी आम तौर पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं होगी.’

पहले जब गठबंधन की घोषणा हुई थी तो उस वक्त सपा-बसपा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को पर्याप्त सीटें देने को तैयार नहीं थे तो अब फिर क्या हो गया कि महागठबंधन बनाने की बातचीत फिर से शुरू हो गई? इसके जवाब में वे कहते हैं, ‘न तो यह बात सपा के लोग मानेंगे और न ही बसपा के लेकिन सच्चाई यही है कि प्रियंका गांधी की सक्रियता ने इन दोनों पार्टियों को कांग्रेस के साथ सम्मानजनक समझौता की दिशा में बढ़ने को विवश किया है.’

वे आगे कहते हैं, ‘प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश में लगाने से इन्हें भी यह स्पष्ट हो गया है कि अगर इन लोगों ने कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें नहीं दीं तो कांग्रेस पूरी ताकत से चुनाव लड़ेगी और इसका खामियाजा सपा-बसपा गठबंधन को भी भुगतना पड़ेगा. इन दोनों दलों के प्रमुख नेताओं को यह लग रहा है कि जिन प्रियंका गांधी को राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय करने की मांग पार्टी में लंबे समय से उठ रही थी, अगर उन्हें उत्तर प्रदेश में लाया गया है तो कांग्रेस के पास भी अपनी कोई योजना होगी.’

दरअसल, प्रियंका गांधी की सक्रियता के बाद कांग्रेस का बढ़ा हुआ उत्साह साफ दिख रहा है. कई राजनीतिक विश्लेषकों को यह लग रहा है कि कांग्रेस न सिर्फ भाजपा का वोट काटेगी बल्कि सपा-बसपा गठबंधन के पाले में जाने वाले वोट भी कांग्रेस की ओर जा सकते हैं. इस बात को साबित करने के लिए यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस द्वारा जहां अगड़ी जातियों का वोट काटने से भाजपा का नुकसान होगा तो वहीं मुस्लिम समाज के वोट उम्मीदवारों को देखते हुए कुछ सीटों पर सपा-बसपा के बजाय कांग्रेस के पाले में जा सकते हैं. यही बात कुछ पिछड़ी जातियों के बारे में भी कही जा रही है. कहा जा रहा है कि सपा-बसपा के शीर्ष नेतृत्व को भी वोटों में बंटवारे की चिंता सता रही है और यही वजह है कि कांग्रेस को इस गठबंधन में लाने की कोशिशें फिर से तेज हुई हैं.

तो क्या कांग्रेस सपा, बसपा और आरएलडी के साथ महागठबंधन में आने को तैयार है और अगर हां तो कितनी सीटों के साथ? इस बारे में कांग्रेस के एक नेता बताते हैं, ‘बातचीत यहां से शुरू हुई थी कि 2009 में कांग्रेस जिन सीटों पर जीती थी, वे सीटें उसे मिल जाएं. क्योंकि 2014 में सपा का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं था और बसपा का तो खाता ही नहीं खुल पाया था. इसलिए कांग्रेस की ओर से बार-बार कहा गया कि सीटों के बंटवारे का आधार 2009 के चुनाव परिणाम को बनाया जाए.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘लेकिन अभी की स्थिति यह है कि यह बातचीत 15 सीटों की मांग के आसपास आ गई है. अगर इतनी सीटें भी कांग्रेस को मिलती हैं तो भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस समझौता कर सकती है. इससे कम सीटों पर बात बनने की संभावना काफी कम है. 11 उम्मीदवारों की सूची जारी करके एक तरह से कांग्रेस ने भी यह संकेत दे दिया है कि इन सीटों पर तो वह चुनाव लड़ेगी ही लड़ेगी.’

अगर औपचारिक गठबंधन नहीं होता है तो क्या कोई आंतरिक तालमेल की कोई संभावना है? इसके जवाब में वे कहते हैं, ‘इन बातों की संभावना तो रहती ही है. इसके पक्ष में भी अपने तर्क हैं. कुछ लोगों को लगता है कि इससे कांग्रेस भाजपा का अधिक नुकसान कर पाएगी. क्योंकि अगड़ी जातियों के वोट कांग्रेस को बड़ी संख्या में मिल सकते हैं. लेकिन यह बाद की बात है, अभी कोशिश एक औपचारिक गठबंधन बनाने की दिशा में हो रही है.’