कुल जमा 13 फीचर फिल्में बनाने वाले महान अमेरिकी फिल्मकार स्टैनली क्यूब्रिक ने तीन महान एंटी-वॉर फिल्में भी बनाई थीं. ‘पाथ्स ऑफ ग्लोरी’ (1957), ‘डॉ. स्ट्रेंजलव’ (1964) और ‘फुल मैटल जैकेट’ (1987).

अक्सर सिनेमा के कई दर्शक वॉर-फिल्मों और युद्ध की आलोचना करने वाली इन एंटी-वॉर फिल्मों के बीच फर्क करने में गलती कर जाते हैं. कई दर्शकों को लगता है कि युद्ध से जुड़े प्रभावशाली दृश्यों के होने से, कुछ हीरोइक से पात्रों द्वारा पारंपरिक रूप से खलनायक माने जाने वाले देश पर हमला करने से, और नायकों के अपने देश के प्रति असीम प्रेम दर्शाने के चलते युद्ध पर बनी हर फिल्म युद्ध और योद्धाओं का यशोगान ही करती है.

वियतनाम युद्ध पर बनी क्यूब्रिक की ‘फुल मेटल जैकेट’ का ही उदाहरण ले लीजिए. युद्ध का समर्थन करने वाले कई दर्शक इस फिल्म को कमाल वॉर-फिल्म मानते हैं क्योंकि क्यूब्रिक की कुशलता बेहद प्रभावशाली युद्ध-दृश्य गढ़ती है और सैनिकों के ‘किलर मशीन’ में तब्दील हो जाने को विस्तार से दिखाती है.

लेकिन असल में ‘फुल मैटल जैकेट’ युद्ध की विभीषिका, युवा सैनिकों पर उसके दुष्प्रभाव और सनकी इंसानों की फितरत को सामने लाने वाली एक एंटी-वॉर क्लासिक है. जिस तरह ‘पाथ्स ऑफ ग्लोरी’ ने प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि वाली एक कथा कहकर युद्ध की आलोचना की थी, उसी तरह ‘फुल मैटल जैकेट’ वियतनाम युद्ध की आलोचना करती है. अगर आप सतर्क होकर देखते चलते हैं तो यह प्रतीकवाद और मारक संवादों से इस बात का अहसास खुद ही करवाते भी चलती है.

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क्यूब्रिक की तीसरी एंटी-वॉर फिल्म हमारे मौजूदा समय के लिए भी बेहद मौजूं है. इसके पूरे नाम में ही हमारे वक्त की उस विभीषिका का संपूर्ण सार मौजूद है जो हिंदुस्तान-पाकिस्तान को अभी भी घेरे हुए है - ‘डॉ. स्ट्रेंजलव, ऑर : हाउ आई लर्न्ड टू स्टॉप वरीइंग एंड लव द बॉम्ब’. यह फिल्म शीत युद्ध की पृष्ठभूमि पर बना ऐसा मारक सटायर है जो न्यूक्लियर हमलों की विभीषिका को ब्लैक ह्यूमर की टेक लेकर बयां करता है. आप इस फिल्म को देखते वक्त अनेक बार हंसते हैं और हर बार इस एहसास से शर्मिंदा होते हैं कि कितनी भयावह सच्चाई पर हंस रहे हैं. लेकिन यही ब्लैक कॉमेडी का मकसद होता है कि वो शहद में छिपाकर तीखी कालीमिर्च खिला देती है.

क्यूब्रिक ने इस फिल्म को कोल्ड वॉर के चरम पर बनाया था (1964) और क्यूबा मिसाइल संकट (1962) भी बस कुछ वक्त पहले ही घटा था. कई सारे देश युद्ध के उन्माद में डूबे हुए थे और शांति की, समझदारी की बातें करना आज की तरह ही एंटी-नेशनल नैरेटिव का हिस्सा था. ऐसे वक्त में 35-36 वर्षीय क्यूब्रिक ने मारक ब्लैक ह्यूमर से लैस ब्लैक एंड व्हाइट ‘डॉ. स्ट्रेंजलव’ बनाई और परमाणु बमों से लैस रूस तथा अमेरिका जैसे दुश्मन देशों के बीच एक काल्पनिक न्यूक्लियर युद्ध की दिल दहला देने वाली कहानी कही. (रिलीज के वक्त उनपर उंगलियां भी उठीं और इस अमेरिकी फिल्म को ‘सोवियत प्रोपेगेंडा’ तक कहा गया. आज ये फिल्म मास्टरपीस कहलाती है, सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की कई मुख्तलिफ सूचियों में शामिल मिलती है और कई सालों से रौटन टोमेटोज पर 99 प्रतिशत की अतिप्रतिष्ठित रेटिंग हासिल किए हुए है.)

कहने को ‘डॉ. स्ट्रेंजलव’ उपन्यासकार पीटर जॉर्ज के थ्रिलर नॉवल ‘रेड अलर्ट’ (1958) पर आधारित थी. लेकिन क्यूब्रिक ने सोवियत संघ और अमेरिका के बीच परमाणु हमले की अतिगंभीर कहानी को गंभीर थ्रिलर अंदाज में न कहकर ब्लैक एबसर्डिस्ट कॉमेडी की तरह कहा. इसके लिए उन्होंने एक व्यंग्यकार-पत्रकार की सेवाएं लीं और टैरी सदर्न (Terry Southern) नामक इस शख्स ने स्क्रिप्ट के आखिरी ड्राफ्ट को मूल कहानी से बेहद मुख्तलिफ बनाने में उनकी मदद की.

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‘डॉ. स्ट्रेंजलव’ में जैक रिपर नाम का एक सनकी अमेरिकी कमांडर सोवियत संघ पर परमाणु हमला कर देता है. शीत युद्ध का यह वो दौर था जब परमाणु हथियारों से लैस सोवियत संघ और मित्र देश एक-दूसरे से खौफजदा थे कि कहीं सामने वाला उनपर परमाणु हमला न कर दे, और इसलिए अपने-अपने आकाशों में वे परमाणु हथियारों से लैस हवाईजहाज तैनात रखते थे. ऐसे ही बी-52 नाम के कई अमेरिकी लड़ाकू जहाज कम्युनिस्ट रूस से नफरत करने वाले अमेरिकी कमांडर की निगरानी में थे – जिसका नाम बदनाम सीरियल किलर ‘जैक द रिपर’ से लिया गया है!- और वो इन्हें एक दिन नियमों में लूपहोल निकालकर कुछ घंटों के अंदर रूस को तबाह करने के लिए रवाना कर देता है.

बदले में रूस बताता है कि उसके पास भी ऐसी ‘डूम्सडे डिवाइस’ है जो परमाणु हमला होते ही अपने आप एक्टिव हो जाएगी और फिर कोई इंसान उसे डीएक्टिवेट नहीं कर पाएगा. यह डूम्सडे डिवाइस दुनिया के सबसे खतरनाक परमाणु बमों से बनी है और इसके एक्टिवेट हो जाने के बाद यह धरती नहीं बचेगी. ‘डॉ. स्ट्रेंजलव’ में फिर वॉर-रूम में बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति लाख कोशिशें करते हैं कि यह संकट टल जाए, रूसी राष्ट्रपति से भी फोन पर बात करते हैं जिससे गजब का ह्यूमर निकलता है, लेकिन कुछ सनकी लोगों की वजह से यह दुनिया नष्ट होने की कगार पर पहुंच ही जाती है. परमाणु बम किसी एक देश को नहीं, पूरी मानव सभ्यता को खत्म कर देते हैं.

ऐसी खौफनाक कहानी को गंभीर अंदाज की थ्रिलर न बनाकर ब्लैक ह्यूमर की टेक लेकर कहना काई पर चलने जैसा है. क्यूब्रिक की विलक्षण प्रतिभा का ही दम था कि ऐसे संवेदनशील विषय पर उन्होंने इस एप्रोच का इस्तेमाल किया और फिसले नहीं.

आज जिस तरह हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच उपजे तनाव पर कुछ भी कहने पर बवाल खड़ा हो जा रहा है, वैसे ही उस वक्त भी दुनिया शीत युद्ध के चलते बेहद डरी हुई थी. न्यूक्लियर हमले की आशंकाओं के बीच दबे अमेरिकी नागरिकों के लिए इस तरह का सीधा-मारक पॉलिटिकल सटायर ‘हंसते-हंसते’ देख पाना आसान नहीं था जिसमें अमेरिका अपने परमाणु हमलों से रूस को खत्म कर दे और बदले में रूस उनके अमेरिका समेत पूरी दुनिया को. लेकिन फिल्म ने ब्लैक ह्यूमर के बहाने सीधी-सपाट एंटी-वॉर बातें कहीं थीं जो उस कल की तरह आज भी बेहद मौजूं है. कहा जाता है कि ऐसे ही न्यूक्लियर हमले का डर निर्देशक स्टैनली क्यूब्रिक को भी हमेशा सताता रहता था और उसी ने उन्हें परमाणु युद्ध पर सैकड़ों किताबें पढ़ने और फिर यह एंटी-वॉर फिल्म बनाने के लिए तैयार किया.

‘डॉ. स्ट्रेंजलव’ में युद्ध के प्रति सत्ता, सेना और वैज्ञानिकों के प्रेम को दर्शाने के लिए तीन सनकी पात्रों का मारक उपयोग किया गया. अमेरिकी राष्ट्रपति को अमनपसंद दिखाया गया, लेकिन उनके एक एयरफोर्स कमांडर, एयरफोर्स के ही चीफ ऑफ स्टाफ, और परमाणु युद्ध विशेषज्ञ तथा भूतपूर्व नाजी वैज्ञानिक डॉ स्ट्रेंजलव के बहाने जैसे क्यूब्रिक ने हमें हर देश में मौजूद उन लोगों से मिलवाया जो हर हाल में युद्ध चाहते हैं.

जहां एक तरफ सिगार-प्रेमी एयरफोर्स कमांडर जैक रिपर (स्टर्लिंग हेडन) न सिर्फ अपनी सनक के चलते रूस पर परमाणु हमला कर देता है वहीं अमनपसंद राष्ट्रपति के साथ वॉर-रूम में युद्ध रोकने के प्रयासों में लगा च्युंगम-प्रेमी चीफ ऑफ स्टाफ जनरल बक टर्गिडसन (जॉर्ज सी स्कॉट) बार-बार कम्युनिस्टों को सबक सिखाने की बात कहता हुआ वापस से युद्धोन्मादी व्यवहार करता है. सबसे आखिर में व्हीलचेयर का उपयोग करने वाला भूतपूर्व नाजी और अब अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. स्ट्रेंजलव (पीटर सैलर्स) आता है, जो मौका मिलते ही परमाणु बमों के बारे में इतनी मोहब्बत से बात करता है कि जैसे कोई ऐश्वर्या राय, मधुबाला और जूलिया रॉबर्ट्स के लिए भी नहीं कर पाएगा. कोई महिला दिलीप कुमार, शाहरुख खान और रणवीर-रणबीर के लिए भी नहीं कर पाएगी.

इन तीनों ही सनकी पात्रों के रोल में स्टर्लिंग हेडन, जॉर्ज सी स्कॉट और पीटर सेलर्स ने गजब का काम किया है. खासकर वॉर-रूम में अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ मौजूद जॉर्ज सी स्कॉट और पीटर सेलर्स नाम के अभिनेताओं ने तो रोंगटे खड़े कर दिए हैं. खास बात है कि अगर आज के तनावपूर्ण दौर में आप यह फिल्म देखेंगे तो इन तीनों चरित्रों को देखकर प्रार्थना ही करने पर मजबूर हो जाएंगे. कि हे ईश्वर, ऐसे सनकी और युद्धोन्मादी लोग आज हमारे देश और पड़ोसी मुल्क की सरकारों में मौजूद न हों, जो अपने व्यक्तिगत एजेंडा की खातिर दो देशों को युद्ध में झोंक दें.

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क्यूब्रिक प्रतीकवाद के भी विलक्षण फिल्मकार माने जाते हैं. उनका सिनेमा सिम्बोलिज्म से भरा मिलता है. ‘डॉ. स्ट्रेंजलव’ में भी कहीं तो आपको परमाणु युद्ध शुरू करने वाले सनकी कमांडर के दफ्तर के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा दिखेगा –‘शांति ही हमारा व्यवसाय है’– तो कहीं उस दौर में बाजारवाद का चेहरा मानी जाने वाली कोका-कोला कंपनी की मशीन पर गोली दागना देश को युद्ध से बचाने से ज्यादा मुश्किल काम दिखाया जाएगा. कहीं कोई युद्ध-प्रेमी पायलट हमला करने की खबर आते ही अपना हैलमेट उतारकर कॉउबॉय हैट पहनकर मर्दाना जोश दिखाता मिलेगा तो कई दृश्यों में अमेरिकियों और रूसियों की एक-दूसरे से दुश्मनी आज के हिंदुस्तानियों-पाकिस्तानियों के बीच के अविश्वास का अक्स मालूम होगी.

क्यूब्रिक सेक्सुअल थीम्स को भी फिल्मों में सटल तरीके से एक्सप्लोर करने के लिए जाने जाते थे, और ‘डॉ स्ट्रेंजलव’ में भी कई दृश्यों में आप ऐसे सेक्सुअल रेफरेंस देख सकते हैं. क्यूब्रिक ने अलहदा अंदाज में युद्ध चाहने की लस्ट को कई सेक्सुअल मेटाफर से जोड़ा था.

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‘डॉ. स्ट्रेंजलव’ ने न्यूक्लियर हथियारों से लैस अमेरिका और रूस दोनों ही देशों को नहीं बख्शा. कहानी का घटनास्थल मित्र देशों की जमीन जरूर रहता है और रूस का प्रतिनिधित्व करने वाले पात्र अमेरिकी पात्रों की तुलना में कम भी मौजूद मिलते हैं. लेकिन क्यूब्रिक दोनों तरफ की सनक को, युद्ध के प्रति आसक्ति को, एक-दूसरे पर अविश्वास रखने की आदत को मकबूलियत से पोट्रे करते हैं. कई अमेरिकी किरदार अपने परमाणु हथियारों का स्तुतिगान करते हैं तो रूसी एंबेसेडर और डॉ. स्ट्रेंजलव रशियन न्यूक्लियर डिवाइस (डूम्सडे) को अमेरिकी परमाणु हथियारों से बेहतर बताते हैं. एक दृश्य में अमेरिकी राष्ट्रपति रशियन एंबेसेडर से पूछता भी है कि डूम्सडे जैसा खतरनाक न्यूक्लियर बम क्यों बनाया जिसे कोई इंसान तक कंट्रोल नहीं कर सकता. एंबेसेडर कहता है कि ऐसा विध्वंसक हथियार बनाना सस्ता है बनिस्बत कि शांति की लगातार कोशिशों में अथाह पैसा बहाने के!

फिल्म शीत युद्ध के दौरान रूस और अमेरिका के बीच मची खुद को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की होड़ पर भी सटीक व्यंग्य करती है. क्यूब्रिक का यह सटायर शिखर को छूता है जब क्लाइमेक्स के दौरान डॉ स्ट्रेंजलव और जनरल बक खत्म होने जा रही दुनिया में चंद लोगों को बचाए रखने का उपाय बताते हुए रूसियों को पीछे छोड़ने की बात भी करते हैं. यानी दुश्मनी इस कदर सर चढ़कर बोलती है कि मानव सभ्यता के सर्वनाश के वक्त भी खुद के बेहतर होने का दंभ ही इन सनकी लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ विचार बना रहता है.

आप यह मत सोचिए कि आज के दौर में यह तनाव और आपसी अविश्वास केवल हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच पनप रहे हैं. यह रिपोर्ट पढ़िए जिसने कुछ दिन पहले ही अमेरिका में मौजूद रूसी एंबेसेडर के हवाले से कहा है कि रूस और अमेरिका में फिर से शीत युद्ध वाले नाजुक हालात पैदा हो सकते हैं. कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई में अमेरिका विध्वंसक न्यूक्लियर वॉर जीतने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है.

बहरहाल, ‘डॉ. स्ट्रेंजलव’ का अंत पहले कुछ और निर्धारित था. फिल्म के एबसर्डिस्ट ब्लैक ह्यूमर की सतत धारा को ही फिल्म के क्लाइमेक्स में भी प्रवाहित करने का इरादा था. वॉर-रूम में इकट्ठा सभी लोग – राष्ट्रपति, चीफ ऑफ स्टाफ, डॉ स्ट्रेंजलव, रशियन एंबेसेडर वगैरह – परमाणु हमला हो जाने के बाद हताश होकर एक-दूसरे को कस्टर्ड-पाई मारने वाले थे और फिल्म पागलपन व सनक का शिखर छूकर खत्म होनी थी.

लेकिन फिर कई वजहों के चलते क्यूब्रिक ने स्लैपस्टिक कॉमेडी के मिजाज वाला यह अंत छोड़कर उस मारक यथार्थवादी क्लाइमेक्स को चुना जो ज्यादा खौफनाक था और न्यूक्लियर हमलों से खत्म होने की कगार पर खड़ी दुनिया के अंधेरे भविष्य की सीधी व्याख्या करता था. ‘नाजी हाथ’ वाला डॉ. स्ट्रेंजलव इस क्लाइमेक्स में जिंदा रहने के भयावह उपायों की बात करता है और जिस भी देश के जो भी नागरिक दशकों का रक्तरंजित विश्व-इतिहास भूलकर आज भी युद्ध में आनंद ढूंढ़ रहे हैं (ये भी एक तरह का सेडिज्म होता है), उन्हें यह अंत बार-बार देखना चाहिए.

क्योंकि पार्श्व में बजते द्वितीय विश्व युद्ध के चर्चित गीत ‘वी विल मीट अगेन’ (हम फिर मिलेंगे) के आगे जब आप परमाणु बम के धमाकों के एक के बाद एक आते विजुअल्स देखेंगे तो समझेंगे कि ये फिल्म आज के संवेदनशील समय के लिए भी कितनी जरूरी फिल्म है. हमारी भगवद गीता अगर अन्याय के खिलाफ युद्ध करने के लिए प्रेरित करती है तो ‘डॉ. स्ट्रेंजलव, ऑर : हाउ टू स्टॉप वरीइंग एंड लव द बॉम्ब’ नामक यह फिल्म युद्ध नहीं करने की जायज वजहों को बोल्ड में रेखांकित करती है. बमों से घिरे मौजूदा समय में इसका भी पाठ हर नाके-चौराहे पर होना चाहिए.

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