इसी उपन्यास का एक अंश :

‘महाराज! विस्मृति का हेतु अज्ञात थोड़े ही है. एक प्रस्तर जटित मुद्रिका ने मेरे अस्तित्व को छिन्न-भिन्न कर दिया. कदाचित अंगूठी मेरे पास होती तो मैं विस्मृति और तिरस्कार के गर्त में नहीं गिरती. आश्चर्य तो यह है महाराज कि पत्थर की निष्प्राण अंगूठी आपको याद रही और हृदय हार जाने वाली शकुन्तला विस्मृत हो गयी! मेरे पिता ने मुझसे ठीक ही कहा था - ‘राजकुल के ताने-बाने बड़े जटिल हुआ करते हैं.’ इसमें आपका कोई दोष नहीं महाराज! राजकुल का स्वभाव ही ऐसा होता है. बहुत दूरी है महाराज! राजकुल और ऋषिकुल में. इन दोनों के मध्य मार्ग में ऐश्वर्य, अहंकार, प्रभुत्व और न जाने कौन-कौन से घनघोर वन खड़े हैं!’


उपन्यास : कण्व की बेटी

लेखक : शैलेश कुमार मिश्र

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

कीमत : 325 रुपए


ऐतिहासिक या मिथकीय पात्रों को नए संदर्भों में, नए मूल्यों और विचारों के साथ गढ़ना एक मजेदार रचनात्मक प्रयास है. यूं तो किसी भी पात्र के वैचारिक बदलाव के पीछे निश्चित तौर पर उसके परिवेश, शिक्षा, समय या फिर उसके आस-पास के लोगों की सबसे अहम भूमिका होती है. लेकिन कभी-कभी यह सिर्फ लेखकीय इच्छा पर भी निर्भर करता है कि किसी पौराणिक पात्र को आधुनिक रंग में रंग दिया जाए. हालांकि सदियों पुराने परिवेश में नए मूल्यों को फिट करने में एक बड़ी चुनौती भी है. शैलेश कुमार मिश्र अपने उपन्यास ‘कण्व की बेटी’ में इस चुनौती को स्वीकारते हैं और एक स्वाभिमानी शकुन्तला का चरित्र गढ़ते हैं. शकुन्तला का ‘थोड़ा सा’ आत्मसम्मान जगना अच्छा लगता है. लेकिन इससे इतर यह उपन्यास किसी भी स्तर पर खुद को वर्तमान संदर्भ से जोड़ पाने में विफल होता है.

एक तो इस उपन्यास का कथानक ही इतना जाना-पहचाना है कि बिना किसी नए एंगल के उसे पढ़ने की इच्छा ही नहीं जगती. फिर रही-सही कसर उपन्यास की भाषा पूरी कर देती है. भाषा इतनी मुश्किल और संस्कृतनिष्ठ है कि आम पाठक इससे बचना ही चाहेंगे. आम तौर पर ऐसी भाषा की किताबें सिर्फ तभी पढ़ी जाती हैं जब वे पाठ्यक्रम का हिस्सा हों और उन्हें पढ़ना छात्रों की बाध्यता हो! ऐसी ही भाषा के कुछ उदाहरण -

‘आश्रम में रहने वाले ब्रम्हचारी वटुक अपने अध्ययन और यागविधियों में तल्लीन रहते. मालिनी तीर से स्नान कर लौटते वल्कलधारी वटुकों को गीले काषाय वस्त्रों से टपकती जल की बूंदें नदी से आश्रम तक एक रेखासूत्र-सा रच देतीं.’

इस पूरे उपन्यास में एक बात अच्छी लगती है, वह है शकुन्तला का आंशिक रूप से स्वाभिमानी होना. शकुन्तला को न पहचानने और उससे अपना कोई संबंध न होने की बात कहने के पांच सालों बाद, जब दुष्यंत को अंगूठी के माध्यम से शकुन्तला याद आती है तो वह उसे ससम्मान अपने महल में लाना चाहता है. लेकिन शकुन्तला स्वयं दुष्यंत के साथ में चलने से मना कर देती है. उसी मौके का वर्णन –

‘मरीच ने शकुन्तला को बतलाया कि पुनः उस नामांकित राजमुद्रिका के मिल जाने से दुष्यन्त को शकुन्तला से अपने विवाह की बात याद हो आयी है...वह विचारों में खो गयी - ‘क्या अंगूठी से ही शकुन्तला की पहचान होगी? अंगूठी के बिना तो मैं शकुन्तला न रह सकी. क्या प्रेम को अभिज्ञान की आवश्यकता है? प्रमाण की आवश्यकता है? नहीं नहीं. जिस क्षण प्रमाण की आवश्यकता हो आयी, प्रेम तो उसी क्षण विदा हो गया...’

उपन्यास में लेखक शकुन्तला को स्वाभिमानी बनाने की कोशिश तो करता है, लेकिन वह कोशिश बहुत ही अधूरी और हल्की लगती है. इसका कारण है कि जब दुष्यंत शकुन्तला को लेने आता है तो वह अपने बेटे को बिना दुष्यंत के कहे ही उसका उत्तराधिकारी कहकर उसे सौंप देती है. अपने मातृत्व के लिए खड़े होना तो दूर, वह बेटे पर पहला हक भी अपना नहीं समझती! शकुन्तला अपने बेटे पर उस व्यक्ति का ज्यादा हक समझती है जिसने उसे गर्भावस्था में ही दुत्कार दिया था. यह बड़ा ही अजीब लगता है कि वह सिर्फ अपने सम्मान की खातिर तो दुष्यंत के साथ नहीं जाती, लेकिन उसके आते ही बिना कुछ भी कहे उसे अपना बेटा सौंप देती है. शकुन्तला कहती है –

‘महाराज! अब यह मुद्रिका आपकी अंगुली में ही रहे तो अच्छा है. मेरी अनामिका अनामिका ही रहे. इसे कोई नाम न दें. मुझे किसी अभिज्ञान की आवश्यकता नहीं. प्रेम अभिज्ञान नहीं ढूंढ़ता राजन! प्रेम प्रमाण नहीं मांगता और अपनाने की बात आप क्यों करते हैं? अपनाता तो वह है जो त्याग देता है. आज मैं आपको अपना सर्वस्व सौंपती हूं. आपका यह पुत्र सर्वदमन. पुरुवंश का प्रदीप अब आपके संरक्षण में.’

यह अपने आप में काफी अजीब है कि भरी सभा में अपमानपूर्वक निकाले जाने के बाद भी शकुन्तला यही कहती और मानती है कि दुष्यंत ने उसे नहीं छोड़ा! अपमानित करके वापस भेजे जाने के बाद भी उसके मन में दुष्यंत के लिए वही सम्मान और अपनापन है. यह और भी आश्चर्यजनक है कि शकुन्तला अपने बेटे पर पहला हक खुद से ज्यादा दुष्यंत का मानती है! ये सभी बातें शकुन्तला के चरित्र को उस स्तर का स्वाभिमानी नहीं बनाती, जैसा कि लेखक दिखाने की कोशिश करता है.

हमारे समाज में पुरुषवादी सत्ता स्त्री के मौन समर्पण और प्रेम को अपना सहज अधिकार समझती आयी है. यह सत्ता मानती है कि स्त्री को शोषण का प्रतिरोध करने का अधिकार इसलिए नहीं है क्योंकि उसे प्रकृति ने पुरुष के आश्रय के लिए ही गढ़ा है. लगभग पूरा भारतीय वाड़्मय स्त्री के प्रति न्याय के प्रश्न पर एक डरावने मौन से भरा हुआ है. ऐसे में शकुन्तला का अपने स्वाभिमान के लिए खड़ा होना सुखद तो लगता है. लेकिन वह उस स्तर की स्वाभिमानी नहीं बनती जो हो सकती थी या जो उसे बनना चाहिए था.

‘कण्व की बेटी’ उपन्यास की भाषा ही इसे पढ़े जाने की इच्छा को तोड़ने के लिए काफी है. दुष्यंत और शकुतला के किस्से को यदि पूरी तरह नए संदर्भ, नए परिवेश, नई सोच और नई भाषा में गढ़ा जाता तो निश्चित तौर पर यह एक आकर्षण पैदा कर सकता था. लेकिन सिवाय शकुन्तला के स्वाभिमानी चरित्र के यहां कुछ भी आकर्षक नहीं है. लेखक शायद भूल गया है कि अब वह समय नहीं है जब पाठकों के पास पठनीय सामग्री का अभाव हो. अब पाठक कुछ भी पढ़ जाने की भूख में नहीं जीते!