चीन के लिए कहा जाता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कमोबेश उसके लिए फायदे की स्थिति ही होती है. लेकिन, पिछले दिनों पुलवामा हमले और उसकी प्रतिक्रिया में भारतीय वायु सेना की कार्रवाई पर चीन का जो रुख देखने को मिला, वह कइयों को चौंकाने वाला है. चीन इस घटनाक्रम के बाद से ही भारत और पाकिस्तान से तनाव कम करने की अपील करता आ रहा है. साथ ही वह इस पूरे मामले पर तटस्थ बने रहने की कोशिश में भी है. उसने अभी तक कोई भी ऐसा बयान नहीं दिया जिससे यह लगा हो कि वह पूरी तरह से पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा है.

चीन भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव को लेकर इस कदर चिंतित है कि उसने बीते पांच मार्च को विशेष तौर पर अपने विदेश उप मंत्री को पाकिस्तान के दौरे पर भेजा. चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक इस यात्रा का एक मात्र मकसद भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव को कम करना है. चीनी विदेश मंत्री वांग ई ने बीते शुक्रवार को साफ तौर पर यह तक कह दिया कि चीन अपने दोनों पड़ोसियों के बीच उपजे हालिया तनाव को खत्म करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार है. इस दौरान वांग ई ने यह भी बताया कि पिछले दिनों इन दोनों देशों के बीच तनाव कम करवाने में चीन की बड़ी भूमिका रही थी.

लंदन की एसओएएस यूनिवर्सिटी में चाइना इंस्टीट्यूट के निदेशक स्टीव त्सांग एक अमेरिकी न्यूज़ चैनल से बातचीत में कहते हैं, ‘भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा से चले आ रहे तनाव का फायदा चीन को मिलता रहा है, क्योंकि इसकी वजह से चीन पाकिस्तान को याद दिलाता रहा कि वह उसकी सबसे बड़ी जरूरत है.’ स्टीव के मुताबिक लेकिन पिछले दिनों भारत-पाकिस्तान के बीच जो हुआ उसने चीन को काफी परेशान किया. स्टीव त्सांग सहित दुनिया के कई जानकार चीन के परेशान होने के पीछे कई वजहें भी बताते हैं.

चीन के लिए पाकिस्तान के साथ-साथ अब भारत भी महत्वपूर्ण

चीन और पाकिस्तान मामलों के जानकार कहते हैं कि चीन पाकिस्तान को अपना ‘सदाबहार मित्र’ कहता है. उसके दक्षिण एशिया में सबसे घनिष्ठ आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य संबंध पाकिस्तान से ही हैं. पाकिस्तान बीजिंग के हथियारों के सबसे बड़े खरीदारों में से भी एक है. अमेरिकी थिंक टैंक सीएसआईएस के अनुसार 2008 से लेकर 2017 तक इस्लामाबाद ने छह अरब डॉलर से अधिक के चीनी हथियार खरीदे हैं. इसके अलावा पिछले चार सालों में चीन ने पाकिस्तान में बड़ा निवेश किया है. इसमें 50 अरब डॉलर से बनाया जा रहा चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) भी शामिल है. जाहिर है कि ऐसे में चीन ऐसा कोई फैसला नहीं ले सकता जो पाकिस्तान के खिलाफ हो या उसके ऊपर जमा पाकिस्तान का भरोसा कम कर दे.

ब्रूकिंग्स इंडिया में विदेश मामलों के जानकार अनंत कृष्णन अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं कि चीन के लिए पाकिस्तान तो महत्वपूर्ण है ही, लेकिन बीते एक साल में अंतरराष्ट्रीय स्तर बहुत कुछ ऐसा हुआ है जिससे भारत भी उसके लिए बहुत अहम हो गया है. इसका सबसे बड़ा कारण डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी विदेश और व्यापार नीति में आया बदलाव है. बीते साल डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीनी सामानों पर आयात शुल्क लगाने के बाद से चीन की अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है. यूरोप के बाद चीन के लिए अमेरिका उसके उत्पादों का सबसे बड़ा आयातक देश है. यही वजह है ट्रंप के फैसले के चलते चीन की आर्थिक विकास दर साल 2018 में केवल 6.6 फीसदी ही रही, जो 28 वर्षों का सबसे निचला स्तर है.

जानकारों की मानें तो चीन ऐसे विकल्पों की तलाश में है जहां से वह अमेरिका से होने वाले नुकसान की भरपाई कर सके. इस मामले में भारतीय बाजार से उसे सबसे ज्यादा उम्मीद है.

प्रोफ़ेसर स्टीव त्सांग के मुताबिक तो चीन ने भारत को लेकर अपनी जरूरत को समझते हुए ही डोकलाम विवाद के बाद बीते साल अप्रैल में अचानक अपना रुख बदला. उसने विवादों पर मिट्टी डालते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भव्य स्वागत किया. इसके बाद से ही भारत और चीन के बीच व्यापार लगातार बढ़ा है. पिछले छह महीने में दोनों के बीच व्यापार में 30 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है. जानकार कहते हैं कि ऐसी स्थिति में चीन कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता जिससे भारत नाराज हो जाए. वह अच्छे से जानता है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव ज्यादा बढ़ा तो उसे एक तरफ जाना ही पड़ेगा और इस स्थिति में किसी एक की नाराजगी उठानी पड़ेगी.

शिनजियांग कनेक्शन

कुछ जानकार चीन की दुविधा को लेकर एक और बात भी बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि भारत द्वारा पाकिस्तान के बालाकोट में की गई कार्रवाई का विरोध चीन एक और वजह से भी नहीं कर सकता. इनके मुताबिक भारत ने बालाकोट में जब हवाई कार्रवाई की तो उसका कहना था कि उसकी यह कार्रवाई न तो पाकिस्तान की सेना के खिलाफ है और न ही वहां के नागरिकों के खिलाफ, बल्कि यह कार्रवाई केवल आतंकियों के खिलाफ है.

जानकारों की मानें तो भारत की इस कार्रवाई का विरोध चीन इसलिए भी नहीं कर सकता क्योंकि उसने खुद अपने शिनजियांग प्रान्त में लाखों वीगर मुस्लिमों को सामूहिक बंदी बना रखा है, जिसका पूरी दुनिया में विरोध हो रहा है. लेकिन चीन का कहना है कि उसकी यह कार्रवाई केवल आतंकवाद पर रोक लगाने के लिए है. इस मामले में गौर करने वाली बात यह भी है कि चीन की इस कार्रवाई का भारत ने विरोध नहीं किया. ऐसे में चीन भी आतंकियों के खिलाफ की गई भारतीय कार्रवाई का विरोध नहीं कर सकता. चीन ये भी जानता है कि भारत की कार्रवाई का पश्चिमी देशों ने कोई विरोध नहीं किया और ऐसे में अगर वह इस पर सवाल उठाता तो भारत के विरोधी के रूप में दुनिया की नजर में आसानी से आ जाता.

यही वजह थी कि जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने चीन के विदेश मंत्री वांग ई को फोन कर इस मामले पर बात की, तब चीनी विदेश मंत्री ने भारत का नाम लिए बिना केवल यही कहा कि हर देश को दूसरे की संप्रभुता का ध्यान रखना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए.