दिल्ली और लखनऊ की सरकार एक सीट पर सबसे ज्यादा जोर लगा रही है. यह सीट है उत्तर प्रदेश की अमेठी. कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां पहुंचे थे. उनके साथ सूबे के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी थे. ऐसा लग रहा था मानो पूरा योगी मंत्रिमंडल उस दिन अमेठी में डेरा जमाए बैठा है. आयोजन की तैयारी भी बड़े स्तर पर की गई थी. क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय अखबारों में अमेठी के नाम पर पूरे पन्ने के इश्तेहार छपवाए गए थे.

दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में बैठे नेताओं से जब पत्रकारों की चर्चा होती है तो वे एक बात कहते सुनाई देते हैं - इस बार राहुल गांधी को अमेठी में ही घेर लेना है. स्मृति ईरानी का अमेठी से चुनाव लड़ना तय है और पूरी पार्टी कम से कम अमेठी के मामले में स्मृति ईरानी के साथ है.

लेकिन कांग्रेस मुख्यालय में अमेठी सीट की चर्चा बिल्कुल नहीं चल रही. वहां अमेठी से सटी सुल्तानपुर सीट के बारे में ज्यादा बातें हो रही हैं. उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बताते हैं कि हाल में पार्टी की तरफ से एक प्रतिनिधिमंडल प्रियंका गांधी से मिला था. इन नेताओं ने उनसे आग्रह किया कि वे सुल्तानपुर से मैदान में उतरें. प्रियंका गांधी ने तब यह फैसला राहुल गांधी और मां सोनिया पर छोड़ दिया था. लेकिन उनके करीबी कुछ नेता बताते हैं कि अब वे चुनाव लड़ने का मूड बना रहीं हैं.

अमेठी से राहुल गांधी चुनाव लड़ेंगे. रायबरेली से सोनिया गांधी का चुनाव लड़ना भी तय हो गया है. तो क्या सुल्तानपुर की सीट पर प्रियंका गांधी को उम्मीदवार बनाया जा सकता है? अभी इस सीट से प्रियंका के चचेरे भाई और भाजपा नेता वरुण गांधी सांसद हैं.

सुल्तानपुर को लेकर जैसे ही प्रियंका का नाम सामने आया तो सीधा सवाल उठा कि वरुण गांधी का क्या होगा. क्या यहां लड़ाई भाई-बहन के बीच होगी? इस सवाल पर भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘अगर प्रियंका गांधी मैदान में आती हैं तो उनके खिलाफ वरुण गांधी से अच्छा उम्मीदवार कोई हो नहीं सकता.’

लेकिन कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि वरुण गांधी और प्रियंका गांधी के बीच सीधी बातचीत चल रही है. गांधी परिवार के साथ बरसों से संबंध रखने वाले एक कांग्रेसी नेता की मानें तो अलग-अलग पार्टियों से ताल्लुक रखने के बावजूद इन दोनों के बीच कभी भी संबंध खराब नहीं हुए. प्रियंका ने हमेशा वरुण को अपना छोटा भाई माना और वरुण ने भी प्रियंका को बड़ी बहन जैसा आदर दिया है. इसलिए माना जा रहा है कि अगर प्रियंका सीधी बात कहें तो वरुण मना नहीं कर पाएंगे.

लेकिन दिक्कत सोनिया गांधी और मेनका गांधी के बीच मतभेद और बिगड़े संबंध को लेकर है. कांग्रेस के ही एक पुराने नेता कहते हैं, ‘सोनिया गांधी आज भी मेनका और वरुण को कांग्रेस में लाने के लिए तैयार नहीं हैं. उधर, मेनका गांधी घर वापसी के लिए उत्सुक नहीं दिखती.’ सूत्रों के मुताबिक अभी बातचीत बहुत शुरुआती चरण में है और सिर्फ प्रियंका और वरुण ही आपस में बात कर रहे हैं. लेकिन इतना सही है कि अगर कांग्रेस को पूरी तरह ज़िंदा करना है तो पूरे गांधी परिवार को एक साथ आना होगा. प्रियंका अगर सुल्तानपुर से चुनाव लड़ती हैं तो वरुण गांधी पीलीभीत से चुनाव लड़ेंगे.

उधर, भाजपा की बात करें तो यहां वरुण गांधी के लिए हालात खराब ही हैं. जब राजनाथ सिंह पार्टी अध्यक्ष थे तो वरुण गांधी का जबरदस्त प्रमोशन हुआ था. वे सबसे कम उम्र में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बना दिए गए थे. संघ में भी उनकी बेहद अच्छी पैठ हो गई थी. लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और अमित शाह के अध्यक्ष पद पर बैठने के बाद पिछले चार साल में वरुण गांधी एकदम किनारे कर दिए गए हैं. भाजपा के अंदर ही बहुत सारे नेता ऐसे हैं जो वरुण को बागी नहीं तो कम से कम साथी नहीं मानते.

सूत्रों की मानें तो इस वक्त हालात ऐसे हैं कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से वरुण गांधी का सीधा संपर्क नहीं है. महीनों-महीनों बीत जाने के बाद भी वे भाजपा मुख्यालय नहीं आते. भाजपा नेताओं के साथ उन्हें देखे हुए भी कई महीने बीत गए. वरुण गांधी अक्सर अपने ही तय कार्यक्रम में व्यस्त रहते हैं. साथ ही वे अपने ही अंदाज़ में चुनाव की तैयारी भी कर रहे हैं. वे ज्यादातर विश्वविद्यालयों या फिर सेमिनारों में अपना एक अलग नजरिया रखते सुनाई देते हैं. यह नज़रिया भाजपा की तय लाइन से कई बार एकदम विपरीत भी होता है.

अगला लोकसभा चुनाव ऐसा होगा जब कोई नेता खुद तटस्थ रहकर चुनाव न लड़ सकता है और न ही जीत सकता है. जानकारों का मानना है कि ऐसे में वरुण गांधी को कम से कम अपनी लाइन जरूर तय करनी होगी. उत्तर प्रदेश की खबर रखने वाले भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘अब वरुण गांधी कोई खास महत्व नहीं रखते. अगर वे गांधी परिवार में लौट जाएं और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ें तब भी कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि अबकी बार हमारा पूरा ध्यान गांधी परिवार पर ही है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘भाजपा का पूरा चुनाव प्रचार नेहरू-गांधी वंश पर हमले से शुरू होता है और उसी पर खत्म होता है इसलिए अगर इसी खानदान का एक नेता उनकी पार्टी से चुनाव लड़ रहा हो तो विरोधाभास साफ दिखेगा.’

चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ 2019 के लिए रणभेरी बज गई है. अब सवाल है कि वरुण गांधी क्या करेंगे. क्या वे अपनी बहन के लिए सुल्तानपुर सीट छोड़ देंगे और क्या मेनका गांधी अपने बेटे के लिए पीलीभीत सीट त्याग देंगी? कांग्रेस के एक बुजुर्ग नेता के मुताबिक वरुण गांधी पर अब भी कांग्रेस के पुराने नेताओं को भरोसा नहीं है. वे कहते हैं, ‘प्रियंका गांधी के अलावा इस वक्त कोई ऐसा नेता नहीं जो वरुण पर भरोसा करता हो, राहुल चूंकि अपनी बहन पर विश्वास करते हैं इसलिए वे वरुण को पार्टी में लाने के लिए तैयार हो जाएं. लेकिन इस वक्त हर पुराना कांग्रेसी सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी तक ये बात पहुंचाने में लगा है कि मेनका और वरुण गांधी को कांग्रेस में नहीं लाना चाहिए.’

उनसे इत्तेफाक रखने वाले कांग्रेस के नेताओं की दलील है कि अगर ऐसा हो गया तो आने वाले वक्त में गांधी परिवार में ही दो गुट बनने के आसार बढ़ जाएंगे. ऐसे ही एक नेता कहते हैं, ‘अभी कम से कम राहुल और प्रियंका में कोई मनमुटाव नहीं है. भाई-बहन बिल्कुल एक टीम की तरह काम कर रहे हैं. राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए प्रियंका ने पूरी ताकत लगा रखी है. लेकिन वरुण गांधी के कांग्रेस में आते ही बना बनाया समीकरण बिगड़ सकता है. बहन चाहती है छोटा भाई घर आ जाए. लेकिन पुराने घर वाले चाहते हैं कि छोटा भाई अभी दूर ही रहे तो घर वालों के लिए अच्छा है.’