पिछले लोकसभा चुनावों के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के मतदाताओं की घटती संख्या इस बार के लोकसभा चुनाव में उसके लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से इसका पता चलता है. अखबार के मुताबिक पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से अब तक देश के 27 राज्यों में चुनाव हुए हैं. इनमें से अधिकतर में भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस से आगे रही. लेकिन उसे वोट अपेक्षाकृत कम मिले हैं. वहीं, कांग्रेस का वोट आधार बढ़ा है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 16.95 करोड़ वोट मिले थे जोकि कुल मतदान का 31 फीसदी था. वहीं, कांग्रेस को 10.6 करोड़ वोट मिले जो कुल मतदान के 20 प्रतिशत से थोड़ा कम था. रिपोर्ट के मुताबिक उसके बाद 27 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में 15.5 करोड़ (28.5 प्रतिशत) मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में वोट किया, जबकि कांग्रेस को 12.2 करोड़ (22.2 प्रतिशत) वोट मिले.

रिपोर्ट कहती है कि इससे यह तो साफ है कि दोनों दलों को मिले मतों का अंतर भाजपा के पक्ष में रहा. लेकिन अगर इसकी तुलना 2014 के लोकसभा चुनाव में मिले मतों से करें, तो पता चलता है कि इन राज्यों में भाजपा के 90 लाख से ज्यादा मतदाता कम हुए हैं. वहीं, इसी दौरान कांग्रेस मतदाताओं की संख्या दो करोड़ तक बढ़ गई.

अखबार के मुताबिक इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले 16.4 करोड़ मतों की अपेक्षा 15.5 करोड़ वोट मिले. वहीं, उन चुनावों में पिछड़ी कांग्रेस का मताधार दस करोड़ से 12.2 करोड़ हो गया. राज्य चुनावों के परिणामों पर गौर करें तो इस अंतर का प्रभाव साफ देखा जा सकता है.

पिछले आम चुनावों के बाद राज्य चुनावों में भी भाजपा मजबूत होती जा रही थी. लेकिन 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव में मिली हार से पार्टी को झटका लगा था. हालांकि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उसने शानदार जीत दर्ज की थी. लेकिन उसके बाद पार्टी को एक के बाद एक मजबूत चुनावी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा बड़ी जीत दर्ज नहीं कर पाई. फिर मई 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और जेडीएस से ज्यादा सीटें हासिल करने के बाद भी वह सरकार नहीं बना सकी. और फिर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने उसे इन राज्यों की सत्ता से बाहर कर दिया.