आम चुनाव की रणभेरी बज चुकी है. केंद्र में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी अपने पुराने सहयोगियों को येन केन प्रकारेण साधकर अपने साथ बने रहने के लिए मनाने में जुटी हुई है. लेकिन उत्तर प्रदेश में अपनी बेहद मजबूत स्थिति और लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा में भी मिले जबर्दस्त बहुमत के बावजूद अपने दो बहुत छोटे सहयोगियों को साधने में उसे नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं.

इन दोनों छोटे सहयोगियों में एक है सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) जो उत्तर प्रदेश में सरकार के साथ है. पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व बहुमत के बावजूद राजभर को सरकार में हिस्सेदारी दी और उनके जातीय वोट बैंक का सम्मान बनाए रखा. लेकिन राजभर सरकार में शामिल होने के बाद से ही लगातार बागी मुद्रा में हैं. सरकार का हिस्सा होते हुए भी व हफ्ते में कम से कम एक बार तो योगी सरकार की नीतियों या भाजपा के कामकाज पर हमला जरूर बोल देते हैं.

ओमप्रकाश राजभर कई बार राज्य सरकार और भाजपा को अल्टीमेटम भी दे चुके हैं. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं से उनकी मुलाकातों की भी चर्चा होती रहती है. कहा जा रहा है कि वे शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी से उनकी निकटता भी चर्चा में बनी रहती है. ओमप्रकाश राजभर साफ कहते हैं कि भाजपा के साथ उनका साथ सिर्फ मुद्दों और विचारधारा पर आधारित है और जिस दिन भाजपा इससे किनारा करेगी उसी दिन उनका रास्ता अलग हो जाएगा.

हालांकि बात सिर्फ विचारधारा की ही नहीं है. असली मुद्दा तो सत्ता में हिस्सेदारी का है. सुभासपा ने चुनावी बेला में भाजपा पर दबाव बनाने के लिए मांगों का एक दस्तावेज तैयार किया है. पार्टी के महासचिव अरुण राजभर कहते हैं, ‘हमारे दस्तावेज पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ हमारी 19 फरवरी को एक बैठक हुई थी. चूंकि हमारी मांगे बहुत छोटी थीं इसलिए अमित शाह ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पाण्डेय, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दोनों उप मुख्यमंत्रियों से बात करके सब पर हामी भर दी. इसके बाद टिकट पर बात होनी थी.’

वे आगे कहते हैं, ‘हमारी पार्टी का पूर्वांचल की पांच लोकसभा सीटों, अम्बेडकर नगर, घोसी, सलेमपुर, चंदौली और आजमगढ़ की लालगंज सीट पर ठीक ठाक प्रभाव है, इसलिए हमें इन्हीं सीटों में से अपना हिस्सा चाहिए. लेकिन अमित शाह के आश्वासन के बाद भी आज तक हमें सिर्फ एक विधायक निवास आवंटित होने के अलावा कुछ नहीं मिला.’

राजभर की पार्टी में इस बात से भी असंतोष है कि पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग में सुभासपा के लिए भाजपा कोटे के चार लोगों को हटाने के बाद जिन लोगों को सदस्य बनाया गया है, वे सभी पार्टी के लिए अनजान हैं. पार्टी अन्य आयोगों और निगमों में पद न मिलने से भी खफा है. भाजपा ने जेपी नड्डा के जरिए राजभर को मनाने के लिए फिर से एक दौर की बात की है. लेकिन सुभासपा की मांगें अभी भी पूरी नहीं हो रहीं. पिछड़ों में अति पिछड़ों के लिए अलग से कोटा निर्धारित करने के मामले में सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट पर भी भाजपा की चुप्पी उसको परेशान कर रही है.

सुभासपा का मानना है कि अगर भाजपा लोकसभा चुनाव से पहले इस रिपोर्ट को लागू करने में हिचक रही है तो भी उसे कम से कम इस बात का भरोसा तो देना चाहिए कि चुनाव के बाद इसे लागू किया जाएगा ताकि वह अपने समाज के लोगों के बीच इस बात को रख सके. सुभासपा अब भी दावा कर रही है कि अगर उसकी बातें मानी नहीं गई तो वह जल्द ही अपने स्तर पर फैसला कर लेगी कि उसे आगे भाजपा के साथ रहना है या नहीं. हालांकि पार्टी की जमीनी स्थिति देखें तो उसके दूसरे रास्ते पर जाने की संभावना बहुत कम है. उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक सरकार का हिस्सा बने रहने का सुख आसानी से नहीं छोड़ पाएगी.

सुभासपा से कुछ बड़े और काफी पुराने अपना दल के साथ भी भाजपा के रिश्ते बहुत ठीक नहीं कहे जा सकते. लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना दल को बहुत अधिक महत्व देना शुरू कर दिया था. मगर अब अपना दल का मामला सुभासपा से थोड़ा अलग हो गया है. अपना दल केंद्र सरकार में हिस्सेदार है. विधानसभा में उसके नौ विधायक हैं और राज्य विधान परिषद में भी उसका एक विधायक है. लेकिन इसके बाद भी अपना दल लगातार असंतुष्ट दिखता है. बीते कुछ समय के दौरान उसने नेता प्रियंका गांधी से मिलते रहे. उन्होंने प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों का बहिष्कार तक कर दिया.

अब आखिरकार दोनों का गठबंधन तो हुआ है, लेकिन इसे आधा ही कहा जा सकता है. भाजपा ने अपना दल के लिए दो सीचें छोड़ी हैं. इसकी मुखिया अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर सीट से चुनाव मैदान में उतरेंगी जबकि दूसरी सीट कौन सी होगी इस पर दोनों दलों के नेताओं को अब भी चर्चा करनी है. भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह ने शुक्रवार को ट्वीट कर इसकी जानकारी दी.

राजभर की पार्टी से ठीक उलट अपना दल खुद आंतरिक कलह और बिखराव का शिकार है. इस पार्टी की स्थापना कभी बसपा के स्तंभ रहे सोने लाल पटेल ने चार नवंबर 1995 को की थी. उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी कृष्णा पटेल पार्टी की अध्यक्ष बनीं और बड़ी बेटी अनुप्रिया पटेल महासचिव. 2012 में अनुप्रिया पटेल रोहनिया से विधायक चुनी गईं. इसके बाद से ही पार्टी में मां-बेटी के बीच महत्वाकाक्षाओं का टकराव शुरू हो गया. 2014 में मोदी लहर में अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से और पार्टी के ही कुंवर हरिवंश सिंह प्रतापगढ़ से सांसद चुने गये. मां-बेटी का झगड़ा बढ़ा तो कृष्णा पटेल ने खुद को अपना दल का सर्वेसर्वा बता कर अनुप्रिया पटेल को पार्टी से बाहर कर दिया. अनुप्रिया पटेल ने भी खुद को असली अपना दल बताते हुए अपनी मां और छोटी बहन को बाहर करने करने का बयान जारी कर दिया.

फिलहाल अपना दल पर मां बेटी दोनों अपना-अपना दावा कर रही हैं. कृष्णा पटेल ने अपना दल (के) और अनुप्रिया पटेल ने अपना दल (एस) बना लिया है. झगड़ा अदालत में भी पहुंच चुका है. वैसे मई 2016 में अनुप्रिया पटेल ने चुनाव आयोग में रजिस्ट्रेशन करवा कर अस्थाई रूप से ‘कप प्लेट’ को चुनाव चिन्ह के तौर पर हासिल कर लिया है. हालांकि लोकसभा चुनाव में उसके दोनों सांसद अलग-अलग चुनाव चिन्हों पर निर्दलीय के तौर पर जीते थे.

पार्टी के झगड़े में एक नया मोर्चा खोलते हुए अब तक कृष्णा पटेल के समर्थक माने जाने वाले सांसद हरिवंश सिंह ने भी अब एक ‘अपना दल’ बना लिया है. अब वे ‘अखिल भारतीय अपना दल’ के अध्यक्ष हैं और प्रतापगढ़ में रैलियां कर अपनी चुनावी जमीन बरकरार रखने में जुटे हैं. हालांकि विधानसभा चुनावों में अपना दल (एस) को अपने हिस्से की 11 सीटों में से नौ पर जीत मिली थी. अनुप्रिया पटेल के पति और फिलहाल अपना दल (एस) के अध्यक्ष आशीष पटेल भी भाजपा की कृपा से विधान परिषद के सदस्य बन चुके हैं. लेकिन फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में पार्टी का जादू बिखर जाने के बाद से अपना दल भाजपा पर बड़ा दबाव बना पाने में सक्षम नहीं रह गया है. खुद अनुप्रिया पटेल को मिर्जापुर सीट पर चुनौती देने के लिए उनकी छोटी बहन पल्लवी पटेल शिवपाल यादव की पार्टी से चुनाव मैदान में उतरने को तैयार हैं.

अपना दल (एस) का ध्येय वाक्य है - ‘सत्ता और पद सुख भोगने के लिए नहीं होता. यह तो दबे, पिछड़े, कमजोरों एवं गरीबों के कल्याण एवं उनकी सेवा के लिए होता है.’ लेकिन हकीकत में अपना दल में अधिपत्य के लिए जिस तरह की सर फुटव्वल हो रही है, उससे तो यही साबित होता है कि यहां सब कुछ सत्ता के लिए ही है. अनुप्रिया पटेल के तेवर कुछ ढीले पड़े तो इसलिए कि अपना दल में पूरी तरह बिखराव के बाद प्रदेश में उसके नौ में से आठ विधायक भाजपा के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं.

फिर भी अपना दल पटेल समुदाय की राजनीतिक ताकत का एक बड़ा प्रतीक है. इसलिए भाजपा के सामने उसे साथ बनाए रखने की मजबूरी थी. समाजवादी पार्टी ने पटेल समुदाय से नरेश उत्तम को प्रदेश अध्यक्ष बना कर अपना दांव खेल लिया था. इसके बाद भाजपा के पास दो ही विकल्प थे - फिर से अपना दल या फिर कोई दूसरा दांव, जिससे दबना भी न पड़े और पटेल समुदाय भी अपना बना रहे. फिलहाल उसने पहला रास्ता चुन लिया है. लेकिन इस सहयोगी का पुराना रिकॉर्ड देखते हुए भाजपा के लिए इसके साथ आगे ही राह भी आसान नहीं होगी.