देश में सबसे ज्यादा (80) सांसदों वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा को मात देने के लिए एक-दूसरे के दुश्मन माने जाने वाले दो दल यानी सपा और बसपा अब एक अभूतपूर्व गठबंधन में बंध चुके हैं. शुरुआत में कांग्रेस के भी इस गठबंधन का हिस्सा बनने की चर्चाएं थीं. लेकिन मायावती की जिद और सपा-बसपा द्वारा कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में उसकी राजनीतिक स्थिति के आधार पर दहाई से कम सीटें देने के प्रस्ताव ने मामला ठंडा कर दिया. वैसे भी पहले छत्तीसगढ़ में अलग गठबंधन करके और फिर मध्य प्रदेश-राजस्थान में अकेले चुनाव मैदान में उतरकर बसपा ने साफ कर दिया था कि वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से दोस्ती कर अपने वोट बैंक में किसी तरह की सेंध लगने का खतरा मोल नहीं लेना चाहती. इसके बावजूद अटकलें लग रही थीं कि कांग्रेस अब भी सपा-बसपा के गठबंधन का हिस्सा बन सकती है.

लेकिन मंगलवार को मायावती ने इन अटकलों पर पूर्णविराम लगा दिया. उन्होंने कहा कि इस चुनाव में उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ कोई गठजोड़ नहीं करेगी. मायावती का यह भी कहना था कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में उनकी पार्टी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ किया है, जो भाजपा को हराने के लिए काफी है. उधर, कांग्रेस ने भी मायावती के इस ऐलान पर प्रतिक्रिया दी. उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव बख्शी ने कहा कि कांग्रेस को मायावती की जरूरत नहीं है. उनका यह भी कहना था कि बसपा की संसद में एक भी सीट नहीं है तो मायवाती कैसे फैसला करेंगी कि कांग्रेस को साथ आना है या नहीं.

उत्तर प्रदेश में हुए इस गठबंधन में तीन सीटों के साझीदार राष्ट्रीय लोकदल के शामिल होते वक्त सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा था कि उनके गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल है. उनका आशय यह था कि अमेठी और रायबरेली की सीटें सपा-बसपा गठबंधन ने जिस तरह कांग्रेस के लिए छोड़ दी हैं उससे कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि कांग्रेस इस गठबंधन में दो सीटों की साझीदार तो है ही. कांग्रेस में भी गठबंधन की पैरोकारी करने वाले कई नेताओं की राय थी कि अगर इससे उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को सीमित करने का रास्ता खुलता है तो इस राह पर कदम बढ़ाने में पार्टी को संकोच नहीं करना चाहिए.

इन नेताओं की दलील थी कि इससे कांग्रेस की 8-10 सीटें जीतने की उम्मीद भी बनी रहेगी और गठबंधन के अन्य तीन दलों के लिए 30-35 सीटें जीतने की भी. यानी इस तरह से नया गठबंधन 40 से 47 सीटें आसानी से जीत सकता है और अगर चुनाव पूरी तरह मिल कर लड़ा जाए तो 8-10 सीटें और भी बढ़ सकती हैं. इस धारणा के समर्थक यह भी मान रहे थे कि इस कारण कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए देश के अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए ज्यादा समय मिल सकेगा. उनका विश्लेषण कह रहा था कि अगर भाजपा को उत्तर प्रदेश में 25 सीटों के आस-पास सीमित कर दिया जाए तो दिल्ली पर फिर से सत्तारुढ़ होने की उसकी संभावनाएं काफी कम हो जाएंगी.

उधर, कांग्रेस में एक वर्ग ऐसा भी है जो अकेले मैदान में उतरने पर जोर दे रहा था. उसका रुख भी गलत नहीं कहा जा सकता. पहले तो सपा-बसपा का गठबंधन ही बहुत अस्वाभाविक तालमेल है. गठबंधन के बावजूद दोनों दलों के अध्यक्ष यानी मायावती और अखिलेश यादव अब तक केवल एक बार साझा रूप से मीडिया के सामने आए हैं. उस मौके पर भी मायावती की कुर्सी को जिस तरह अखिलेश की कुर्सी से थोड़ा बड़ा रखा गया था, वह भी गठबंधन की अस्वाभाविक दशा को दिखाता था. राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन में शामिल होने के मौके पर भी अखिलेश यादव अकेले ही थे. मायावती तो दूर बसपा का कोई दूसरा नेता तक वहां मौजूद नहीं था.

फिर ऊपर बड़े नेताओं के बीच चाहे कितना ही अच्छा तालमेल हो गया हो जमीनी स्तर पर बसपा के कैडर वोटरों और समाजवादी पार्टी के यादव वोटरों के बीच तालमेल होना आसान नहीं है. यानी एक पार्टी के वोट दूसरी पार्टी में आसानी से जाने वाले नहीं. यह भी एक वजह है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस में एक बड़ा तबका ऐसा है जो मानता है कि कांग्रेस को हर हाल में अपने दम पर अकेले ही चुनाव लड़ना चाहिए और किसी भी हालत में विधानसभा चुनावों वाली गलती दोहरानी नहीं चाहिए.

2017 में सूबे में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने पूरी 400 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी की थी. राहुल गांधी ने ‘27 साल यूपी बेहाल’ के नारे के साथ रथ यात्राओं के जरिए प्रचार अभियान भी शुरू कर दिया था. लेकिन बाद में अचानक वे अखिलेश यादव की साइकिल पर सवार हो गए. जल्दबाजी में हुआ यह अधकचरा तालमेल कांग्रेस के लिए अन्ततः एक दुःस्वप्न साबित हुआ. कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा सो अलग. इसलिए कांग्रेस में इस बार अकेले ही चुनाव मैदान पर उतरने की पैरोकारी करने वाले ज्यादा मुखर दिख रहे हैं.

इस धारा के समर्थकों का मानना है कि अकेले लड़ने पर कांग्रेस को राष्ट्रीय पार्टी होने का लाभ मिल सकता है. उनके मुताबिक लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के सामने सपा-बसपा जैसी राज्य केंद्रित पार्टियों की तुलना में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस ज्यादा बेहतर विकल्प बन सकती है. पार्टी ने अभी तक घोषित 11 उम्मीदवारों के अलावा डेढ़ दर्जन से ज्यादा ऐसे प्रत्याशियों की सूची भी तैयार कर रखी है जिनके जीत सकने की संभावनाएं बेहतर हैं. यानी पार्टी के पास 30 से अधिक मजबूत उम्मीदवारों की सूची तैयार है. कुछ दलबदलुओं के आ जाने से यह संख्या और भी बढ़़ सकती है.

अलग चुनाव लड़ने के पक्षधर कांग्रेसियों का यह भी दावा है कि अपने दम पर चुनाव लड़ने पर भी कांग्रेस को उतनी ही या उससे ज्यादा सीटें मिल सकती हैं जितनी गठबंधन में शामिल होकर मिलतीं. दूसरे, इससे कांग्रेस के संगठन में भी नई जान आ सकेगी. इस विचारधारा वाले लोग यह भी मानते हैं कि केंद्र में चुनाव बाद की भावी संभावनाओं के दरवाजे खुले रखने के लिए कांग्रेस भी उसी तरह सपा-बसपा के बड़े नेताओं के चुनाव क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार न उतारने का फैसला कर सकती है. जिस तरह सपा-बसपा गठबंधन ने रायबरेली व अमेठी सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ दी हैं. ऐसी स्थिति में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में कुछ बहुत छोटे दलों के साथ भी दोस्ती बना सकती है. इन लोगों का मानना है कि 11 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा करके कांग्रेस ने अभी भी सपा-बसपा के साथ जीत की संभावनाओं के आधार पर बहुत सी सीटों पर गठबंधन के बिना तालमेल के रास्ते खुले रखे हैं. उनके मुताबिक इस दिशा में बातचीत के जरिए भी आगे बढ़ने की सम्भावनाएं तलाशी जा सकती हैं.

लेकिन कांग्रेस की असली समस्या उसका कमजोर सांगठनिक ढांचा है. पार्टी प्रदेश में कार्यकर्ताओं की कमी से जूझ रही है. प्रदेश कांग्रेस संगठन को प्रभावी बनाने के लिए नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं. दो प्रभारी महासचिवों यानी प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को आधे-आधे उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देने के बाद अब चार और प्रभारी बना कर संगठन को पुर्नजीवित करने का प्रयास किया जा रहा है. लेकिन ये सारे प्रयोग आधे मन से हो रहे हैं. इसलिए नतीजे भी सामने आ नहीं रहे. यही वजह है कि अब कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता यह चाहते हैं कि पार्टी उत्तर प्रदेश को सिर्फ चुनावों तक ही याद न रखे बल्कि वह इसे अपना कार्यक्षेत्र बनाने के लिए जमीनी कार्यक्रमों और कार्यकर्ताओं पर ज्यादा जोर दे.