निर्वाचन आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव-2019 की तारीख़ों की घोषणा किए जाने के बाद राजनीतिक दलों की चुनावी तैयारी ने और ज़ोर पकड़ लिया है. मीडिया और सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर चर्चा है कि इस बार कौन से मुद्दे पूरे चुनावी माहौल के दौरान हावी रहने वाले हैं. पिछले आम चुनाव में विकास और भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया रहा था. लेकिन इस बार इनकी चर्चा उतनी नहीं है.

जानकार मौजूदा केंद्र सरकार के चुनावी रुख़ को देखकर कहते हैं कि इस बार राष्ट्रीय सुरक्षा और नेतृत्व सबसे बड़े चुनावी मुद्दे बनकर उभर सकते हैं. हालांकि, इनके होते हुए भी दूसरे मुद्दों की अहमियत अभी बरक़रार है. यह देखना होगा कि राजनीतिक दल अपने घोषणापत्रों में किन-किन मुद्दों पर क्या वादे करते हैं. लेकिन इतना तय है कि यह पूरा चुनाव इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा.

राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा

कई जानकारों के मुताबिक़ यह पहली बार है जब ‘राष्ट्रवाद’ के हवाले से देश की सुरक्षा को आम चुनाव का सबसे अहम मुद्दा बनाया जा रहा है. भाजपा के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार अपने पूरे कार्यकाल के दौरान राष्ट्रवाद को तरजीह देती रही है. इस दौरान विपक्षी दलों और आलोचकों पर बार-बार ‘आतंकी और पाकिस्तान समर्थक’ होने के आरोप लगते रहे हैं. बीते महीने जम्मू-कश्मीर के पुलवामा ज़िले में हुए आतंकी हमले में सीआरपीएफ़ के 40 जवानों के शहीद होने के बाद इस सियासी प्रोपैगेंडा को और हवा मिली है.

वहीं, बालाकोट हमले के बाद से भाजपा ने अपनी छवि राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख़ रखने वाले दल की बनाई है. उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ‘निडर और फ़ैसला लेने वाले नेता’ के रूप में पेश किया जो अकेले ही पाकिस्तान से निपट सकता है. जानकारों के मुताबिक़ भाजपा को विश्वास है कि विपक्ष का ‘महागठबंधन’ भी चुनाव में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की चुनौती से पार नहीं पा पाएगा.

बेरोज़गारी

वैसे तो रोज़गार हमेशा ही एक चुनावी मुद्दा होता है. लेकिन इस बार मामला इसलिए अलग है, क्योंकि मोदी सरकार के कार्यकाल में रोज़गार क्षेत्र (रिपोर्टों के मुताबिक़) अपने सबसे ख़राब दौर से गुज़र रहा है. शायद इसीलिए इसे ऐसा चुनावी हथियार कहा जा रहा है जिससे विपक्ष सत्तारूढ़ भाजपा को घेर सकता है.

दरअसल, यह बात अब बड़े जनमानस में स्वीकार्य है कि अपने कार्यकाल में नरेंद्र मोदी हर साल दो करोड़ नौकरियां पैदा करना तो दूर, पर्याप्त रोज़गार भी सृजित नहीं कर पाए हैं. वे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन व मुद्रा योजना के आंकड़ों के आधार पर लाखों नौकरियों पैदा करना दावा करते हैं. लेकिन विपक्षी दलों और तमाम विशेषज्ञ समेत अब आम लोग भी उनके दावों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रख रहे. वे मोदी सरकार पर आरोप लगाते हैं कि वह आंकड़ों में हेरा-फेरी कर लाखों रोज़गार देने का दावा करती है.

वहीं, नोटबंदी और जीएसटी जैसे फ़ैसलों ने ठीकठाक चल रही अर्थव्यवस्था की गाड़ी को पंक्चर करने का काम किया. लघु व मध्यम उद्योगों पर इन फ़ैसलों का काफ़ी बुरा प्रभाव पड़ा है. वहीं, असंगठित क्षेत्रों के काम-धंधे भी ठप पड़ गए. समझा जाता है कि इसके चलते लाखों लोगों को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ी हैं.

गांव और किसान

2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की बहुमत की सरकार बनाने में ग्रामीण भारत और किसानों की भूमिका काफ़ी अहम रही थी. लेकिन अब वे मोदी सरकार से बहुत ज़्यादा असंतुष्ट हैं. एक ओर किसान अपने फ़सल उत्पादन पर लाभ तो दूर उसकी लागत भी वसूल नहीं कर पा रहे, वहीं दूसरी तरफ़ क़र्ज़ की समस्या का हल नहीं निकल पाया है.

वहीं, राज्यों में भाजपा सरकारों के शासन में जिस तरह गोरक्षा के मुद्दे को बढ़ावा मिला, उसने भी किसानों को नाराज़ करने का काम किया है. गोरक्षकों के डर से किसानों व गोपालकों ने बड़ी संख्या में गोवंशों को आवारा छोड़ दिया. इसके चलते देशभर में, ख़ास तौर पर उत्तर भारत में आवारा मवेशियों की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ गई है. ये मवेशी आए दिन सड़क दुर्घटनाओं की वजह तो बन ही रहे हैं, साथ ही खाने की तलाश में खेतों में जाकर फ़सलें भी खा जाते हैं. इससे किसानों और शासन-प्रशासन के बीच एक नया टकराव देखने को मिला है.

उधर, किसानों की नाराज़गी से घबराई सरकार ने पहले तो न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने जैसे क़दम उठाकर उन्हें शांत करने की कोशिश की. लेकिन दिसंबर में हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्यों की सत्ता गंवाने के बाद उसे एहसास हो गया कि इस बार किसानों को मनाना आसान नहीं होगा. इसीलिए उसने बजट में किसानों को सहायता राशि देने के अलावा उनके लिए अन्य योजनाओं का ऐलान किया. अब यह चुनाव का नतीजा ही बताएगा कि किसान अभी भी सरकार से नाराज़ हैं या नहीं, लेकिन इतना तय है कि विपक्ष इस पर सरकार को घेरने से नहीं चूकेगा.

मज़बूत बनाम साझा नेतृत्व

यह आम चुनाव मज़बूत बनाम साझा नेतृत्व के मुद्दे पर भी लड़ा जाएगा. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले देश में गठबंधन की सरकारें रही थीं. 30 सालों बाद 282 सीटें लेकर बहुमत से सत्ता में आई भाजपा गठबंधन सरकारों को ‘मजबूर’ सरकार के रूप में पेश कर रही है. नरेंद्र मोदी ने महागठबंधन को इस आधार पर ‘महामिलावट’ कहा कि जनता जानती है कि गठबंधन सरकार में कैसे काम (भ्रष्टाचार) होता है. उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था की प्रगति और देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मजबूर नहीं बल्कि मज़बूत (यानी बहुमत वाली) सरकार की ज़रूरत है.

वहीं, इन पांच सालों में विपक्षी दलों के बीच ‘महागठबंधन’ के विचार ने ज़ोर पकड़ा. मोदी सरकार को आर्थिक मोर्च पर नाकाम, ग़रीब-मुस्लिम-दलित-आदिवासी विरोधी और मनमानी करने वाली सरकार बताते हुए विपक्ष ने ‘मजबूर’ सरकार का आह्वान किया है.

दरअसल, विपक्ष दलील देता है कि तमाम दलों के साझे सहयोग से बनी गठबंधन सरकार ज़्यादा ज़िम्मेदारी से काम करती है. मायावती जैसे बड़े विपक्षी नेताओं के मुताबिक़ साझे नेतृत्व पर ज़्यादा दबाव होता है जिसकी वजह से सरकार मनमाने रवैये से परहेज़ करती है. हालांकि, इस गठबंधन सरकार का नेतृत्व किसके हाथ में होगा यह अभी तक साफ़ नहीं है. लेकिन सभी विपक्षी दल इस बात पर एकमत हैं कि देश को मोदी सरकार से बचाने के लिए इस गठबंधन की सरकार बनाना ज़रूरी है.

दलित-आदिवासी

मोदी सरकार की यह कहकर आलोचना होती रही है कि वह ‘साज़िशन’ समाज के पिछड़े तबक़ों के ख़िलाफ़ काम करती है. भाजपा समर्थक वर्ग इसे राजनीतिक आरोप कहकर ख़ारिज कर सकता है. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बीते पांच सालों में कई मौक़े आए हैं जब भाजपानीत सरकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका की वजह से दलित और आदिवासी समाज में ज़बर्दस्त ग़ुस्सा पैदा हुआ है.

यह राय भी क़ायम हुई है कि इन चार सालों में दलितों व आदिवासियों के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ी है और उनकी सुरक्षा से जुड़े क़ानूनों को कमज़ोर करने का काम हुआ है. साथ ही, उच्च शिक्षा व रोज़गार के स्तर पर वंचित तबक़ों के अधिकार (आरक्षण) ख़त्म करने की कोशिशें की गई हैं. गुजरात का ऊनाकांड, रोहित वेमुला प्रकरण, एससी-एसटी एक्ट, 13 पॉइंट रोस्टर और आदिवासियों व वनवासियों के जंगल में रहने के दावे से जुड़े मामलों के बाद कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2014 में भाजपा को वंचित वर्गों से जितने वोट मिले थे, उतने इस बार मिलना संभव नहीं होगा.