बीते मंगलवार को अपना दल (एस) की मुखिया अनुप्रिया पटेल की बहन पल्लवी पटेल का एक बयान सुर्खियों में रहा. पीलीभीत में दिए गए इस बयान में पल्लवी ने अपनी बहन पर तीखा निशाना साधा था. उन्होंने कहा कि अनुप्रिया पटेल ‘ब्लैकमेलिंग’ और ‘बार्गेनिंग’ की राजनीति करती हैं.

इससे पहले काफी खींचतान के बाद लोकसभा चुनाव के लिए उत्तर प्रदेश में भाजपा और अनुप्रिया पटेल की अगुवाई वाले अपना दल (एस) का गठबंधन हो गया. इसके तहत अपना दल दो सीटों पर चुनाव लड़ेगा. गठबंधन के ऐलान के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक ट्वीट में कहा कि अपना दल प्रदेश की दो सीटों पर चुनाव लड़ेगा, जिसमें अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से चुनाव लड़ेंगी और दूसरी सीट पर दोनों दलों के नेता बैठकर चर्चा करेंगे.’ यानी दोनों दलों में सहमति की यह कवायद पूरी होनी अब भी बाकी है.

अनुप्रिया पटेल की पार्टी पिछली बार भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल होकर दो लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ी थी और दोनों पर उसे जीत हासिल हुई थी. मिर्जापुर से वे खुद चुनाव जीती थीं और जबकि प्रतापगढ़ लोकसभा सीट से पार्टी नेता कुंवर हरिवंश सिंह लोकसभा पहुंचे थे. हालांकि, बाद में मां-बेटी में अनबन हो गई और अब दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं. पिछले कुछ सालों से स्थिति यह है कि अपना दल के अनुप्रिया खेमे की इकलौती सांसद खुद अनुप्रिया ही हैं.

इसके बावजूद उन्हें मोदी सरकार में जगह दी गई. उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया. जबकि भाजपा के साथ एक-दो सांसदों वाली कुछ और भी छोटी पार्टियां हैं लेकिन उन्हें केंद्र में मंत्री पद नहीं दिया गया. जब 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तो उसमें अनुप्रिया पटेल के अपना दल को भाजपा ने 11 सीटें दीं. इनमें से नौ पर पार्टी के उम्मीदवार जीते. बाद में जब उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के सदस्यों के लिए चुनाव हुए तो भाजपा ने अनुप्रिया पटेल के पति आशीष सिंह की विधायक बनने में मदद की.

इन तथ्यों से तो यही लगता है कि भाजपा ने अपना दल के गठन से लेकर अब तक हर कदम पर अनुप्रिया पटेल को तवज्जो दी है. इसके बावजूद अनुप्रिया पटेल भाजपा से नाराज थीं. उनके साथ के कुछ लोग बताते हैं कि अनुप्रिया अपने पति को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनवाना चाहती थीं लेकिन, भाजपा ने इसमें उनका साथ नहीं दिया. इसके बाद अनुप्रिया पटेल ने यह कोशिश की कि अगर उनके पति को विधान परिषद सदस्य बनाया जा रहा है तो उन्हें उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल में कोई प्रमुख पद मिले. लेकिन यह भी नहीं हो पाया. कहा जा रहा है कि अनुप्रिया पटेल की ओर से लोकसभा चुनावों को लेकर जो मोलभाव किया गया, उसकी मूल वजह यही है. जैसा कि पहले जिक्र हुआ, दोनों दलों के बीच मिर्जापुर को लेकर सहमति हो चुकी है. दूसरी सीट पर अभी मोलभाव चल रहा है.

उधर, भाजपा के नेताओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि अनुप्रिया पटेल की पार्टी के साथ भाजपा ने 2014 में भी गठबंधन यह सोचकर किया था कि उसके पास कुर्मी समाज का कोई प्रमुख नेता नहीं है. भाजपा का मानना था कि ऐसे में अगर अनुप्रिया उसके साथ आती हैं तो इससे उसको लाभ होगा. राजनीतिक जानकार यह भी कहते हैं कि अनुप्रिया पटेल की मौजूदगी का लाभ कुछ खास क्षेत्रों में भाजपा को 2014 के लोकसभा चुनावों में भी मिला और 2017 के विधानसभा चुनावों में भी. ऐसे में अनुप्रिया पटेल को यह लगना स्वाभाविक है कि उनके होने से पिछड़े वर्गों के एक हिस्से का वोट अगर भाजपा को मिल रहा है तो इसका लाभ उन्हें और उनकी पार्टी को भी होना चाहिए.

कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन हो जाने की वजह से भी अनुप्रिया पटेल भाजपा के साथ ज्यादा कड़ाई से मोलभाव कर पा रही हैं. उन्हें लग रहा है कि भाजपा के पास अपना दल को छोड़ने का विकल्प नहीं है क्योंकि भाजपा के साथ उत्तर प्रदेश में उसके अलावा कोई और प्रमुख दल नहीं है. अनुप्रिया पटेल के समर्थकों का यह भी मानना था कि अगर यह गठबंधन टूटा तो पूरे प्रदेश में भाजपा की पिछड़ा विरोधी छवि बनेगी और सपा-बसपा-राष्ट्रीय लोक दल गठबंधन को देखते हुए वह यह जोखिम उठाने को तैयार नहीं होगी.

कुछ लोगों को अनुप्रिया पटेल का भाजपा के साथ मोलभाव रामविलास पासवान की याद दिला रहा है. बिहार में जब यह साफ हो गया राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, उपेंद्र कुशवाहा की लोक समता पार्टी, वामपंथी पार्टियां और कुछ अन्य छोटे क्षेत्रीय दल मिलकर महागठबंधन बना रहे हैं तो लोकजनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान ने भाजपा के साथ सीटों को लेकर मोलभाव करना शुरू कर दिया. नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड के भाजपा के साथ आने के बावजूद रामविलास पासवान पांच लोकसभा सीट लेने में कामयाब हुए. 2014 में उनकी पार्टी सात सीटों पर चुनाव लड़ी थी.

कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि रामविलास पासवान ने गठबंधन को लेकर होने वाले राजनीतिक मोलभाव को एक नया आयाम दिया है. उन्होंने पांच लोकसभा सीटों के अलावा अपने लिए भाजपा से एक राज्यसभा की सीट भी मांगी. भाजपा को इसके लिए तैयार होना पड़ा. इसका मतलब यह हुआ कि किसी खास वर्ग के नेता के पास अगर जमीनी राजनीतिक ताकत है तो वह सिर्फ एक चुनाव के लिए मोलभाव नहीं करेगा बल्कि दूसरी जगहों से भी अपने और अपनी पार्टी के लिए फायदा लेना चाहेगा. जो सफल कोशिश रामविलास पासवान ने बिहार में की, उसी तरह की कोशिश उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल कर रही हैं.

अनुप्रिया पटले के कुछ समर्थक अनौपचारिक बातचीत में बताते हैं कि अनुप्रिया के पति राज्यसभा आना चाहते हैं. यह बात भी सुनने में आ रही है कि अगर भाजपा राज्यसभा के लिए तैयार न हो तो वह कम से कम यही वादा कर दे कि उनके पति को योगी आदित्यनाथ की सरकार में कोई अहम मंत्रालय दिया जाएगा. फिलहाल भाजपा दो सीटों पर मान गई है. राज्यसभा सीट या मंत्रालय की मांग पर वह क्या करेगी, यह देखा जाना बाकी है.