बीती चार मार्च को चुनाव आयोग की टीम ने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था. इस दौरान उसने मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दलों से मुलाकात की. इन दलों ने लोकसभा के साथ साथ राज्य में विधानसभा के चुनाव कराने पर भी ज़ोर दिया. उनका कहना था कि सिर्फ निर्वाचित सरकार ही राज्य को सामान्य स्थिति और आत्मविश्वास की तरफ ले जा सकती है.

लेकिन इसके ठीक छह दिन बाद, चुनाव आयोग ने कश्मीर में सिर्फ लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा कर दी. उसका कहना था कि राज्य में अभी विधानसभा चुनाव कराने के लिए सुरक्षा की स्थिति अनुकूल नहीं है. चुनाव आयोग की इस घोषणा के बाद जम्मू-कश्मीर, जहां अभी राष्ट्रपति शासन लागू है, के राजनेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा. उनका इल्जाम था कि प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान, अलगाववादी संगठनों और मिलिटेंट्स के सामने घुटने टेक दिए हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने चुनाव आयोग की घोषणा के फौरन बाद कहा, ‘प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान, अलगाववादी संगठनों और मिलिटेंट्स के सामने घुटने टेक दिए हैं. 56 इंच की छाती फ़ेल हो गयी है.’ उधर, बाकी राजनेताओं का सवाल था कि अगर लोकसभा चुनाव के लिए सुरक्षा स्थिति अनुकूल है तो विधानसभा चुनाव के लिए क्यों नहीं.

यह भी इल्ज़ाम लगे कि नई दिल्ली में भाजपा की सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे के चलते चुनाव आयोग से ऐसा करा रही है. राज्य की एक और पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती का कहना था, ‘कश्मीर में विधानसभा चुनाव न कराना भारत सरकार की भयावह योजना को दर्शाता है. लोगों को अपनी सरकार चुनने का अधिकार न देना जनतंत्र में अनैतिक है.’

कई सवाल

ऐसे में सवाल कई हैं. पहला और सब से महत्वपूर्ण यही कि क्या केंद्र सरकार वाकई पाकिस्तान और मिलिटेंट्स के सामने झुक गई है? कश्मीर में राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो यह बात सही भी है और गलत भी. या यूं कहें कि इस बात का हां या न में जवाब नहीं दिया जा सकता. कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विशेषज्ञ मसूद हुसैन की मानें तो एक तरीके से यह कहना सही है कि भारत सरकार ने वही किया है जो पाकिस्तान और अलगाववादी चाहते थे. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘अलगाववादी संगठनों को फायदा तो होगा इस बात से कि भारत सरकार ने यह मान लिया है कि कश्मीर में स्थिति चुनावों के लिए अनुकूल नहीं है.’

लेकिन साथ ही साथ मसूद हुसैन यह भी जोड़ते हैं कि यह फायदा अधूरा है क्योंकि लोकसभा चुनाव तो हो ही रहे हैं. वे कहते हैं, ‘तो यूं भी कह सकते हैं कि नई दिल्ली ने अलगाववादियों को फायदा तो पहुंचाया है, लेकिन साथ ही साथ अपना एजेंडा भी खूब निभाया है.’

उधर, नई दिल्ली के सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फैलो और कश्मीर की इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइन्स एंड टेक्नालॉजी के पूर्व कुलपति सिद्दीक वहीद रधु कुछ और ही कहते हैं. उनका कहना है, ‘भाजपा कभी यह नहीं चाहेगी कि उसके किसी कदम से उसके पाकिस्तान या अलगाववादी संगठनों के इशारों पर चलने का संदेश जाए. लेकिन हमें यह समझना होगा कि उसकी नज़रें कहीं और टिकी हुई हैं. और वो है राजनीतिक ताकत जो जम्मू कश्मीर में उसको मिलती दिखाई दे रही है.’

सत्याग्रह ने इस बात को लेकर कुछ अन्य लोगों से भी चर्चा की. सब का यही मानना है कि विधानसभा चुनाव न कराने के इस फैसले से अलगाववादियों और पाकिस्तान को फायदा तो हुआ है, लेकिन इसमें भाजपा का अपना फायदा भी कम नहीं है.

हालांकि फिलहाल तो पाकिस्तान और अलगाववादी ही फायदे में नज़र आ रहे हैं और पाकिस्तान इस बात को जताने में कोई चूक नहीं कर रहा है. पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्री फवाद चौधरी ने सोमवार को कहा कि भारत में जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने की हिम्मत नहीं है. उनका कहना था, ‘सात लाख फौजी हैं कश्मीर में. एक फौजी हर 10 कश्मीरियों के लिए. इसके बावजूद तुम (भारत) में वहां (कश्मीर) चुनाव कराने की हिम्मत नहीं है.’

क्या इसमें कोई एजेंडा है?

अब यह देखना बाक़ी रह गया है कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव न कराने का ज़्यादा फायदा भाजपा को होगा या अलगाववादियों और पाकिस्तान को. यह तो वक़्त ही बताएगा, लेकिन अभी के लिए कुछ और सवाल भी हैं. उनमें से एक यह भी है कि क्या विधानसभा चुनाव न करवाने के पीछे भाजपा का वाकई कोई एजेंडा है.

कम से कम कश्मीर में तो लोग यही सोचते हैं. उनका मानना है कि भाजपा सूबे में जो राज्यपाल सत्यपाल मालिक से करवा सकती है कि वह कोई निर्वाचित सरकार नहीं कर सकती. कश्मीर के वरिष्ठ राजनीतिक टीकाकार शाह अब्बास सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘जैसे अनुच्छेद 35-ए के साथ छेड़छाड़, अनुच्छेद 370 या फिर सुरक्षा के मामलों में लिए जाने वाले फैसले या और कोई भी फैसला. जो मदद भाजपा को सत्यपाल मालिक या किसी और राज्यपाल से मिल सकती है वो किसी चुनी हुई सरकार से नहीं मिलेगी और भाजपा इस चीज़ को खूब पहचानती है.’

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि कश्मीर भाजपा के लिए एक राजनीतिक अखाड़ा बन गया है, जो चुनावों में उनकी मदद करेगा. मसूद हुसैन कहते हैं, ‘तो ऐसे में वो क्यों चाहेंगे कि कश्मीर में स्थिरता आए. उनका अपना राजनीतिक एजेंडा तो पूरा हो रहा है न. जम्मू कश्मीर की किसको पड़ी है. छह सीटें ही तो हैं कुल मिलाकर.’ मसूद भी मानते हैं कि अनुच्छेद 35-ए और अन्य संवेदनशील मामलों के लिहाज से भाजपा सूबे में खुली छूट चाहती है जो उसे राष्ट्रपति शासन में ही मिल सकती है.

एक और नजरिया

इस सब में एक और नजरिया यह भी है कि जम्मू हिस्से में भाजपा के लिए हालात ठीक नहीं है जिसके चलते भी वह नहीं चाहती थी कि राज्य में अभी विधानसभा चुनाव हों. सिद्दीक का मानना है कि भाजपा अपने लिए जम्मू में वोट बटोरने का समय ले रही है ताकि वह राज्य में किसी भी गठबंधन का हिस्सा बन सके.

ये सब बातें महज टिप्पणियां हैं. शायद इन सब में से कुछ भी सच न हो, या शायद चुनाव आयोग ने वाकई सुरक्षा स्थिति ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया हो. लेकिन जो भी है, जानकारों के मुताबिक संकेत तो जनता के पास यही जा रहे हैं कि भाजपा कश्मीर में अपनी राजनीति के चक्कर में चुनाव नहीं करा रही है. कश्मीर यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइन्स डिपार्टमेंट के प्रमुख रहे नूर अहमद बाबा कहते हैं, ‘मैं भी मानता हूं कि जो लोग बोल रहे हैं शायद वह सच न हो, लेकिन आखिरकार देखा यह जाएगा कि संकेत क्या मिल रहे हैं लोगों को.’

अब विधानसभा चुनाव न कराने की वजह जो भी हो, नूर बाबा जैसे कुछ लोगों को यह लगता है कि सूबे में भाजपा ने एक एक ऐसा चुनाव कराने का मौका गंवा दिया जिसमें लोग शायद बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते. नूर बाबा कहते हैं, ‘लोग चाहते हैं कश्मीर में एक स्थिर लोकप्रिय सरकार आए और राष्ट्रपति शासन हटाया जाए.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘राष्ट्रपति शासन में कुछ ऐसे निर्णय लिए गए हैं जो लोगों को लगता है कि उनके हित में नहीं हैं. मैं यह समझता हूं कि अगर इस समय चुनाव हो जाते तो लोगों की एक भारी संख्या वोट डालने बाहर आती.’

कश्मीर में काफी लोग नूर बाबा से सहमति रखते हैं. उनका मानना है कि केंद्र ने सूबे को शांति की ओर ले जाने का एक मौका गंवा दिया है. लेकिन वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि कश्मीर में चुनाव न कराने का निर्णय बिलकुल सही है. और इनकी बात ध्यान से सुनें तो इसे भी नकारा नहीं जा सकता.

तो कौन हैं यह लोग और वे क्यों मानते हैं कि कश्मीर में चुनाव कराना अभी ठीक नहीं है?

श्रीनगर लोकसभा सीट पर अप्रैल 2017 में हुए उपचुनाव के दौरान काफी हिंसा हुई थी. इसमें आठ नागरिक मारे गए थे. इसके बाद अनंतनाग लोक सभा सीट का उपचुनाव रद्द कर दिया गया था, जो अभी तक नहीं हो पाया है. दूसरी तरफ पिछले साल अक्टूबर-दिसंबर में सरकार ने कश्मीर में नगर निकाय और पंचायत चुनाव कराये. जहां कश्मीर की राजनीतिक पार्टियां इन चुनावों से दूर रहीं, वहीं लोगों ने भी इनका बहिष्कार किया. कश्मीर घाटी में कहीं भी मतदान प्रतिशत दो अंकों में नहीं हो पाया. आलम यह था कि कश्मीर घाटी में नगर निकाय की ऐसी 130 सीटें हैं जहां उम्मीदवार निर्विरोध जीत गए.

और जो जीते, वे लोग कहां हैं? मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा की मानें तो अभी भी ये चुने गए उम्मीदवार होटलों और गेस्ट हाउसों में रह रहे हैं, जिनका खर्चा सरकार उठा रही है. इसकी वजह यह है कि कश्मीर में पंचायत और नगर निकाय चुनावों से पहले मिलिटेंट्स ने उन लोगों को मारने की धमकी दी थी जो इन चुनावों में हिस्सा लेते. और देखा जाये तो यह सिर्फ धमकी नहीं थी क्योंकि पिछले कुछ सालों में दर्जनों पंचायत सदस्यों की हत्याएं हुई हैं.

सत्याग्रह ने ऐसे ही कुछ लोगों से बात की जिन्होंने इन चुनावों में हिस्सा तो ले लिया था, लेकिन जो अब डर के मारे होटलों में छिपे बैठे हैं. दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के गुलजार अहमद (बदला हुआ नाम) कहते हैं, ‘मैंने सोचा था कुछ बन के लोगों की भी सेवा करूंगा और अपने घरवालों की भी. लेकिन जिस दिन से मैंने नॉमिनेशन भरा तब से श्रीनगर के इस होटल में पड़ा हुआ हूं.’ गुलजार के मुताबिक कि उन्हें घर गए हुए लगभग छह महीने हो गए हैं और वे अभी घर जाने की सोच भी नहीं रहे हैं. वे कहते हैं, ‘घर गया तो मैं मार दिया जाऊंगा, मुझे पता है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘ऐसे में ये लोग यहां चुनाव कराने की बातें कर रहे हैं. हंसी भी आ रही है और रोना भी.’

गुलजार के बगल वाले कमरे में रह रहे पुलवामा के शब्बीर अहमद (बदला हुआ नाम) भी कुछ ऐसी ही बात कहते हैं. वे सवाल करते हैं, ‘सरकार हमें तो सुरक्षित कर नहीं पायी है, और लोगों को खतरे में डालने का क्या फायदा है. हम तो थोड़े से लोग थे और सुरक्षा के नाम पर हमें होटलों में बैठा दिया गया है. विधानसभा चुनावों में कितनों को होटलों में रखेंगे ये लोग?’

दक्षिण कश्मीर में नज़र दौड़ाई जाये तो इन लोगों का डर भी जायज़ है. भले ही कश्मीर के इंस्पेक्टर जनरल स्वयं प्रकाश पाणि यह कहें कि पिछले कुछ महीनों में मिलिटेंट्स की भर्ती कम हो गयी है, लेकिन अभी भी मिलिटेंट्स ठीक-ठाक संख्या में हैं.

अब चाहे बात उन लोगों की सही है, जो कहते हैं कि लोग भारी संख्या में वोट डालने निकलते या उन लोगों की जो कहते हैं कि सुरक्षा स्थिति अनुकूल नहीं है, जम्मू-कश्मीर में चुनाव फिलहाल नहीं हो रहे.

और चुनाव न होने से कश्मीर घाटी स्थिरता की तरफ तो बिलकुल बढ़ती दिखाई नहीं दे रही.