निर्देशक : जोया अख्तर, अलंकृता श्रीवास्तव, नित्या मेहरा, प्रशांत नायर

लेखक : अलंकृता श्रीवास्तव, जोया अख्तर, रीमा कागती

कलाकार : शोभिता धूलीपाला, अर्जुन माथुर, जिम सार्ब, कल्कि केकला, शशांक अरोड़ा, शिवानी रघुवंशी

रेटिंग : 4/ 5

(समीक्षा में कुछ छोटे-मोटे स्पॉइलर मौजूद हैं, अपनी समझ से आगे बढ़ें और पढ़ें)

लेखन! हिंदुस्तानी वेब स्पेस में अभी तक की सबसे मौलिक, अलहदा, परतदार और मैच्योर राइटिंग ‘मेड इन हेवन’ में देखने को मिलती है. नेटफ्लिक्स की बेहद उम्दा वेब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ चूंकि उपन्यासकार विक्रम चंद्रा के इसी नाम के वृहद नॉवल पर आधारित थी, इसलिए उसका नम्बर अब दूसरा हो जाता है.

गली बॉय’ के बाद एक बार फिर जोया अख्तर ने जिस सलीके से ‘मेड इन हेवन’ के लिए मुख्तलिफ किरदारों को गढ़ा है, वर्गभेद को व्यक्त किया है, कुछ नौ-दस शादियों के बहाने हमारे समाज के पाखंड और सही-गलत के बीच झूलती इंसानी फितरत का सूक्ष्मतम अध्ययन किया है, वो बा-कमाल उपलब्धि है. सबसे खास बात है कि इतना सब कुछ अलंकृता श्रीवास्तव, जोया अख्तर और रीमा कागती की लेखकीय त्रिवेणी ने हिंदुस्तानी वेब स्पेस के सबसे पसंदीदा जॉनर ‘क्राइम’ से दूर रहकर हासिल किया है!

एमेजॉन प्राइम वीडियो की यह नयी बेमिसाल वेब सीरीज नौ एपीसोड का फैलाव लिए है और अंतरराष्ट्रीय स्तर के वेब शोज के स्तर का लेखन हमारी नजर करती हैं. हर एसीसोड अपने आप में भी संपूर्णता लिए है और बाकी आगे-पीछे के एसीपोड मिलकर भी प्रमुख किरदारों की कहानी और उनके सफर को नए-अनेक आयाम देकर सीरीज को आगे बढ़ाते हैं.

केवल नौ एपीसोड में नौ-दस शादियों के बहाने ढेर सारे किरदारों की बाहरी और आंतरिक यात्राओं पर दर्शकों को ले जाना कतई आसान नहीं होता. सिलसिलेवार धीरे-धीरे सही-गलत के बीच झूलते किरदारों को उभारने के लिए बेहद मजबूत और परिपक्व लिखाई की जरूरत होती है जो कि हिंदुस्तानी वेब स्पेस में अभी तक कम ही देखने को मिली है. कई सारी देसी वेब सीरीज एसीपोड दर एपीसोड शो गढ़ने में अभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की राइटिंग का परिचय नहीं दे पाती हैं. उनके लिए और उन जैसी धड़ाधड़ आने वाली कई नयी महत्वाकांक्षी सीरीजों के लिए ‘सेक्रेड गेम्स’ के बाद अब ‘मेड इन हेवन’ की राइटिंग भी बेमिसाल उदाहरण की तरह मौजूद रहेगी.

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‘मेड इन हेवन’ लार्जर देन लाइफ किरदारों के बारे में भी नहीं है. ऐसे किरदारों की कहानी कहने का इन दिनों वेब स्पेस में खूब चलन है. लेकिन चलन के विपरीत जाकर जोया अख्तर ने परिवारों, रईस किरदारों और भव्य शादी के लिए आसक्त दूल्हा-दुल्हनों के बीच कई सारे मध्यमवर्गीय पात्रों को इकट्ठा किया है और हाई सोसाइटी के साथ-साथ आम जीवन की भी कभी बेहद खूबसूरत तो कभी बेहद निर्मम पड़ताल की है. मध्यमवर्गीयता भी अपनी तीनों श्रेणियों के साथ मौजूद है – निम्न, मध्य, उच्च – और तीनों से संबंध रखने वाले किरदारों के सपने, उनके यथार्थ, उनकी लस्ट को जोया ने जैसे तीन सौ साठ डिग्री पर धीमी गति से घूमते कैमरे से कैप्चर किया है.

एक प्रमुख पात्र अपने निम्न मध्यवर्गीय जीवन की छाया अपनी आज की हाई सोसाइटी लाइफ पर नहीं पड़ने देना चाहता लेकिन एक पछतावा सीरीज भर उसका पीछा करता है. एक उच्च मध्यमवर्गीय पात्र अपनी समलैंगिकता को दुनिया से छिपाते हुए शादी की उस हिंदुस्तानी व्यवस्था का ‘वेडिंग प्लानर’ बनता है जो कि समलैंगिक शादियों को ही मान्यता नहीं देती. एक किरदार अपने अफेयर को छिपाने के लिए तमाम तरह के झूठ बोलता है लेकिन सीरीज दो महिलाओं के बीच बंटे उसके प्यार को ‘खलनायक’ का पैरहन न देकर उसकी मानसिकता को समझने की कोशिश करती है. अफेयर करने वाली लड़की भी ‘वैंप’ की बॉलीवुडीय परिभाषा की आंच में नहीं जलती और उसकी भी साइकी समझने की खूबसूरत कोशिश की जाती है.

शिबानी बागची नामक एक दूजा किरदार (नताशा सिंह) वेडिंग प्लानर टीम के कई सदस्यों में से एक मामूली सदस्य मालूम होता है जिसपर लगता नहीं कि सीरीज खास ध्यान देगी, लेकिन उसे भी खूबसूरत क्षणों के साथ मकबूल कैरेक्टर-ग्राफ दिया जाता है. शादी की वीडियोग्राफी करने वाला एक पात्र हर जगह मौजूद रहने के बावजूद शादी के तमाशों से जैसे विरक्ति धारण किए मालूम होता है, लेकिन हर एपीसोड के अंत में वो ही दार्शनिक-सा एक वॉयसओवर देकर हिंदुस्तानी शादियों के पाखंड को उजागर करता है. एक मकानमालिक दिल्ली के खडूस मकानमालिकों की तरह ही अपने किराएदार पर नजर रखता है लेकिन उसे भी जल्द अथाह मानवीय बनाकर प्रस्तुत किया जाता है.

याद आता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की कुछ उम्दा सीरीजों में ही इस तरह से हर छोटे-बड़े किरदारों को अपने लंबे सीजन के दौरान जहीन अंदाज में उभारा जाता रहा है. ये प्लॉट-ड्रिवन कहानियों के साथ-साथ कैरेक्टर-ड्रिवन सीरीज भी होती हैं, जैसी कि ‘मेड इन हेवन’ है. और ऐसी सीरीज तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कम नजर आती हैं जो कि इन किरदारों में ब्लैक या व्हाइट की जगह ‘ग्रे शेड’ को एक्सप्लोर करने में ‘मेड इन हेवन’ की तरह प्रतिबद्ध रही हों.

ब्रिटिश सीरीज ‘द मिसिंग’ (2014-16) याद आती है, जिसका कि ‘मेड इन हेवन’ से कोई लेना-देना तो नहीं है, लेकिन उसमें एक युवा पात्र था जो कि घोषित रूप से चाइल्ड मोलेस्टर था. दुनिया-भर की ज्यादातर फिल्मों-सीरीज में ऐसे पात्र घोर ब्लैक शेड में ही प्रस्तुत किए जाते हैं लेकिन ‘द मिसिंग’ ने अपने इस पात्र को अति मानवीय बनकर प्रस्तुत किया था. दर्शकों के लिए धीरे-धीरे ही यह राज खुला था कि ये पात्र खुद भी अपनी इस दिमागी बीमारी से बाहर आने के लिए कई तरह की पीड़ाओं से गुजर रहा है. इसी यूनीक एप्रोच की वजह से सीरीज का अंत आते-आते दर्शक इस खलनायक से लगते किरदार से ऐसे जुड़ गए थे जैसे कि दुनिया की निर्ममता के बीच फंसे मासूम नायक से हम जुड़ते रहे हैं. ये बंदा नायक नहीं था तो खलनायक भी नहीं, बस सही और गलत के बीच जूझता एक ग्रे पात्र था.

‘मेड इन हेवन’ में भले ही इस तरह के ट्विस्टिड किरदार नहीं हैं, लेकिन यह सीरीज जिस संवेदनशीलता के साथ बिना फैसला सुनाए ग्रे शेड में रंगे अपने हर प्रमुख किरदार को एक्सप्लोर करती है वो हिंदुस्तानी टीवी, सिनेमा और वेब सीरीज जैसे सभी माध्यमों के लिहाज से बेहद अलहदा और मैच्योर एप्रोच है. आपको शुरुआत में भले ही लगे कि ये सीरीज रईस दुनिया से ताल्लुक रखने वाली कुछ शादियों की सतही कहानी भर है, लेकिन जल्द ही अहसास होगा कि यह हमारे भारतीय अर्बन समाज को आईना दिखाने वाली परतदार कहानी है. शादी आधारित ‘मॉनसून वेडिंग’ और ‘बैंड बाजा बारात’ से कहीं आगे बढ़कर मुश्किल हो चले इंसानी संबंधों और अर्बन समाज के पाखंड की कंटेम्पररी कहानी है.

शादी से जुड़े महिला मुद्दों और समलैंगिकता के चित्रण को लेकर भी सीरीज बेहद संवेदनशील रहती है. हिंदुस्तानी सिनेमा में समलैंगिकता को जिस संवेदनशीलता के साथ ओनीर जैसे समलैंगिक निर्देशक पोट्रे करते रहे हैं, उसी स्तर को ऊंचा उठाते हुए गे किरदारों का क्रांतिकारी चित्रण तीन महिला फिल्मकारों ने ‘मेड इन हेवन’ में किया है - अलंकृता, जोया और रीमा. मुख्य नायक अर्जुन माथुर ने उनकी इस संवेदनशीलता को व्यक्त करने के लिए आत्मा और शरीर दोनों धारण किए हैं, और इमोशन्स के सतरंगी इंद्रधनुष से गुजरने वाला उनका अभिनय इस सीरीज में लाजवाब है!

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भाषा के उपयोग को लेकर भी अलग से बात होनी चाहिए. अंग्रेजी प्रमुखता से इस सीरीज में सुनाई देती है और हिंदी का उपयोग अंग्रेजी के बनिस्बत बेहद कम है. लेकिन ऐसा इसलिए नहीं है कि जोया और रीमा की क्रिएटर जोड़ी ने इसे अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए बनाया है – हालांकि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर की ही सीरीज है - या फिर जिस भाषा में वे धाराप्रवाह हैं उस अंग्रेजी के प्रति मोह के चलते ऐसा किया गया है.

‘मेड इन हेवन’ में अंग्रेजी भाषा एक ‘अपर क्लास’ का प्रतिनिधित्व करती है, और हमारे समाज में जिस तरह दोयम दर्जे का ट्रीटमेंट हिंदी को मिलता रहा है – खासकर दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में – उसे इस सीरीज ने बेहद बारीकी से चित्रित किया है. निम्न मध्यमवर्ग से आई एक नायिका खुद को पॉलिश कर एलीट क्लास की सही उच्चारण वाली अंग्रेजी में सिद्धहस्त करती है और उसके फ्लैशबैक में उसकी पुरानी भाषा का लगातार उपयोग यह निर्मम सच दिखाने के लिए बार-बार किया जाता है.

वहीं द्वारका से आई एक निम्न मध्यमवर्गीय पंजाबी लड़की टूटी-फूटी इंग्लिश जानने के बावजूद अंग्रेजीदां माहौल में खुद को सम्मिलित करने के लिए लगातार इंग्लिश बोलती है. दिल्ली का ही एक मकानमालिक चूंकि जानता है कि उसका किराएदार उससे ऊपर वाले अपर मिडिलक्लास से ताल्लुक रखता है तो वो भी अंग्रेजी में बात करता है और घर आते ही बीवी से हिंदी में बतियाता है. महानगरों में नजर आने वाली भाषाओं के बीच की इस ‘पॉवर इक्वेशन’ को कई सतहों पर इस सीरीज ने एक्सप्लोर किया है.

हर प्रमुख किरदार में मौजूद विरोधाभास भी इस सीरीज को खास बनाता है. लेखन की जादूगरी है कि वो हिंदी सिनेमा के दायरों से बंधे किरदारों को नए आयाम देने में सफल रहती है और धीरे-धीरे यह सच्चाई आपके सामने खोलती है कि जो एक बार में दिख रहा है वो पूरा इंसान नहीं है. साइलेंस को उपयोग करने की जोया अख्तर की कुशलता भी ‘गली बॉय’ के बाद एक बार फिर बार-बार इस सीरीज में देखने को मिलती है और दुनिया-भर के शोर के बीच कुछ शांत से बेहद कलात्मक दृश्य गढ़े जाते हैं. ‘मोमेंट्स’ रचने में जोया का कोई सानी नहीं है.

साथ ही पार्श्व-संगीत भी आला दर्जे का है, प्रोडक्शन डिजाइन भी इसी स्तर की, और ‘गली बॉय’ के सिनेमेटोग्राफर जय ओज़ा ही इस सीरीज का भी फिल्मांकन उस फिल्म की तरह बेहद खूबसूरत करते हैं.

निर्देशन में भी वही कुशलता मौजूद है जो ‘गली बॉय’ में नजर आई थी. न्यू एज हिंदी सिनेमा वाले शिल्प के मामले में अब जोया, अनुराग कश्यप की टक्कर की निर्देशक हो गई हैं. उनके साथ मिलकर अलंकृता श्रीवास्तव, नित्या मेहरा और प्रशांत नायर ने निर्देशकीय भूमिकाएं निभाते वक्त वही मजबूत सिनेमाई शिल्प बरकरार रखा है और लेखन, निर्देशन तथा अभिनय के सम्मिलित प्रयास ने इस सीरीज को अंतरराष्ट्रीय शोज के स्तर का बनाया है.

शोभिता धूलीपाला मुख्य नायिका के रोल में हैं और क्लोजअप शॉट्स में बेइंतिहा खूबसूरत लगती हैं. अनुराग कश्यप की ‘रमन राघव 2.0’ में उनके किरदार की कमजोर लिखाई ने उन्हें जल्द ही जन-स्मृति से बाहर कर दिया था लेकिन ‘मेड इन हेवन’ में अंदरूनी संघर्षों से जूझते उनके बारीक लिखे पात्र तारा खन्ना में उन्होंने अपने अभिनय से चार चांद लगा दिए हैं. इस सीरीज को देखने के बाद उन्हें कोई नहीं भुला पाएगा. अर्जुन माथुर और उनके किरदार के बीच की दोस्ती भी निराली खुशबू लिए हुए है, और हिंदी सिनेमा के मैच्योर हो रहे नायक-नायिका के संबंधों का खूबसूरत चित्रण करती है.

‘तितली’ की सम्मोहक और यादगार प्रेमियों की जोड़ी इस सीरीज में भी दोस्ती और प्रेम के भवसागर में तैरती मिलती है. शशांक अरोड़ा और शिवानी रघुवंशी को मुख्तलिफ किरदारों के लिए चुनकर शायद जोया अख्तर एंड टीम ने उस बेहतरीन फिल्म ‘तितली’ को ट्रिब्यूट ही दिया होगा. निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से आई जैज का किरदार करने वाली शिवानी रघुवंशी खासकर बहुत प्रभावित करती हैं क्योंकि वे जैसी पहली फिल्म में रॉ थीं अभी भी ठीक वैसी ही हैं. ग्लैमर की दुनिया उन्हें रंग-रूप-संगत बदलने के लिए मजबूर नहीं कर पाई.

शशांक अरोड़ा की तो स्क्रीन प्रेजेंस ही अलहदा है और वे किसी खांचे में फिट होने वाले अभिनेता नहीं मालूम होते. हर एपीसोड में उनका अंग्रेजी वॉयसओवर खासा असरदार भी है जो हर पूरी हो चुकी शादी का सार आपको बताते चलता है. हालांकि वे खुद अकेले ही एक कैमरे से पूरी की पूरी करोड़ों के खर्च वाली शादी शूट करते हैं और बिना आवाज रिकॉर्ड करने वाले एक्सटर्नल माइक के करते हैं. यह तकनीकी कमी बार-बार अखरती है और बार ही बार सामने भी आती है.

फिर, कुछ आखिरी के चंद एपीसोड में आने वाली शादियां भी हैं जो फिल्मी ज्यादा हो जाती हैं. इससे शो की शुरुआती सोशल कमेंट्री वाली मारकता की धार कम होने लगती है.

विनय शुक्ला को लंबे अरसे बाद मजबूत मध्यमवर्गीय किरदार मिला है जो ऑर्गेनिक तरीके से आगे बढ़ता है और इस रोल में वे कमाल का काम करते हैं. जिम सार्ब को ज्यादातर स्टाइलिश या हीरोइक स्वैग वाले ही किरदार मिलते रहे हैं लेकिन यहां उन्हें नियंत्रित अभिनय करने की आवश्यकता थी और ऐसा करते हुए भी वे खूब फबते हैं. कल्कि केकला को न्यूरोटिक पात्रों में खूब दोहराया जाने लगा है, परंतु यहां लेखन ने उनके ऐसे किरदार को काफी गहराई दी है जिसके चलते उनका पहले देखा हुआ अभिनय भी फिर पसंद आता है.

फिर ग्रीन टी पीने वाले ‘प्लम्बर’ विजय राज हैं, जो छोटे-से रोल में भी जहान-भर का गुरुत्वाकर्षण भर देते हैं. हमेशा की तरह.

बाकी हर एपीसोड में भिन्न-विभिन्न शादियों के बहाने कुछ नए एक्टर देखने को मिलते हैं और उनमें दीप्ति नवल को देखकर आप मंत्रमुग्ध हो सकते हैं. उनके चेहरे पर वरिष्ठता के दौर वाली वहीदा रहमान जैसा नूर नजर आता है. नीना गुप्ता, मंजोत सिंह, श्वेता त्रिपाठी, अमृता पुरी, मानवी गगरू भी प्रभावित करते हैं और सबसे ज्यादा दिल बेहद छोटे-से रिस्की रोल में विक्रांत मैसी जीतते हैं. क्यों? यह उम्दा सीरीज देखकर खुद जानिए.

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