बीते दिनों मध्य प्रदेश के ग्वालियर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा आयोजित की गई. संघ की जो सांगठनिक व्यवस्था है उसमें प्रतिनिधि सभा संघ की सर्वोच्च संस्था है. सैद्धांतिक तौर पर संघ में यह प्रावधान है कि सारे नीतिगत निर्णय प्रतिनिधि सभा में ही लिए जाएंगे. इस लिहाज से प्रति​निधि सभा की अहमियत का अंदाज लगाया जा सकता है.

संघ से जुड़े लोग बताते हैं कि प्रतिनिधि सभा में संघ की ओर से साल भर के कामकाज का लेखा-जोखा पेश किया जाता है. यहां तक कि सर संघचालक की बीते एक साल में क्या गतिविधि रही, इसे भी प्रतिनिधि सभा में शामिल होने वाले लोगों के सामने रखा जाता है. वहीं दूसरी तरफ संघ के जितने आनुषंगिक संगठन हैं, उनकी ओर से भी बीते एक साल के कामकाज का लेखा-जोखा यहां पेश होता है. केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी संघ का ही आनुषंगिक संगठन है. इस नाते इस बार की प्रतिनिधि सभा में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी की गतिविधियों का लेखा-जोखा रखा.

लोकसभा चुनावों को देखते हुए इस बार की प्रतिनिधि सभा को लेकर लोगों में काफी उत्सुकता थी. यह देखा जाना था कि लोकसभा चुनावों को लेकर संघ की सर्वोच्च संस्था प्रतिनिधि सभा का क्या रुख रहता है. प्रतिनिधि सभा में शामिल होने वाले लोग इस उम्मीद के साथ आए थे कि सर संघचालक मोहन भागवत लोकसभा चुनावों को लेकर उन्हें कुछ संकेत करेंगे.

संघ के एक सहयोगी संगठन की ओर से प्रतिनिधि सभा में शामिल हुए एक पदाधिकारी बताते हैं, ‘पिछले कुछ महीनों से संघ और इसके सहयोगी संगठनों में लगे लोगों में राजनीतिक नेतृत्व को लेकर भ्रम की स्थिति थी. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के जो बयान आ रहे थे उससे स्वयंसेवकों को यह समझ में नहीं आ रहा था कि क्या संघ का शीर्ष नेतृत्व उनके साथ है या हमें मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व के साथ ही आगे बढ़ना है.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘सर संघचालक ने किसी का नाम तो नहीं लिया लेकिन इतना जरूर कहा कि देश में यज्ञ होने वाला है और उसमें सभी स्वयंसेवकों को लगना है. यज्ञ से उनका तात्पर्य चुनाव से था. इसका मतलब यह है कि नेतृत्व की बात बाद में देखी जाएगी, पहले संघ स्वयंसेवकों को फिर से भाजपा को लोकसभा चुनावों में विजयी बनाने में लगना है.’

संघ के सह सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने लोकसभा चुनावों को लेकर संघ के स्वयंसेवकों और सहयोगी संस्थाओं की भूमिका को थोड़ा और स्पष्ट किया. उन्होंने संघ प्रतिनिधि सभा के दौरान पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘लोकसभा चुनावों में 100 फीसदी मतदान सुनिश्चित कराने के लिए संघ जागरूकता कार्यक्रम चलाएगा. देश हित में काम करने वाली सरकार के लिए संघ कार्यकर्ता काम करेंगे. मौजूदा मोदी सरकार देश के हित में काम कर रही है.’

होसबोले की बातों से यह स्पष्ट है कि संघ के स्वयंसेवकों को प्रतिनिधि सभा से मौजूदा सरकार के कामकाज का प्रचार-प्रसार करते हुए फिर से इसे चुने जाने के लिए माहौल बनाना है. दत्तात्रेय होसबोले ने सीधे-सीधे मोदी सरकार का नाम लिया. इसका मतलब यह है कि भाजपा जिस तरह से अपना चुनाव अभियान नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर चलाएगी, उसमें संघ की सहमति है और संघ कार्यकर्ता भी नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर ही लोगों के बीच अपनी बातें रखेंगे. संघ स्वयंसेवकों और सहयोगी संगठनों के बीच यह स्पष्टता नितिन गडकरी के बयानों की पृष्ठभूमि में बेहद अहम मानी जा रही है.

मोहन भागवत और दत्तात्रेय होसबोले की बातों से यह भी स्पष्ट है कि संघ स्वयंसेवक और उसके सहयोगी संगठन इस बार खुलकर सरकार के पक्ष में माहौल बनाते हुए भाजपा के लिए वोट मांगने का काम करेंगे. 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले हुई प्रतिनिधि सभा में मोहन भागवत ने कहा था कि हमारा काम नमो-नमो करना नहीं है. यहां नमो का तात्पर्य नरेंद्र मोदी से है. लेकिन इस बार वे कह रहे हैं कि देश में एक ‘यज्ञ’ हो रहा है और उसमें संघ कार्यकर्ताओं को लगना है.

लोकसभा चुनावों को लेकर भाजपा राष्ट्रवाद को लगातार मुद्दा बनाए हुए है. संघ की प्रतिनिधि सभा से यह स्पष्ट हो गया है कि इस मोर्चे पर संघ भाजपा का साथ देने वाला है. प्रतिनिधि सभा ने यह निर्णय लिया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के 75 साल पूरे होने पर संघ के कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर इसका प्रचार-प्रसार करेंगे. संघ भले ही यह नहीं कह रहा हो कि इसका मकसद भाजपा को चुनावी लाभ पहुंचाने का है लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों को यह लगता है कि इससे राष्ट्रवाद का मुद्दा गरमाए रखने में मदद मिलेगी और इसका फायदा भाजपा को होगा.

ऐसी ही भाजपा के प्रिय हिंदुत्व के मुद्दे पर भी संघ की प्रतिनिधि सभा ने पार्टी के अनुकूल प्रस्ताव पारित किया है. ‘हिन्दू समाज की परम्पराओं व आस्थाओं के रक्षण की आवश्यकता’ शीर्षक से पारित इस प्रस्ताव में सबरीमाला प्रकरण को एक षडयंत्र बताते हुए इसके खिलाफ हिंदू समाज के जागरण की बात कही गई है.

इस प्रस्ताव में केरल सरकार और वहां की सत्ताधारी सीपीएम के खिलाफ सीधे-सीधे आरोप लगाए गए हैं. इसमें कहा गया है, ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का यह सुविचारित मत है कि अभारतीय दृष्टिकोण के आधार पर हिन्दू आस्था और परंपराओं को आहत एवं इनका अनादर करने का एक योजनाबद्ध षड्यंत्र निहित स्वार्थी तत्त्वों द्वारा चलता आ रहा है. सबरीमला मंदिर प्रकरण इसी षड्यंत्र का नवीनतम उदाहरण है. सम्पूर्ण हिन्दू समाज आज एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का सामना कर रहा है. केरल की सत्तारूढ़ वाम मोर्चा सरकार, माननीय उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा पवित्र सबरीमला मंदिर में सभी आयुवर्ग की महिलाओं को प्रवेश के आदेश को लागू करने की आड़ में हिन्दुओं की भावनाओं को कुचल रही है.’

लोकसभा चुनावों के लिहाज से इसके दो मतलब निकाले जा रहे हैं. पहली बात तो यह कि इससे हिंदुत्व के मुद्दे की गति बनी रहेगी. वहीं दूसरी बात यह कही जा रही है कि दक्षिण भारत में इस बार भाजपा को सीटें बढ़ने की उम्मीद है और अगर संघ ने वहां उसे हिंदुत्व को मुद्दा बनाए रखने में मदद की तो उसे केरल समेत दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी ठीक-ठाक कामयाबी मिल सकती है.

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के मसले पर संघ की प्रतिनिधि सभा ने सरकार की आलोचना नहीं करते हुए देरी का ठिकरा न्यायपालिका पर फोड़ दिया. संघ की ओर से प्रतिनिधि सभा में पेश वार्षिक प्रतिवेदन में कहा गया है, ‘राम जन्मभूमि संबंधित चल रही न्यायिक प्रक्रिया गतिमान करते हुए एक बहु प्रतिक्षित विवाद समाप्त करने के स्थान पर न्यायालय का रवैया आश्चर्यजनक है . इस प्रकार के संवेदनशील और हिन्दू समाज की आस्था एवम राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक से संबंधित विषय सर्वोच्च न्यायालय को प्राथमिकता न लगना यह समझ के परे है. हिंदू समाज के राष्ट्रीय गौरव एवम पहचान की निरंतर उपेक्षा हो रही है ऐसा हम अनुभव कर रहे हैं. न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास व्यक्त रखते हुए यह आग्रहपूर्वक कहना चाहते हैं, कि शीघ्रता से इस विवाद का निर्णय करे और भव्य राम मंदिर निर्माण की बाधाएं दूर करे.’

इसका संकेत साफ है कि संघ के स्वयंसेवक और सहयोगी संगठन आम लोगों के बीच जाकर यह प्रचार करें कि राम मंदिर के निर्माण में देरी के लिए मोदी सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती बल्कि अदालत ने इस मसले को लटका रखा है. ऐसा करके वे उम्मीद कर सकते हैं कि राम मंदिर चुनावी मुद्दा बना रहे और भाजपा को चुनावी लाभ मिलता रहे.