ओएनजीसी के नौ बड़े तेल और गैस क्षेत्रों को निजी और विदेशी कंपनियों को बेचने की योजना सरकार के भीतर से ही विरोध के बाद छोड़ दी गई है. पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी है. बताया जा रहा है कि नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार की अध्यक्षता वाली उच्च अधिकार प्राप्त समिति ने पिछले साल इन क्षेत्रों को निजी/विदेशी कंपनियों को हस्तांतरित करने पर विचार किया था. इनमें मुंबई हाई, असम का ग्रेटर जोराजन और गेलेकी, राजस्थान का बाघेवाला और गुजरात के कलोल जैसे क्षेत्र शामिल थे.

नीति आयोग तथा सरकार के सूत्रों ने कहा कि ओएनजीसी के साथ-साथ सरकार के भीतर ही कुछ तबकों ने इस योजना का पुरजोर विरोध किया. इसके कारण देश के मौजूदा तेल और गैस उत्पादन में 95 प्रतिशत का योगदान करने वाले इन क्षेत्रों को निजी/विदेशी कंपनियों को नहीं दिया जा सका. ओएनजीसी का कहना था कि उसने पिछले चार दशकों तक मेहनत और अरबों डालर निवेश कर जो खोज की है उसे वह निजी/विदेशी कंपनियों को थाली में सजाकर नहीं दे सकती. उसकी यह भी दलील थी कि जो प्रौद्योगिकी निजी कंपनियां ला सकती हैं उसे वह भी ला सकती है. वहीं सरकार के भीतर भी कई इस बात से सहमत नहीं थे कि इससे उत्पादन की संभावना बढ़ेगी.

असल में यह समिति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गठित की थी. इसका मकसद था सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के पुराने पड़ चुके क्षेत्रों से उत्पादन बढ़ाने के उपाय तलाशना. सूत्रों के मुताबिक सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को सामान्य स्थिति में बढ़े हुए उत्पादन में 10 प्रतिशत हिस्सा मिलना था. समिति ने इसी साल 29 जनवरी को अपनी अंतिम रिपोर्ट दी थी.