अभी बीते हफ़्ते की ही बात है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से मध्य प्रदेश के तीन बड़े नेताओं - पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, विधानसभा में मौजूदा नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह को सीधे निर्देश जारी किया गया. उनसे कहा गया कि प्रदेश की सभी लोक सभा सीटों पर तीनों को एक साथ दौरे करना है. तीनों को हर लोकसभा क्षेत्र में दो ‘विजय संकल्प’ सभाएं करने को कहा गया, साथ ही कार्यकर्ताओं से संवाद भी. इन निर्देशों के बाद 10 मार्च को नीमच जिले से इस सिलसिले की शुरूआत भी हुई. लेकिन शुरू के तीन-चार दिनों के भीतर ही ऐसी ख़बरें आने लगी हैं कि कुछ विजय संकल्प सभाओं में तीनों नेता एक साथ नहीं भी होते.

अब सामान्य रूप से देखें तो इसमें कोई ख़ास बात नहीं दिखती. तीनों नेताओं की अपनी व्यस्तताएं हो सकती हैं जो बीच-बीच में कुछ व्यवधान डालती हों. इनमें भी शिवराज सिंह तो राष्ट्रीय क़द के नेता हैं. फिर भी प्रदेश की राजनीति जानने-समझने वाले इन ख़बरों के पीछे दूसरे कारण भी देखते हैं. इन्हीं में एक ये बताया जाता है कि जब से भाजपा मध्य प्रदेश की सत्ता से बाहर हुई है, पार्टी की राज्य इकाई और शिवराज सिंह चौहान एकराह नहीं हो पा रहे हैं. इसीलिए राष्ट्रीय नेतृत्व को तीनों नेताओं के एक साथ दौरे का निर्देश भी जारी करना पड़ा है.

ताे क्या धारणा का कुछ आधार भी है?

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर राजनीति के जानकारों में जो धारणा बन रही है उसके पीछे कोई आधार भी है? इस सवाल के ज़वाब के लिए बीते दो-तीन महीनों के कुछ अहम वाक़यों पर नज़र डाली जा सकती है. जैसे - चुनाव नतीज़ों के तुरंत बाद मीडिया से बातचीत में शिवराज ने हार की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर तो ले ली. लेकिन इसी दौरान उनसे जब पूछा गया, ‘क्या विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी आप ही होंगे?’ इस पर उनका ज़वाब था, ‘नेता प्रतिपक्ष रहूं या न रहूं, नेता तो रहूंगा ही.’ इसके कुछ समय बाद ही अपने निवास पर मिलने आए समर्थकों को भरोसा दिलाते हुए उन्होंने कहा, ‘तुम लोग चिंता मत करना, टाइगर अभी ज़िंदा है.’

फिर जनवरी के पहले पखवाड़े में दो अहम घटनाएं हुईं. पहली- मध्य प्रदेश में भाजपा विधायक दल के नेता के तौर पर आठ बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके गोपाल भार्गव को नेता प्रतिपक्ष चुन लिया गया. जबकि शिवराज सिंह अपने समर्थक राजेंद्र शुक्ल को इस पद पर बिठाना चाहते थे. फिर इसके दो-तीन दिन बाद ही शिवराज को केंद्र की राजनीति में ले आया गया. पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर. जबकि इससे पहले वे साफ तौर पर मध्य प्रदेश में ही रहने की अपनी मंशा जता चुके थे. इसके महज़ एक सप्ताह बाद ही शिवराज सिंह युवाओं के एक कार्यक्रम में कह रहे थे, ‘आप लोग यह मत समझना कि मामा (शिवराज के लिए युवाओं का लोकप्रिय संबोधन) कमजोर हो गया है.’

इसके बाद फरवरी में भी ऐसी दो-तीन घटनाएं हुईं. पहले तो प्रदेश नेतृत्व ने एक झटके में 11 जिलों के अध्यक्ष बदल दिए. इनमें भोपाल के सुरेंद्रनाथ सिंह सहित कई जिलाध्यक्ष शिवराज सिंह समर्थक थे. फिर लोक सभा चुनावों के लिए प्रदेश चुनाव प्रबंध समिति बनाई गई तो उसमें शिवराज सिंह चौहान का नाम 13वें नंबर पर (नीचे तस्वीर) रखा गया. यानी शिवराज को कई जूनियर नेताओं से भी नीचे जगह दी गई. अलबत्ता इस मामले को प्रदेश नेतृत्व ने ख़ुर्द-बुर्द करने की कोशिश की पर हुआ नहीं. मामला सुर्ख़ियों में आ गया.

इसके बाद प्रदेश कार्यालय में लोक सभा चुनाव की तैयारियाें से जुड़ी बैठक में शिवराज सिंह और गोपाल भार्गव के सुर अलग-अलग सुनाई दिए. सूत्र बताते हैं कि गोपाल भार्गव ने इस बैठक में ज़ोर देकर कहा, ‘विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार से कार्यकर्ता निराश हैं. उनमें जोश भरे जाने की ज़रूरत है.’ लेकिन जब शिवराज की बारी आई तो उन्होंने भार्गव की बात काट दी. उन्होंने कहा, ‘कोई निराश नहीं है. विधानसभा चुनाव में हमारा वोट प्रतिशत कांग्रेस से ज़्यादा रहा है. हमारी सीटें कम हुई हैं. वह भी नज़दीकी अंतर से. यह बात सभी जानते हैं. सभी कार्यकर्ता लोक सभा चुनाव में पूरे जोश से उतरेंगे और पिछला प्रदर्शन (2014 में 29 में से 27 सीटें जीती थीं) दोहराएंगे.’

अभी ये मामला शांत नहीं हुआ था कि दूसरा वाक़या हो गया. इस बार शिवराज सिंह और पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष रघुनंदन शर्मा आमने-सामने थे. इस बार हुआ यूं कि पहले तो शिवराज सिंह चौहान बैठक में देर से पहुंचे. इसके बाद उन्हाेंने जल्दी से भाषण दिया और रवाना हो गए. इस पर रघुनंदन शर्मा का सब्र ज़वाब दे गया. शिवराज के जाते ही उन्होंने उलाहना दिया, ‘लोग तो भाषण देकर चले गए. संगठन ने उन्हें जिम्मेदारी दी है तो पूरे समय बैठक में रहना चाहिए था.’ रघुनंदन इसके बाद भी शिवराज पर लगातार निशाना साध रहे हैं. वे सलाह दे रहे हैं, ‘शिवराज विधायक हैं. यदि पार्टी उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहती भी है तो उन्हें मना कर देना चाहिए. वे पार्टी से कहें कि मैं लोगों को जिताउंगा. अब मैं खुद नहीं लडूंगा.’ बताते चलें कि विदिशा लोक सभा सीट से शिवराज या उनकी पत्नी साधना सिंह को टिकट दिए जाने की अटकलें हैं.

इस धारणा का आधार बनाने में कहीं भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति की भूमिका तो नहीं?

यानी अगर प्रदेश भाजपा इकाई और शिवराज सिंह के अलग-अलग राह जाने की धारणा बन रही है तो वह बेवज़ह नहीं है. लेकिन यहीं दूसरा पहलू ये भी है कि शिवराज अब कोई प्रदेश स्तर के नेता नहीं. वे मध्य प्रदेश में 13 साल मुख्यमंत्री रहे हैं. भाजपा में लगातार सबसे ज़्यादा कार्यकाल तक मुख्यमंत्री रहने वाले कुछ गिनती के नेताओं में उनका नाम शुमार है. लोकप्रियता भी उनकी सिर्फ़ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है. तो फिर भला वे प्रदेश इकाई में किसी को अपना प्रतिद्वंदी क्यों मानेंगे? बस इसी सवाल में मौज़ूदा स्थिति का ज़वाब भी छिपा हो सकता है. वह भी पुख़्ता वज़हों के साथ. मसलन - 2013 में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया जाना था तब शिवराज ही थे जो उन्हें चुनौती देते नज़र आए थे. वह भी उस वक़्त पार्टी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी के समर्थन से.

हालांकि बाद में बाज़ी नरेंद्र मोदी के हाथ रही. आडवाणी परदे के पीछे चले गए या कहें कि भेज दिए गए और शिवराज को नरेंद्र मोदी-अमित शाह का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ा. लेकिन नरेंद्र मोदी सही मायनों में शिवराज को स्वीकार कर पाए या नहीं, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. दरअसल नरेंद्र मोदी के बारे में आम धारणा है कि वे कभी भी अपने प्रतिद्वंद्वियों को छोड़ते नहीं हैं. इस बात को उन सुने-सुनाए आकलनों से भी बल मिलता है जो मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद सामने आए. इनमें कहा जा रहा है कि भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने ही मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए ज़्यादा जोर नहीं लगाया. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ज़्यादा रैलियां भी नहीं कीं.

केंद्र सरकार ने किसानों के लिए किसान सम्मान निधि और आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्गों के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण दिए जाने जैसे कदम भी विधानसभा चुनावों के बाद उठाए. जबकि जानकारों का मानना हैं कि ये कदम अगर विधानसभा चुनावों से पहले उठा लिए जाते और नरेंद्र मोदी थोड़ा और जोर लगा देते तो कम से कम मध्य प्रदेश में तो भाजपा की सरकार बच सकती थी. क्याेंकि यहां फिर भी भाजपा का वोट प्रतिशत कांग्रेस से ज़्यादा है और सीटें (109) बहुमत से सिर्फ सात कम. अलबत्ता मध्य प्रदेश सरकार के बच जाने का दूसरा असर ये भी होना तय था कि नरेंद्र मोदी के लिए शिवराज सिंह गंभीर चुनौती बन चुके होते. जो कि फिलहाल नहीं हैं. और शायद यही वज़ह हो सकती है कि वे मौके-बेमौके दिए बयानों से या कुछ कामों से ख़ुद काे सबसे अलग, सबसे ऊपर बताने की कोशिश भी कर रहे हैं.

अब रही बात प्रदेश नेतृत्व की तो यह भी जाना-समझा तथ्य है कि राज्य इकाई के मौज़ूदा अध्यक्ष राकेश सिंह पर अमित शाह का वरदहस्त है. और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें समझौताजन्य प्रत्याशी के तौर पर प्रदेश इकाई की कमान दी गई थी. वे शिवराज सिंह की स्वाभाविक पसंद नहीं थे. सो, अब उस पूरे ‘भूत का असर वर्तमान में’ दिखना तो स्वाभाविक ही है. संभवत: यही मध्य प्रदेश में हो भी रहा है. लेकिन इससे लोक सभा चुनाव में पार्टी की संभावनाओं पर भी असर पड़ सकता है. शायद इसीलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने अभी हाल ही में शिवराज को साफ ताक़ीद की है, ‘विधानसभा चुनावों की तरह लोकसभा चुनाव में चूक नहीं होना चाहिए.’

हालांकि इस ताक़ीद का कुछ असर होता है या नहीं, यह लोक सभा चुनाव के नतीज़ों से ही साफ हो पाएगा.