लोकसभा चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार किए गए कार्यक्रम पर अलग-अलग राय जानने को मिल रही हैं. सत्तारूढ़ भाजपा ने इस कार्यक्रम का स्वागत किया है. लेकिन विपक्ष के कुछ दलों ने इस पर सवाल खड़े किए हैं. इनमें वे क्षेत्रीय दल विशेष रूप से शामिल हैं जिनके राज्यों में एक से ज़्यादा चरणों के तहत मतदान होना है.

ओडिशा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल (बीजद) का आरोप है कि भाजपा को फ़ायदा पहुंचाने के लिए राज्य में चार चरणों के तहत मतदान कार्यक्रम रखा गया है. पार्टी प्रवक्ता अमर पटनायक ने दलील दी है कि ओडिशा में 21 लोकसभा सीटें हैं, जबकि आंध्र प्रदेश और गुजरात में उससे ज़्यादा सीटें (क्रमशः 25 और 26) हैं, फिर क्यों ओडिशा में चार और इन दोनों राज्यों में एक चरण का कार्यक्रम बनाया गया.

सात चरणों पर चर्चा ज़्यादा

चुनाव कार्यक्रम को लेकर ज़्यादा बड़ी आपत्तियां बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आ रही हैं जहां सात-सात चरणों में मतदान होना है. यह इस आम चुनाव के मतदान की सबसे लंबी प्रक्रिया है. कई राजनेताओं समेत राजनीतिक जानकारों के एक वर्ग ने भी इतने चरणों में चुनाव कराने को लेकर सवाल किए हैं.

उत्तर प्रदेश के लिए कहा जा रहा है कि भाजपा के लिए इस बार पिछला प्रदर्शन (73 सीटें) दोहराना संभव नहीं होगा. पिछले साल विधानसभा और लोकसभा उपचुनावों में मिली हार से इसके संकेत मिलने लगे थे. वहीं, सपा-बसपा के औपचारिक गठबंधन और प्रियंका गांधी के राजनीतिक आगमन से यह लड़ाई सत्तारूढ़ दल के लिए और मुश्किल होने जा रही है.

लेकिन उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग जीते बिना भाजपा की केंद्र में वापसी मुश्किल हो जाएगी. इसी आधार पर आरोप लगाया जा रहा है कि पिछली बार छह चरणों में कराया गया लोकसभा चुनाव का मतदान, इस बार सात चरणों का कर दिया गया है, ताकि भाजपा को प्रचार के लिए ज़्यादा से ज़्यादा समय मिल सके.

वहीं दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग के इस फ़ैसले का स्वागत भी किया जा रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक़ मांग के अनुसार सुरक्षा न मिल पाने की संभावना की वजह से चुनाव सात चरणों में कराने का फ़ैसला किया गया है, ताकि मतदान केंद्रों पर पर्याप्त मात्रा में सुरक्षा बल तैनात किए जा सकें. इसके लिए राज्य की 80 लोकसभा सीटों का भी हवाला दिया गया है.

बिहार-पश्चिम बंगाल में इतने चरण क्यों?

लेकिन बिहार और पश्चिम बंगाल में लोकसभा सीटें (क्रमशः 40 और 42) उत्तर प्रदेश के मुकाबले आधी हैं. फिर क्यों इन राज्यों में उत्तर प्रदेश की तरह सात चरण रखे गए हैं. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता शिवानंद तिवारी का कहना है कि इतनी लंबी अवधि वाले चुनावी कार्यक्रम से (केंद्र में बैठे) सत्तारूढ़ दल को फ़ायदा मिलता दिखता है. तिवारी के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी के चुनावी भाषणों को न्यूज़ चैनल एक-एक घंटे तक लाइव दिखाते हैं, जबकि अन्य दलों को इतना समय नहीं दिया जाता.

नरेंद्र मोदी भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता और स्टार प्रचारक हैं. चुनाव के मद्देनज़र वे देशभर में कई सारी रैलियां करेंगे. इनमें बिहार की रैलियां भी शामिल हैं. यह देखने में आया है कि न्यूज़ चैनल प्रधानमंत्री की रैलियों और भाषणों को जितना टाइम देते हैं, उतना किसी और दल या नेता को नहीं मिलता. ऐसे में ज़्यादा चरणों की वजह से देश की जनता से संवाद स्थापित करने में मोदी को अन्य नेताओं के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा मौक़ा मिलेगा. शायद इसीलिए शिवानंद तिवारी ने चुनाव आयोग से शिकायत करने का फ़ैसला किया है कि न्यूज़ चैनल प्रधानमंत्री के लंबे भाषणों को लाइव न दिखाएं.

एक स्थानीय चैनल से बात करते हुए तिवारी ने कहा है, ‘बंगाल में (पिछली बार) पांच चरणों में चुनाव हुआ, इस बार सात चरणों में करा रहे हैं. 28 सीटों वाले कर्नाटक में आपने पिछली बार एक चरण में चुनाव करा दिया. अब दो चरण में करा रहे हैं. उधर, तमिलनाडु में 39 सीटें हैं, वहां आप एक ही चरण में करा रहे हैं. बिहार में पिछली बार छह चरण में चुनाव हुआ, इस बार सात में हो रहा है. ऐसा क्यों?’

सवाल पश्चिम बंगाल को लेकर भी हैं? जानकार पूछते हैं कि जब महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों पर चार चरणों में और तमिलनाडु की 39 सीटों पर केवल एक चरण में चुनाव कराया जा सकता है तो पश्चिम बंगाल की 42 और बिहार की 40 सीटों के लिए सात चरणों की आवश्यकता क्यों पड़ रही है. कुछ लोगों ने जनसंख्या और क्षेत्रफल के आधार पर भी सवाल उठाए हैं.

महाराष्ट्र में मतदाताओं की संख्या आठ करोड़ 70 लाख से ज़्यादा है और उसका क्षेत्रफल तीन लाख सात हज़ार वर्ग किलोमीटर है. वहीं, पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या साढ़े छह करोड़ और इसका क्षेत्रफल 88,752 वर्ग किलोमीटर है. यहां चुनावी कार्यक्रम को लेकर नक्सलवाद का तर्क दिया नहीं जा सकता, क्योंकि ये दोनों राज्य इस मामले में एक जैसी चुनौती का सामना कर रहे हैं. दोनों के केवल तीन-तीन ज़िले ही नक्सल प्रभावित हैं.

तीन-चार चरणों में चुनाव होते तो सही होता

स्वराज पार्टी के नेता और जाने-माने चुनाव विशेषज्ञ रहे योगेंद्र यादव पश्चिम बंगाल के लिए कहते हैं, ‘सारा देश जानता है कि पश्चिम बंगाल पर भाजपा की निगाह है. 2014 की तुलना में भाजपा अगर कहीं बेहतर कर सकती है तो ओडिशा और पश्चिम बंगाल में कर सकती है. बंगाल में वह ब्रेक थ्रू (बड़ा उलफफेर) चाहती है.’ इसके बाद चुनाव चरणों को लेकर योगेंद्र कहते हैं, ‘इससे संदेश यह जाता है कि (चुनाव कार्यक्रम बनाते वक़्त) भाजपा की सहूलियत को ध्यान में रखा गया हो... अगर पश्चिम बंगाल में तीन-चार चरणों में चुनाव होते तो सही होता.’

योगेंद्र यादव यह भी पूछते हैं कि जब मध्य प्रदेश में विधानसभा का मतदान एक ही चरण में निपटाया जा सकता है, तो लोकसभा चुनाव का मतदान चार चरणों में क्यों कराया जा रहा है. इस आधार पर राजस्थान के मामले में भी सवाल बनता है. वहां भी विधानसभा चुनाव का मतदान एक दिन में संपन्न हुआ था. लेकिन 25 लोकसभा सीटों के लिए दो चरणों में चुनाव कराया जा रहा है.

वहीं, कुछ जानकार आचार संहिता के हवाले से भी सात चरणों में मतदान कराने को लेकर आपत्ति जता रहे हैं. उनका कहना है कि ज़्यादा समय तक चुनावी माहौल बने रहने से आचार संहिता के उल्लंघन की संभावना बनी रहती है. ग़ौरतलब है कि लोकसभा की 162 सीटें केवल इन तीन राज्यों से आती हैं. ज़ाहिर है, ऐसे में प्रचार अभियान न सिर्फ़ अधिक होगा, बल्कि मनमाना और उग्र भी हो सकता है.

हाल के सालों के चुनावों में जिस तरह राजनीतिक दलों के प्रचार का तरीक़ा निचले स्तर का रहा है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग के लिए आचार संहिता को प्रभावपूर्ण बनाए रखना एक चुनौती होगी जो सात चरणों की वजह से और बड़ी हो गई है.