केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद से लगातार मोदी सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगता रहा है. इन संस्थाओं में संसद भी शामिल है. पांच साल पहले प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने संसद के दरवाजे पर सिर टिकाकर इसे ‘लोकतंत्र का मंदिर’ बताया था. लेकिन कई लोगों के मुताबिक अपने कार्यकाल में मोदी सरकार ने कई ऐसे कदम उठाए हैं, जो उनकी इस भावना के साथ जाते नहीं दिखते हैं. इसका एक उदाहरण कई विधेयकों को सामान्य की जगह धन विधेयक के तौर पर संसद में पेश करना भी है. उदाहरण के तौर पर साल 2016 में आधार विधेयक को धन विधेयक के रूप में पेश किया गया था. संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक यदि धन विधेयक को राज्यसभा 14 दिनों के भीतर पारित नहीं करती है तो इसे संसद द्वारा पारित मान लिया जाता है. इसके अलावा सरकार द्वारा अध्यादेशों के जरिए कई कानूनों को लागू करवाना भी ऐसे ही कदमों में शामिल है.

संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद राष्ट्रपति किसी अध्यादेश को जारी कर सकते हैं. इसे उसी स्थिति में लाया जा सकता है जब किसी कानून को तत्काल लागू करने की जरूरत हो और संसद का सत्र न चल रहा हो. किसी अध्यादेश को लागू किए जाने के बाद इसे अगले संसदीय सत्र के पहले छह हफ्तों के भीतर ही लागू करवाना अनिवार्य होता है. ऐसा न होने पर अध्यादेश को रद्द माना जाता है.

बीते करीब सात दशकों का संसदीय इतिहास बताता है कि संसद को हाशिए पर डाल कर अध्यादेश के जरिए किसी कानून को लागू करने में केवल मोदी सरकार ही आगे नहीं रही है. इससे पहले की करीब सभी सरकारें कभी शर्माते तो कभी दनदनाते हुए कानून के इस ‘बाइपास रास्ते’ पर चलती रही हैं. मोदी सरकार के बारे में कहा जा सकता है कि उसने राज्यसभा में बहुमत न होने की वजह से ऐसा किया होगा. लेकिन इसके बावजूद अध्यादेशों को लेकर मोदी सरकार के रिकॉर्ड कुछ मायनों में अभूतपूर्व कहना गलत नहीं होगा.

साल 1952 से 2014 तक अलग-अलग सरकारों में अध्यादेशों की संख्या | साभार : पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च
साल 1952 से 2014 तक अलग-अलग सरकारों में अध्यादेशों की संख्या | साभार : पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च

पिछली सरकार की तुलना में दोगुने अध्यादेश

मई, 2014 में केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद पहले ही साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पांच अध्यादेशों को मंजूरी दे दी. विपक्षी दलों द्वारा इसके लिए सरकारी की तीखी आलोचना किए जाने पर तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री वैंकेया नायडू का कहना था कि उनकी सरकार को अध्यादेश लाने की सनक सवार नहीं है. उन्होंने इसे लेकर विपक्ष पर ही निशाना साधते हुए कहा था कि वह संसद को ठीक ढंग से काम करने दे. लेकिन अपने कार्यकाल के अंत में सिर्फ 2019 के सिर्फ दो ही महीनों में मोदी सरकार कुल नौ अध्यादेश ला चुकी है. इससे पहले साल 2018 में मंजूर किए गए अध्यादेशों की संख्या आठ थी.

कानून और न्याय मंत्रालय, पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च से जुटाई गई जानकारी के मुताबिक मौजूदा मोदी सरकार के कार्यकाल में मंजूर किए गए अध्यादेशों का आंकड़ा 48 तक पहुंच गया है. यह संख्या पिछली यूपीए सरकार (2009-14) की तुलना में करीब दोगुनी है. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार में सिर्फ 25 अध्यादेश लाए गए थे और यूपीए-1 में 36. साल 1952 से अब तक केवल इंदिरा गांधी और पीवी नरसिम्हा राव की सरकारों ने ही अध्यादेशों के मामले में मोदी सरकार का आंकड़ा पार किया है.

साल 2017 में मंजूर किए गए अध्यादेश | साभार : कानून और न्याय मंत्रालय
साल 2017 में मंजूर किए गए अध्यादेश | साभार : कानून और न्याय मंत्रालय

इंदिरा गांधी के समय पांचवीं लोकसभा (1971-77) में 99 अध्यादेशों को मंजूरी दी गई थी. इस अवधि के दौरान देश को करीब पौने दो वर्षों के आपातकाल से भी गुजरना पड़ा था. इस दौरान इंदिरा गांधी की सरकार ने अध्यादेशों के जरिए संविधान में कई बदलाव किए थे. इसके बाद साल 1980 से 84 के दौरान भी उनकी सरकार में अध्यादेशों की संख्या 58 तक पहुंच गई थी. वहीं, देश की अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने का श्रेय हासिल करने वाली पीवी नरसिम्हा की सरकार (1991-96) ने 77 अध्यादेशों पर राष्ट्रपति से मुहर लगवाई थी. इसके अलावा 1996 से 1998 के दौरान एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की गठबंधन वाली सरकारों ने संसद में विधेयकों से अधिक अध्यादेशों को मंजूरी दी थी. इन सरकारों ने केवल 61 विधेयकों पर संसद की मुहर लगवाई थी लेकिन इनके दौरान कुल मिलाकर 77 अध्यादेशों को मंजूरी दी गई. अब तक आजाद भारत में कुल 684 अध्यादेशों को मंजूरी दी गई है.

एक ही अध्यादेश को बार-बार लागू करना

संसद की मंजूरी के बिना एक ही कानून को बार-बार अध्यादेश के जरिए लागू करने की प्रवृत्ति मोदी सरकार के दौरान कई बार दिखी है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण शत्रु संपत्ति (संशोधन) अध्यादेश है. साल 2016 में इस पर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कुल पांच बार हस्ताक्षर किए थे. इसके अलावा भूमि अधिग्रहण से संबंधित अध्यादेश (2014-15), जीएसटी (जम्मू-कश्मीर पर विस्तारण) अध्यादेश (2017), निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (संशोधन) अध्यादेश और तीन तलाक पर अध्यादेश (2018-19) के मामले में भी एक से अधिक बार राष्ट्रपति की मंजूरी ली गई है.

साल 2016 में शत्रु संपत्ति (संशोधन) अध्यादेश को कुल पांच बार मंजूरी दी गई | साभार : कानून और न्याय मंत्रालय
साल 2016 में शत्रु संपत्ति (संशोधन) अध्यादेश को कुल पांच बार मंजूरी दी गई | साभार : कानून और न्याय मंत्रालय

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बार-बार अध्यादेश लाने को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी भी जाहिर की थी. जनवरी, 2015 में उन्होंने कहा था कि संविधान में अध्यादेश जारी करने को लेकर सरकार के पास सीमित शक्तियां हैं. हालांकि इसके साथ ही उन्होंने संसद को न चलने देने के लिए विपक्ष को भी फटकार लगाई थी. इसके बाद 2017 में अपने विदाई संबोधन के दौरान भी उन्होंने सरकार को चेताया था. तब उनका कहना था कि अध्यादेश को संसद की जगह नहीं लेने देना चाहिए. हालांकि, केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रपति के तौर पर खुद प्रणब मुखर्जी का रिकॉर्ड भी उनकी नाराजगी के उलट तस्वीर दिखाता है.

जनवरी, 2017 में सुप्रीम कोर्ट भी अपने द्वारा खारिज किए गए अध्यादेश को फिर से लाने को संसद के साथ धोखा बता चुका है. अपने फैसले में उसने कहा था कि अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश पर लिया गया फैसला न्यायिक समीक्षा के बाहर नहीं है.

एक से अधिक बार अध्यादेश लाने के बाद भी संसद की मंजूरी नहीं

शत्रु संपत्ति कानून में संशोधन को लेकर पांचवीं बार अध्यादेश लाने के बाद साल 2017 में इसे संसद की मंजूरी मिल गई. साथ ही, जीएसटी (जम्मू-कश्मीर पर विस्तारण) अध्यादेश (2017), निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (संशोधन) अध्यादेश को भी बाद में राज्यसभा और लोकसभा ने अपनी मंजूरी दे दी. लेकिन भूमि अधिग्रहण और तीन तलाक से संबंधित अध्यादेशों को अब तक कानून का रूप नहीं दिया जा सका है.

भूमि अधिग्रहण से संबंधित अध्यादेश को दो बार लाने के बाद सरकार साल 2015 में ही इससे अपना पैर खींच चुकी थी. इन अध्यादेशों का विपक्ष के साथ-साथ कई सामाजिक संस्थाओं ने भी भारी विरोध किया था. वहीं, तीन तलाक पर सितंबर, 2018 में अध्यादेश लाने के बाद सरकार इसे शीतकालीन सत्र में राज्यसभा से पारित करवाने में नाकाम रही. इसके बाद केंद्रीय कैबिनेट ने एक बार फिर इससे संबंधित अध्यादेश को फरवरी, 2019 में मंजूरी दे दी. अब इस अध्यादेश को मई-जून में नई सरकार बनने के बाद संसद के पहले सत्र में पेश किया जा सकता है.

साल 2015 में मंजूर किए गए अध्यादेश | साभार : कानून और न्याय मंत्रालय
साल 2015 में मंजूर किए गए अध्यादेश | साभार : कानून और न्याय मंत्रालय

इनके अलावा मोदी सरकार के दौरान कई अन्य अहम अध्यादेशों को भी संसद की मंजूरी नहीं मिल पाई. इनमें नागरिकता (संशोधन) अध्यादेश-2015 और मोटर व्हीकल (संशोधन) अध्यादेश-2015 शामिल हैं. इन्हें अध्यादेश के रूप में संसद की मंजूरी न मिलने पर विधेयक के रूप में लाया गया था. लेकिन राज्यसभा से इन्हें फिर भी पारित नहीं कराया जा सका. 16वीं लोकसभा का आखिरी सत्र खत्म होने के बाद अब इन्हें अगली लोकसभा में फिर से फिर पेश करना होगा. और इन्हें पारित कराना तीन तलाक की तरह मौजूदा सरकार के नहीं बल्कि, नई सरकार के हाथों में होगा.