लेखक-निर्देशक : रितेश बत्रा

कलाकार : नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सान्या मल्होत्रा, फर्रुख जफर, गीतांजलि कुलकर्णी, विजय राज, जिम सार्ब

रेटिंग : 3.5/5

रितेश बत्रा की ज्यादातर फिल्मों में दो अजनबी किरदार अजीबो-गरीब परिस्थितियों में मिलते हैं और उनके दूर-दूर रहकर या करीब आकर तय किए गए साझा सफर की ही दास्तान धीमी आंच पर सुलगती कहानियां बनती हैं. ‘द लंचबॉक्स’ (2013) में साजन फर्नांडिस और शादीशुदा इला बिना मिले ही भोजन और खतों में लिखी बातों के चलते करीब आए थे और फिर एक न भुलाए जा सकने वाले सिनेमाई सफर पर हमें ले गए थे.

‘द लंचबॉक्स’ के बाद रितेश बत्रा ने एक ब्रिटिश व एक अमेरिकी फिल्म भी बनाई. इनमें से नेटफ्लिक्स के लिए बनाई ‘अवर सोल्स एट नाइट’ (2017) में भी दो अजनबी बुजुर्ग अजीबो-गरीब परिस्थिति में साथ आते हैं और जिंदगी का आखिरी पड़ाव साथ गुजारने की यात्रा पर निकलते हैं. रॉबर्ट रेडफोर्ड और जेन फोंडा द्वारा निभाए गए ये बुजुर्ग किरदार लगभग चालीस सालों से एक-दूसरे के पड़ोसी हैं लेकिन हमेशा एक-दूसरे से अंजान रहे थे. अपने-अपने साथी के गुजर जाने के कई बरस बाद एक दिन वे बिस्तर पर साथ सोने का फैसला लेते हैं, क्योंकि उनके अनुसार इस उम्र में रात काटना सबसे मुश्किल काम है.

रितेश बत्रा की सिनेमाई स्टाइल इस प्यारी फिल्म में भी ठहराव वाला सिनेमा ही रचती है जिसमें चीजें कम घटित होती हैं, सामान्य घटनाओं का दोहराव होता है, नयी-निराली मशीनों व गैजेट्स से इंसान दूर रहता है, नॉस्टेल्जिया एक सतत थीम बनता है और सिनेमा अपने मिनिमलिस्ट रूप में मौजूद मिलता है.

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‘फोटोग्राफ’ भी इन्हीं रितेश बत्रा की ऐसी ही फिल्म है. मिनिमलिज्म की बात करें तो ‘द लंचबॉक्स’ से भी दूर होकर ‘अवर सोल्स एट नाइट’ के करीब की फिल्म है. ‘द लंचबॉक्स’ फिर भी बॉलीवुड के करीब की फिल्म थी जिसमें नवाज तथा आंटी जैसे पात्रों के बहाने ह्यूमर भी जोड़ा गया था और हिंदी गानों को उपयोग करने का तरीका भी मनोरंजन पैदा करता था. ‘फोटोग्राफ’ दो अकेले-उदास नायक व नायिका की ऐसी कथा है (असल में परी-कथा) जिसमें बॉलीवुड के सिनेमाई क्लीशे लेशमात्र भी मौजूद नहीं हैं और मेडिटेटिव व मिनिमलिस्ट होकर यह बॉलीवुड में बनने वाले सिनेमा का विलोम भी है.

आज के बाजारू समय में इस मिजाज की इंडी फिल्में हमारे यहां कोई नहीं बनाता. ‘सोनचिड़िया’ जैसी उम्दा फिल्म कोई नहीं देखता, ‘टोटल धमाल’ जैसी चूरन फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर धमाल करती है और ‘द इनविजिबल गेस्ट’ की तकरीबन सीन दर सीन नकल कर लेने के बावजूद ‘बदला’ की वाहवाही होती है. इसलिए कम से कम सिनेमेटिक संसाधनों में सिनेमा रचने का रितेश बत्रा का जुनून देखकर बेहद खुशी होती है कि चलो कोई तो मजबूत विचारधारा और विलक्षण विजन का फिल्मकार है, जिसे बॉक्स-ऑफिस पर सफल होने की चिंता नहीं है. हिंदी फिल्में बनाने वाला कोई निर्देशक तो है जिसका सिनेमा देखकर ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन एनातोलिया’ जैसी धीमी गति की महान फिल्म और उसके महान निर्देशक नूरी बिल्गे (Nuri Bilge Ceylan) की याद आती है. कोई तो है जिसकी फिल्म के अधूरेपन में भी सौन्दर्य मौजूद होता है और जिसे सुखांत का लालच नहीं होता.

और फिर, कोई तो है जिसे विश्वास है कि दर्शक खुद चलकर उसकी फिल्म तक पहुंचेंगे, न कि उसकी फिल्म को सस्ते तरीके अख्तियार कर दर्शकों पर चढ़ाई करनी होगी.

‘फोटोग्राफ’ में रफी (नवाज) और मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) नाम के दो अजनबी एक फोटोग्राफ की वजह से करीब आते हैं. गरीब फोटोग्राफर रफी शादी के लिए पीछे पड़ी अपनी दादी (फर्रुख जफर) को टालने के लिए मिलोनी की खींची तस्वीर भेजकर कहता है कि वह उससे शादी करने वाला है. इस झूठ को छिपाने के लिए अजनबी मिलोनी उसकी मदद करने को तैयार हो जाती है क्योंकि रफी की गेटवे ऑफ इंडिया पर खींची उसकी तस्वीर में उसे वो मिलोनी मिलती है जो सीए बनने की गर्दनकाट स्पर्धा में उससे कभी मिली ही नहीं थी. दादी की तसल्ली के लिए मिलते-मिलते फिर ये दो अकेले, उदास, अंतर्मुखी नायक-नायिका करीब आते हैं और धर्म व सामाजिक ऊंच-नीच की बंदिशों को नकारकर एक साझा सफर पर निकलते हैं.

इस सफर में संपूर्णता नहीं है और अधूरापन अपने पूरे सौन्दर्य के साथ मौजूद है. जिन दर्शकों को हिंदी फिल्मों के क्लाइमेक्स में सारी परेशानियों का ‘निराकरण’ देखना पसंद है, हैप्पी - या फिर सैड ही - एंडिंग हर फिल्म की जरूरत मालूम होती है, उनके लिए ‘फोटोग्राफ’ एक नए तरह के सिनेमा से रूबरू होने का मौका भी है. रितेश बत्रा की बाकी फिल्मों की तरह यहां भी उन उपन्यासों की तरह कहानी आगे बढ़ती है जो अपने में सबकुछ समेटना नहीं चाहते, अधूरेपन को अपनी विशेषता बनाते हैं, और जिनके इमोशन्स का एब्सट्रेक्ट होना पढ़ने वालों को अजीब तरह के खालीपन से भर देता है.

ये भी कितना दिलचस्प है कि बत्रा की अमेरिकी फिल्म ‘अवर सोल्स एट नाइट’ जहां इसी नाम के नॉवेल पर आधारित थी और इसीलिए भी फिल्म में ठहराव और मिनिमलिज्म का उपयोग उपन्यास के मिजाज का मालूम होता था, वहीं ‘फोटोग्राफ’ खुद बत्रा की लिखी कहानी-पटकथा पर आधारित है. एक हिंदुस्तानी निर्देशक पटकथा भी इंटिमेट और ठहराव में डूबे उपन्यास की तरह लिखता है, क्या ये अलहदा बात नहीं है?

‘फोटोग्राफ’ खूबसूरत लम्हों में भीगी हुई एक सिनेमाई कविता भी है. बारिश के दृश्यों में, धीमी गति से घूमते पंखे में, पायल पहनी नौकरानी के पैरों को फ्रेम बनाते वक्त, कैंपा-कोला के लिए दर-दर भटकते कदमों का पीछा करते हुए, मां-बाप की चिंतित बातें छिपकर सुनते वक्त पांवों पर पड़ते उजाले को कैप्चर करते हुए, और शोर में डूबी रहने वाली मुंबई में शांत लम्हों को परदे पर कैद करते वक्त यह फिल्म जैसे शांत, स्थिर चित्रों की लंबी श्रृंखला हमारी नजर करती है.

वर्गभेद की जिस थीम को आजकल जोया अख्तर बखूबी एक्सप्लोर कर रही हैं उसके खुरदरेपन को भी ‘फोटोग्राफ’ कुशलता से परदे पर उकेरती है. रफी से मिलने के बाद घर पर काम करने वाली नौकरानी (बेहद प्रभावी गीतांजलि कुलकर्णी) के प्रति बदले मिलोनी के बर्ताव से लेकर टीन की एक चॉल में रह रहे चार-पांच दोस्तों की संघर्षरत जिंदगी तक के माध्यम से फिल्म हमारे महानगरों के ‘क्लास डिफरेंस’ को मारकता के साथ प्रस्तुत करती है. वर्गभेद के साथ वर्णभेद पर भी बात करती है, जब नवाज के रंग के बहाने काले रंग को लेकर हमारे समाज की सोच को ठीक-ठीक आईना दिखाती है.

नवाज को काफी लंबे वक्त बाद अपने किसी किरदार को अंडरप्ले करना था और भावनाओं को नियंत्रित होकर व्यक्त करना था. हाल के मंटो व ठाकरे जैसे लार्जर देन लाइफ किरदारों के इतर उन्हें रफी में साधारणता कूट-कूटकर भर देनी थी और यकीनन फिल्म देखकर आपको उनसे कोई शिकायत नहीं होती. उनके उदास, असफल, महीने में एक कुल्फी खाने वाले साधारण किरदार से आप तुरंत जुड़ जाते हैं और खुद को साधारण बना लेने वाली उनकी काबिलियत के कायल होते हैं.

उनके अभिनय में कुछ कमी-बेशी जरूर महसूस होती है, और वह शायद इसलिए कि इस फिल्म की असली नवाज सान्या मल्होत्रा मालूम होती हैं! मिलोनी के रूप में सान्या उदासी, अकेलेपन, खुद को नहीं जान पाने की टीस को अद्भुत अंदाज में व्यक्त करती हैं. परिवार द्वारा अव्वल आने का बोझ उनके किरदार पर इतना ज्यादा है कि यह सिस्टमेटिक प्रेशर ऐसे दमन का रूप ले लेता है जिसमें यह किरदार अपनी पसंद का रंग तक नहीं बता पाता. सान्या ऐसे किरदार को आत्मा और शरीर दोनों देती हैं.

फिल्म के शुरुआती लगभग 25-30 मिनट तक सान्या का कोई संवाद ही नहीं है, और बाद में भी जितने हैं वे इतने कम हैं कि नहीं भी होते तो भी सान्या उन दृश्यों में अपनी आंखों और सपाट चेहरे के चलते दर्शकों से संवाद स्थापित कर ही लेतीं. ‘दंगल’ और ‘पटाखा’ में अपने हुनर से हमें विस्मत कर देने के बाद इस सामान्य रंग-रूप की अदाकारा ने ‘फोटोग्राफ’ में असाधारण काम किया है.

फर्रुख जफर के लिए भी ‘फोटोग्राफ’ देखिएगा. ‘स्वदेश’ वाली अम्मा याद हैं न, जिन्होंने उस फिल्म के एनआरआई नायक को यह कहकर परिभाषित किया था - ‘अपने ही पानी में पिघल जाना बर्फ का मुकद्दर होता है’. यही जहीन अदाकारा ‘फोटोग्राफ’ में अजनबी नायक और नायिका की उदास जिंदगी को एक फ्रेम में लाकर खूबसूरत बनाने की वजह बनती हैं.

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