लोकसभा चुनावों में पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को होना है. इस लिहाज से देखें तो पहले चरण के चुनावों में महीने भर से भी कम का वक्त बचा है. लेकिन अगर कांग्रेस की अब तक की रणनीति को देखें तो कहा जा सकता है कि उसकी चुनावी तैयारियां अभी तक भी पटरी पर नहीं आई हैं.

गठबंधन पर भ्रम

लोकसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस की तैयारियों की सबसे बड़ी दिक्कत यह दिख रही है कि अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि वह किस राज्य में किस पार्टी के साथ मिलकर लड़ेगी. दिल्ली और उत्तर प्रदेश में इन राज्यों के दलों के साथ कांग्रेस के गठबंधन की बातचीत अब भी चल रही है. लेकिन इस बातचीत के बावजूद कुछ सीटों पर कांग्रेस अपने उम्मीदवारों की घोषणा करती जा रही है. हालांकि, पिछले कुछ दिनों में कुछ राज्यों में कांग्रेस गठबंधन की तस्वीर साफ हुई है. इनमें तमिलनाडु और कर्नाटक का नाम लिया जा सकता है.

गठबंधन को लेकर जिन राज्यों में स्थानीय पार्टी को लेकर स्पष्टता है, वहां दिक्कत यह है कि सीटों की संख्या और किस सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार लड़ेंगे, इसे लेकर स्पष्टता नहीं है. बिहार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. वहां राष्ट्रीय जनता दल के साथ कांग्रेस लंबे समय से गठबंधन में है. लेकिन अब तक सीटों की संख्या और सीटों की पहचान को लेकर दोनों पार्टियों के बीच सहमति नहीं बनी है. जबकि पहले चरण में बिहार में भी लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. इस वजह से इन सीटों पर कांग्रेस का चुनाव अभियान नहीं खड़ा हो पा रहा है. यही स्थिति कुछ और राज्यों में भी है.

प्रचार-प्रसार में अस्पष्टता

केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रचार अभियान ने जोर पकड़ लिया है. विशेष प्रचार अभियान पार्टी विभिन्न माध्यमों से कर रही है. भाजपा की प्रचार टीम ने कई नारे गढ़ लिए हैं. इसके मुकाबले प्रचार-प्रसार में कांग्रेस पिछड़ती दिख रही है.

लोकसभा चुनावों में प्रचार-प्रसार को लेकर कांग्रेस की तैयारियां कितनी बेपटरी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने विज्ञापन एजेंसी तक तय नहीं की है. एक खबर में बताया गया कि इस पर पार्टी नेताओं में सहमति नहीं बन पा रही है. कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा को प्रचार समिति का प्रमुख बनाया है. वे किसी नई विज्ञापन एजेंसी को यह काम दिलाना चाहते हैं. वहीं दूसरी तरफ जयराम रमेश हैं. पार्टी के प्रचार-प्रसार अभियान में उनकी अहम भूमिका रही है. रमेश चाहते हैं कि पहले से आजमाई गई किसी विज्ञापन एजेंसी को कांग्रेस के प्रचार का काम मिले. इस वजह से कोई अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है. जाहिर है कि अगर पार्टी विज्ञापन एजेंसी ही तय नहीं कर पा रही है तो फिर प्रचार अभियान की रणनीति कैसे तैयार हो पाएगी?

वैकल्पिक विमर्श का अभाव

लोकसभा चुनावों से संबंधित अपने प्रचार अभियान को भाजपा इस दिशा में ले जाने की कोशिश कर रही है कि देश में नरेंद्र मोदी के अलावा कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है. भाजपा जो राजनीतिक विमर्श चला रही है, उसमें वह नरेंद्र मोदी के सामने राहुल गांधी को खड़ा करके लोगों से अपील कर रही है कि वे किसे चुनना चाहते हैं. 2004 में लोकसभा सांसद बनने के बाद से 2014 तक कांग्रेस की अगुवाई वाली मनमोहन सिंह सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक राहुल गांधी का जो राजनीतिक प्रदर्शन रहा है, उस वजह से एक धारणा यह बन गई कि राहुल गांधी की क्षमताओं पर आम लोगों को भी संदेह है.

जब कांग्रेस ने प्रियंका गांधी की राजनीति में औपचारिक सक्रियता की घोषणा की तो एक बार लगा कि कांग्रेस नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी के नेतृत्व संबंधी तुलना के विमर्श को नरेंद्र मोदी बनाम राहुल और प्रियंका समेत कुछ स्थानीय क्षत्रपों के सामूहिक नेतृत्व के विमर्श को आगे बढ़ाएगी. लेकिन राजनीतिक सक्रियता के बावजूद प्रियंका गांधी जिस तरह से चुप हैं या उन्हें चुप रखा जा रहा है, उससे भाजपा को नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी के विमर्श को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है.

कांग्रेस में यही स्थिति विभिन्न राज्यों के क्षत्रपों को लेकर भी है. उदाहरण के तौर पर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को यह श्रेय जाता है कि मोदी लहर में न उन्होंने सिर्फ टीम मोदी के एक प्रमुख सदस्य अरुण जेटली को अमृतसर से लोकसभा चुनाव हराया बल्कि पूरे देश में भाजपा के विस्तार और पंजाब में आम आदमी पार्टी के उभार के बीच 2017 में पंजाब की सत्ता में कांग्रेस की वापसी कराई. प्रचार अभियान को समझने वाले लोग कहते हैं कि अगर कैप्टन अमरिंदर सिंह का इस्तेमाल पार्टी दूसरे राज्यों के प्रचार में यह कहते हुए कर सकती है कि इन्होंने नरेंद्र मोदी का रथ एक बार नहीं दो-दो बार रोका है. इससे भाजपा का नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी विमर्श थोड़ा कमजोर पड़ सकता है और इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा.