याद आता है कि सोवियत संघ में साम्यवादी व्यवस्था के अंतर्गत दो प्रमुख अख़बार थे - प्रावदा और इज़वेस्तिया. एक का अर्थ था सच और दूसरे का ख़बर. तब स्वयं सोवियत संघ में चुटकुलों की भरमार थी- वे ही प्रतिरोध की सबसे कारगर विधा थे. तब चुटकुला था कि ‘ख़बर’ में ‘सच’ नहीं और ‘सच’ में कोई ‘ख़बर’ नहीं. इन दिनों हमारी हालत इस विडंबना के बहुत नज़दीक पहुंचती लग रही है.

मैं हर दिन छह अख़बार लेता हूं. 5 अंग्रेज़ी के और 1 हिंदी का. हिंदी का अख़बार वह है जिसका कभी मैं नियमित स्तम्भकार था और जो अब पूरी तरह से अपनी तटस्थता और उदार प्रतिबद्धता छोड़कर बेशरमी से सत्तारूढ़ शक्तियों के प्रचार-प्रसार का मंच बन गया है. जो 5 अंग्रेज़ी अख़बार हैं उनमें से 2 अब तक आलोचना और विवेक की पत्रकारिता करते हैं. ब़ाकी 3, हिंदी अख़बार की तरह, बेशर्म और पालतू तो नहीं हुए हैं, पर विवेक से जब-तब डांवाडोल नज़र आते हैं. इस समय जो युद्धोन्माद फैलाया जा रहा है उसमें हमारे कई हिंदी-अंग्रेज़ी अख़बार शामिल हैं. भड़काऊ, झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाती ख़बरें बहुत उत्साह से पहले पृष्ठ पर छापी जा रही हैं. भारतीय पत्रकारिता इस तरह गोदी पत्रकारिता सत्ता-अनुशासित पहले शायद ही कभी हुई हो.

इधर, अभद्रता एक नये स्तर पर पहुंच रही है. हर दिन प्रायः हर अख़बार में पृष्ठ भर लंबे दस-बारह विज्ञापन एक ही नेता की मनमोहक तस्वीर के साथ छप रहे हैं. सार्वजनिक धन का यह दुरुपयोग है जो आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है. केंद्रीय नेता के अनुसरण में प्रादेशिक नेता भी यही कर रहे हैं. यह तकनीकी दृष्टि से गैर क़ानूनी भले न हो पूरी तरह से अनैतिक है. ज़ाहिर है जिस अख़बार को इतने भारी आयवाले विज्ञापन मिल रहे हैं वह वस्तुनिष्ठ और विवेकशील क्यों कर और कैसे होगा. उसकी स्वामिभक्ति स्पष्ट है.

हर सुबह झुंझलाहट होती है. अब कई पृष्ठ पलटो तब कहीं ख़बर का दुबका हुआ सा पृष्ठ आता है. यह मूर्तिपूजन, यह प्रचार एक तरह की नयी अभद्रता का ही संस्करण है. यह और बात है कि इन दिनों जो सार्वजनिक मानसिकता बनायी-फैलायी गयी है उसमें भाषा के निचले से निचले अभद्र स्तर पर पहुंचना एतराज़ की बात नहीं रह गया है. कहने को तो युद्ध और प्रेम में सब जायज़ माना जाता रहा है. अब उन्माद और वाग्मिता में सब जायज़ हो रहा है.

मैं टेलीविजन नहीं देखता हूं. झूठ और बकवास, गाली-गलौज को अहर्निश क्यों सहना! उस पर कभी-कभार आता हूं. सो उस पर आना अच्छा पर उसे देखना अच्छा नहीं. पर जो देखते हैं उनसे पता चलता है कि इस बीच अधिकांश चैनल बुरी तरह से उन्मादी हो गये हैं. अभद्रता उनमें पहले ही काफ़ी थी- अब उन्माद भी जुड़ गया है. इस तरह नये दौर में जो भारत हमारे पास दृश्य-श्रव्य माध्यमों से लगातार आ रहा है वह अभद्र भारत है. ग़नीमत है कि हम उसे असली भारत मानने की भूल नहीं कर रहे हैं।

गांधी-कल्पना

महात्मा गांधी के 150 वें वर्ष में यह लाज़िम है कि हम याद करें कि उनकी भारत की कल्पना क्या थी? इसलिए और भी कि वर्तमान भारत शायद उनकी कल्पना के भारत से जितनी दूर जा सकता था उतनी दूर जा चुका है. पिछले 70-72 वर्षों में भारत बहुत बदला-बढ़ा है और कई क्षेत्रों में उसका विकास उत्साहजनक है. पर साथ ही वह कई क्षेत्रों में पिछड़ा और कुछ और में फिसला है.

गांधी के भारत में अनेक धर्मों, भाषाओं, आस्थाओं, राजनीति, व्यापार, सामाजिक संबंधों आदि की अपनी-अपनी जगह होना थी और उनमें अहिंसा के आधार पर निर संवाद होना था. ऐसे भारत में राजनैतिक-आर्थिक-आध्यात्मिक शक्ति केंद्रित नहीं थी- वह बहुकेंद्रित होना थी. सत्ता, धन, शिक्षा, धर्म, सामाजिक व्यवहार आदि सभी परस्पर ज़िम्मेदार और जवाबदेह होना थे. हर नागरिक को, वह किसी जाति-धर्म-आर्थिक स्थिति-लिंग का क्यों न हो, क़ानून में और व्यवहार में स्वतंत्रता-न्यास-समता का समान अधिकार और दायित्व होना था.

गांधी चाहते थे कि सर्वधर्मसमभाव हो क्योंकि उनकी राय में सभी धर्म सच्चे पर अपूर्ण हैं. वे, इसलिए, एक-दूसरे के पूरक होंगे, एक-दूसरे से सीखेंगे. सिर्फ़ भौतिक भर नहीं मानसिक गंदगी से मुक्त भारत उनके ज़हन में था. परिवर्तन की ज़िम्मेदारी और भूमिका सरकार भर की नहीं होना चाहिये और न ही परिवर्तन के लिए उसका मुंह जोहना चाहिये. निजी स्तर पर परिवर्तन की पहल हर समय हर स्थिति में मुमकिन है. गांधी पश्चिमी सभ्यता, पश्चिमी विकास की अवधारणाओं और आदर्शों की नकल या अनुगमन करता भारत नहीं चाहते थे. उनके भारत को संसार भर से सीखकर अपने हिसाब से स्वायत्त और स्वाधीन बुद्धि का होना था. गांधी के भारत में धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक आदि अल्पसंख्यकों को समान अधिकार, जगह और आदर मिलना था. उनका भारत दूसरों से होड़ लेता भारत नहीं था. वह आत्मनिष्ठ, स्वायत्त और आत्मविश्वस्त भारत था. वे भारत को हर तरह की छुआछूत से मुक्त देखना चाहते थे, फिर वह छूत जाति की हो या विचार की, धर्म की हो या दौलत की, सत्ता की हो या सामाजिक रीति-रिवाज़ की.

गांधी वह बिरले राजनैतिक कर्मी थे जो साध्य और साधन के बीच की दूरी को कम से कम करना चाहते थे और साध्य के लिए साधन की बलि देने को तैयार नहीं थे. निजी और सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों में उनकी स्पष्ट धारणा थी कि उदात्त साध्य साधन से ही पाया जा सकता है, अन्यथा नहीं. गांधी की, प्राचीनता और आधुनिकता दोनों एक साथ थी. वे यथावश्यक अपनी प्राचीनता को संशोधित करने और आधुनिकता को अपनी शर्तों पर आत्मसात् करने को तैयार रहते थे. उनके भारत में हरेक की ज़रूरत के लिए काफ़ी होना था, हरेक के लोभ के लिए नहीं. गांधी का भारत अहिंसक सत्याग्रही जबावदेह लोकतंत्र होना था.

बर्लिन की अवधारणा

दार्शनिक इज़ाया बर्लिन ने अपने अंतिम निबंध में साफ़ कहा था कि बहुलतावाद का प्रतिलोम है एक ही सत्य को माननेवाली दृष्टि. सारे सच अंतत: एक सुसंगति में बैठ सकते, समंजस हो सकते हैं. इस विश्वास का एक नतीजा यह था जो जानते हैं उनका नियंत्रण होना चाहिये उन पर जो नहीं जानते हैं. जिनके पास उत्तर हैं मनुष्य की भी कुछ महान् समस्याओं के उनका आज्ञापालन होना चाहिये क्योंकि उन्हें ही पता है कि कैसे समाज संगठित होना चाहिये, व्यक्तियों को कैसा जीवन बिताना चाहिये, कैसे संस्कृति विकसित हो. बर्लिन का मत था कि कुछ लोगों को ऐसा एकाधिकार नहीं दिया जाना चाहिये जो बहुसंख्यक लोगों की बुनियादी स्वतंत्रता ही छीन ले.

पुराने ज़माने में अनेक देवताओं के समक्ष स्त्री-पुरुष बलि देने के लिए लाये जाते थे. बर्लिन के अनुसार आधुनिक युग ने नयी मूर्तियां गढ़ी हैं. वाद. यंत्रणा देने, मारने, कष्ट देने को सामान्यतः उचित ही निदिंत किया जाता है. पर अगर यही चीज़ें अगर मेरे किसी निजी हित के लिए नहीं किसी वाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद, फ़ासीवाद, साम्यवाद, किसी उग्र धार्मिक विश्वास या प्रगति या इतिहास के नियमों की पूर्ति के लिए की जायें तो उनका औचित्य है! ज़्यादातर क्रांतिकारी, प्रत्यक्षतः या परोक्षतः, मानते हैं कि अंडे तोड़ना चाहिये वरना आमलेट कैसे बनेगा! अंडे निश्चय ही तोड़े जाते हैं- हमारे समय में तो बहुत हिंसक और व्यापक रूप से- लेकिन आमलेट नहीं बनता. बर्लिन कहते हैं कि सारी उग्रता एकात्मकता से उपजती है.