इस पुस्तक के अध्याय ‘क्यों बचा रहता है लोकतंत्र’ का एक अंश -

‘छोटे किसान वर्ग का किसी दूसरी किस्म की सामाजिक बनावट में रूपांतरण कर छोटे किसानों के सवाल को खत्म करना लोकतंत्र के लिए सबसे शुभ संकेत लगता है... छोटा किसान वर्ग सोवियत संघ, चीन, जापान और जर्मनी में बचा रहा और इन चारों देशों ने अपने औद्योगीकरण के दौरान तानाशाही देखी. भारत को जो चीज अपवाद बनाती है वह यह है कि छोटे किसान वर्ग के खत्म हुए बगैर यहां लोकतंत्र बचा रहा. यकीनन इसका एक कारण हरित क्रांति का अवतरण भी था.

खाद्यान्न की कमी की समस्या को अंततः हल करके हरित क्रांति को भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए श्रेय दिया जाना चाहिए. पर इसका श्रेय नेहरू और 1950 व 1960 के दशक के अन्य नेताओं को भी जरूर जाता है. जिन्होंने उस वक्त औद्योगिक विकास की अपनी भूख को काबू में किया जब छोटे किसानों वाली कृषि ठहराव का शिकार थी. इस अवधि के दौरान औद्योगीकरण की अपेक्षाकृत सुस्त रफ्तार के विकास के लिए मान जाना, लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था.’


पुस्तक : अधूरी जीत

लेखक : आशुतोष वार्ष्णेय

अनुवादक : जितेंद्र कुमार

प्रकाशक : ऑक्सफोर्ड प्रकाशन

कीमत : 495 रुपए


भारत का 70 साल का लोकतंत्र विश्व के राजनीतिक परिदृश्य में एक आश्चर्यजनक घटना है. भारतीय लोकतंत्र दुनिया के माने हुए राजनीतिक विश्लेषकों, चिंतकों, विचारकों के विश्लेषणों और नकारात्मक अनुमानों तो धता जताते हुए न सिर्फ टिका हुआ है, बल्कि तमाम उतार-चढ़ावों से होता हुआ फल-फूल भी रहा है. भारतीय लोकतंत्र की यात्रा से गुजरना सिर्फ राजनीतिक नजरिए से भारत को देखना नहीं है बल्कि आर्थिक-सामाजिक दृष्टिकोण से उसका मूल्यांकन करना भी है. आशुतोष वार्ष्णेय की यह किताब ‘अधूरी जीत’ भी इन सभी दृष्टियों से भारतीय लोकतंत्र के रग-रेशों को बेहद गहराई से जांचती है. ‘अधूरी जीत’ भारतीय लोकतंत्र को समझने और समझाने की बेहद गहन, सुलझी, व्यापक, ईमानदार और शानदार कोशिश है.

एशियाई, अफ्रीकी, लातिन अमेरिकी और यहां तक कि दक्षिण यूरोपीय देशों को ‘लोकतंत्र’ राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समृद्धि के रास्ते में एक बड़ा रोड़ा महसूस हुआ. यही कारण है कि दुनिया के ज्यादातर देशों ने राजनीति की लोकतांत्रिक पद्धति को दरकिनार कर दिया. 1960 के दशक तक एक के बाद एक देश लोकतंत्र की अपनी शपथ भूल चुके थे. इसके उलट 1975-77 के 19 महीनों को छोड़ दें तो भारतीय लोकतंत्र बचा रहा. मानव इतिहास में पहली बार किसी गरीब देश ने इतने लंबे समय तक सभी नागरिकों के मताधिकार को लागू रखा.

हमारे देश में लोकतंत्र जिंदा तो रहा, लेकिन लेखक का मानना है कि कई मोर्चों पर उसका पतन भी हुआ है. बीते सात दशकों के दौरान भारतीय लोकतंत्र में पनपी ऐसी ही कुछ अराजकताओं की तरफ इशारा करते हुए आशुतोष लिखते हैं :

‘नेहरू के दौर में राजनीतिक संवाद की सादगी और आचार के मुकाबले आज की तारीख में राजनीति की भाषा कितनी खुरदुरी और शैली कितनी अराजक हो गई है कि आखिर कैसे ‘संदिग्ध उत्पत्ति’ वाले लोगों ने चुनावी राजनीति पर अपना कब्जा जमा लिया है, कैसे पिछले दौर की स्थायी सरकारों ने आज की तारीख में अस्थायी उत्श्रृंखल गठबंधनों के लिए रास्ता तैयार किया है. जहां परस्पर मतभेद पलक झपकते ही अप्रत्याशित झगड़ों और असहिष्णु आक्रोश में बदल जाते हैं. कैसे निचली जातियों की प्रतिष्ठा की राजनीति अकसर प्रतिशोध की राजनीति में तब्दील हो जाती है और कैसे जाति पर जोर देने के चलते अखिल भारतीय नागकिता के उभार का रास्ता अवरुद्ध होता है. बहुत संभव है कि नीचे की ओर जा रहा जनतंत्र और ज्यादा लचर व बदहाल जनतंत्र हो.’

लेखक की नजर में भारतीय लोकतंत्र के सामने मुख्य रूप से तीन सबसे बड़ी या कहें बुनियादी चुनौतियां थीं; एकता, गरिमा व न्याय और गरीबी उन्मूलन. इनमें से गरीबी उन्मूलन और आम नागरिक के लिए गरिमामय जीवन तो अभी भी दूर की कौड़ी है. हां लेकिन इतनी घनघोर विविधता के बावजूद राष्ट्रीय एकता बनाए रखने का असंभव सा लक्ष्य भारतीय लोकतंत्र ने काफी हद तक प्राप्त किया है. इस भौगोलिक और राष्ट्रीय एकता को बहाल रखने के लिए भारतीय लोकतंत्र ने नर्म और सख्त दोनों तरह के प्रयास किए हैं.

एक देश किसी भी हिस्से को कभी भी सिर्फ बल या छल के आधार पर अपना नहीं बना सकता. क्षेत्रीय अलगाव की समस्या को दूर करने के लिए क्षेत्र की जरूरतों के हिसाब से विकास वहां पहुंचाना सबसे बुनियादी प्राथमिकता होती है. इसके साथ स्थानीय अस्मिताओं को भी स्वीकार करने और उन्हें महत्व देने की भी काफी अहमियत है. भारत को एकजुट बनाए रखने के ऐसे ही कुछ प्रयासों की तरफ इशारा करते हुए लेखक लिखता है :

‘राजनीतिक तौर पर दिल्ली ने विद्रोही नेताओं और संगठनों को चुनाव में भाग लेने के लिए प्रेरित करने और अगर वे जीतते हैं तो राज्य सरकार चलाने के लिए राजी करने की सदैव कोशिश की है. अंत में दिल्ली ने असंतुष्ट राज्यों को विकास के लिए ज्यादा वित्तीय संसाधन आवंटित किए हैं ताकि शिकायत बातचीत से निपटाई जा सके. विद्रोहियों के जनाधार को कमजोर किया जा सके और क्षेत्रीय राजनीतिक प्रभुत्व वाले समूहों को जीता जा सके. अगर अलगाववाद के प्रति दिल्ली की प्रतिक्रिया सिर्फ सैन्य कार्यवाही करती तो राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा करने में ज्यादा कठिनाई होती. इंदिरा गांधी के बाद के वर्षों को छोड़ दिया जाए तो दिल्ली का बुनियादी तरीका उन्हें अपने साथ मिलाने का रहा है.’

आशुतोष वार्ष्णेय ब्राउन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है और सेंटर फॉर कंटेम्प्रेरी साउथ एशिया के निदेशक हैं. उनकी यह किताब शोध करते हुए भारतीय लोकतंत्र की गहरी जांच-पड़ताल करती है. आशुतोष अपने लेखों के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र के विभिन्न आयामों पर सोचने के लिए बाध्य करते हैं. वे तथ्यों और सबूतों के जरिए सात दशक पुराने भारतीय लोकतंत्र की उन प्रक्रियाओं को बारीकी से देखते हैं जो आजादी के बाद शुरू हुई थीं. यह किताब भारत के उन्मादी और ठीक उसी समय और ज्यादा लोकतांत्रिक होते लोकतंत्र के अंतर्विरोधों का गहन विश्लेषण करती है.

यह किताब गैर-सवर्ण जातियों के राजनैतिक उभार और आर्थिक मजबूरी के संबंधों की व्याख्या के साथ उत्तर भारत और दक्षिण भारत के उद्यमों में जातियों की भागीदारी का भी तुलनात्मक अध्ययन पेश करती है. कुल मिलाकर आशुतोष भारतीय लोकतंत्र को इस रूप में सामने लाते हैं जिसकी अधूरी जीत हुई और जिसका आधा जीत जाना अभी बचा हुआ है. अनुवादक जितेंद्र कुमार ने अपने बेहतरीन अनुवाद से हिंदी पाठकों को ‘अनुदित किताब’ पढ़ने के अहसास से बखूबी बचाया है. भारतीय राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों और राजनीति विज्ञान के शोधार्थियों के लिए यह एक शानदार किताब है.