गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का निधन हो गया है. वे पिछले कुछ समय से पैंक्रियाज (अग्नाशय) के कैंसर से जूझ रहे थे. निधन से एक घंटे पहले गोवा के मुख्यमंत्री कार्यालय ने बयान जारी कर मनोहर पर्रिकर के स्वास्थ्य की स्थिति बेहद खराब होने की जानकारी दी थी. गोवा के मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से ट्वीट कर बताया गया था, ‘मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर की हालत बेहद गंभीर है. डॉक्टर उन्हें ठीक करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.’ मनोहर पर्रिकर शनिवार से अस्पताल में भर्ती थे.

पिछले कुछ समय से गोवा की पूरी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा मनोहर पर्रिकर के स्वास्थ्य के आसपास केंद्रित हो गया था. कई बार खबर आई कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं. हालांकि, भाजपा ने इन खबरों को बार-बार खारिज किया था और कहा था कि नेतृत्व परिवर्तन का सवाल ही नहीं उठता. बीते दिसंबर में ही गोवा सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में कहा था कि कैंसर के बावजूद राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर प्रशासन संभालने के लिए पूरी तरह फिट हैं. गोवा के एडवोकेट जनरल दत्ता प्रसाद लवांडे ने चर्चित कंपनी एपल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स का हवाला दिया था. उनकी दलील थी कि स्टीव जॉब्स भी मनोहर पर्रिकर की ही तरह अग्नाशय के कैंसर से पीड़ित थे और उन्होंने अपने जीवन की कई बड़ी उपलब्धियां कैंसर से पीड़ित होने के बावजूद हासिल की थीं.

हालांकि कुछ समय पहले जब सत्याग्रह ने गोवा की भाजपा सरकार को समर्थन दे रहे एक निर्दलीय विधायक से बात की थी तो कुछ दूसरी ही कहानी सामने आई थी. इस विधायक का कहना था कि खुद मनोहर पर्रिकर अपनी खराब सेहत की वजह से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना चाहते हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ऐसा नहीं चाहता.

सूत्रों के मुताबिक भाजपा के आला नेताओं को यह लग रहा था कि अगर मनोहर पर्रिकर हटे तो गोवा की सरकार चला पाना आसान नहीं होगा. 2017 में हुए गोवा विधानसभा चुनावों में 40 में से 17 सीटें कांग्रेस को मिली थीं. भाजपा को सिर्फ 13 सीटें मिली थीं. विजय सरदेसाई की गोवा फाॅरवर्ड पार्टी को तीन सीटें और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी को भी तीन सीटें मिली थीं. इन दोनों पार्टियों और कुछ निर्दलीय विधायकों के समर्थन से भाजपा गोवा में फिर से सरकार बनाने में कामयाब हो गई थी.

गोवा में कांग्रेस से भी कम सीटें होने के बावजूद भाजपा की सरकार मनोहर पर्रिकर के नाम पर ही बनी थी. जो भी निर्दलीय विधायक और छोटी पार्टियों के विधायक भाजपा के साथ आए, उनमें से ज्यादातर की शर्त यही थी कि पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाया जाए. गोवा में भाजपा सरकार बनवाने में सबसे सक्रिय भूमिका निभाने वाले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सार्वजनिक तौर पर माना था कि मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त सबसे पहले विजय सरदेसाई ने रखी और इसके बाद कुछ दूसरे विधायकों ने भी यही शर्त रखी. इन्हीं विधायकों के दबाव में मनोहर पर्रिकर से केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री का पद छुड़वाकर उन्हें वापस गोवा भेजा गया था.

2014 में मनोहर पर्रिकर से गोवा के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था. उस वक्त यह बात आई थी कि प्रधानमंत्री अपनी शुरुआती टीम में ही उनको शामिल कर उन्हें दिल्ली लाना चाह रहे थे. यानी मई 2014 में. लेकिन उस वक्त मनोहर पर्रिकर तैयार नहीं हुए. लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में पहली बार फेरबदल किया तो पर्रिकर केंद्र सरकार में आ गए और उनकी जगह गोवा का मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर को बनाया गया.

असल में जैसे हालात थे उनमें गोवा में मनोहर पर्रिकर का कोई ऐसा विकल्प नहीं था जो हर पक्ष को स्वीकार्य हो. केंद्रीय मंत्री श्रीपद नाइक को मुख्यमंत्री बनाने को लेकर कुछ सहयोगियों को दिक्कत थी. वहीं नाइक के आने के बाद किसी विधायक से इस्तीफा दिलाकर उन्हें छह महीने के अंदर विधानसभा के लिए निर्वाचित कराने का भी झंझट था. सूत्रों के मुताबिक 13 विधायकों वाली भाजपा लोकसभा चुनाव से पहले ऐसा कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं थी.

जानकारों के मुताबिक भाजपा को एक डर यह भी सता रहा था कि अगर मनोहर पर्रिकर के हटने के बाद गोवा में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है तो 17 विधायकों वाली कांग्रेस की सरकार बनने की संभावनाएं भी पैदा हो सकती हैं. लोकसभा चुनावों के ऐन महीने पहले भाजपा किसी भी कीमत पर बगैर किसी चुनाव के एक राज्य में अपनी सरकार नहीं गंवाना चाहती थी. अभी सरकार 23 विधायकों के समर्थन से चल रही है. इनमें भाजपा के 14 विधायक ही हैं. ऐसे में भाजपा को लग रहा था कि अगर चूक हुई तो बाजी पलट भी सकती है. इन सब वजहों के चलते भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व जब तक हो सके, मनोहर पर्रिकर के जरिए ही गोवा में खुद को सत्ता में बनाए रखना चाहता था.