2004 के गोवा फ़िल्म फेस्टिवल (इफ्फी) के दौरान या कुछ पहले अख़बारों में मनोहर पर्रिकर की एक तस्वीर छपी थी. इसमें वे पणजी में चल रहे किसी निर्माण कार्य को देख रहे थे और उसकी वजह से जाम लग जाने के कारण ट्रैफिक को निकालने में कर्मचारियों की मदद कर रहे थे. ऐसी तस्वीरें राजनीति में छवि निर्माण का हिस्सा होती हैं, लेकिन 2004 में फ़िल्म फेस्टिवल के दौरान मनोहर पर्रिकर की जिस तरह से उपस्थिति रही उससे यह तो लगता था कि छवि निर्माण की यह कोशिश सायास नहीं है और मनोहर पर्रिकर में उस छवि का बहुत सारा अंश वाकई है.

फ़िल्म फेस्टिवल के दौरान पर्रिकर अक्सर ओल्ड गोवा मेडिकल कालेज और कला एकडेमी में दिख जाते थे. ऐसा होने पर राजनीति से आक्रांत हम उत्तर भारतीयों की टोली में से कोई कहता था - अबे, देख गोवा का मुख्यमंत्री. लोग उनसे मिलते थे, हाथ मिलाते थे और बात करते थे. अंग्रेजी, कोंकणी और हिंदी तीनों में बोलते मनोहर पर्रिकर को देखकर कोई भी महसूस कर सकता था कि इस आदमी में कार्यकुशलता तो है.

लेकिन एक मध्यमवर्गीय समझ होती है जो मानती है कि कार्यकुशलता तो टेक्नोक्रेट में ही होती है, राजनेता में नहीं. सो तब ज्यादातर ने मनोहर पर्रिकर की कार्यकुशलता की वजह उनकी आईआईटी की पढ़ाई में ढूंढी, उनकी जनप्रियता में नहीं. वैसे भी साल 2000 में मनोहर पर्रिकर जब पहली बार गोवा के मुख्यमंत्री बने थे तो हिंदी के अखबारों में जो खबरें-विश्लेषण लिखे गए थे, उनमें से ज्यादातर में उनके आईआईटी से पढ़े-लिखे होने का प्रमुखता से जिक्र था.

2004 में इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल का ‘परमानेंट वेन्यू’ गोवा होने और उसे कांस जैसी प्रतिष्ठा दिला देने की दिल्ली से हांकी जाने वाली डींगों से इतर दिल्ली के पत्रकारों ने पणजी में मनोहर पर्रिकर के तौर पर ऐसा नेता देखा जो कम से कम इंतेजामिया के लिहाज से पूरे प्रयास कर रहा था. बहुत से लोग मानते हैं कि 2004 जैसा फ़िल्म फेस्टिवल का आयोजन गोवा में फिर नहीं हुआ. बाद में मनोहर पर्रिकर के मुख्यमंत्री रहते हुए भी. 2004 में लगा था कि यह आयोजन शायद दिल्ली के बाबू कल्चर से मुक्त हो गया, लेकिन 2018 तक यह धीरे-धीरे प्रचुर मात्रा में इफ्फी में लौट चुका है.

2004 से अब तक कई दफा गोवा जाना हुआ, चार बार तो फ़िल्म फेस्टिवल के ही सिलसिले में. तब से गोवा की सियासत में मनोहर पर्रिकर का दबदबा बढ़ता ही देखा. सब कुछ उनके इर्द-गिर्द हो गया. 2004 के फ़िल्म फेस्टिवल की सफलता की खबरों ने इस छोटे से राज्य के मुख्यमंत्री को देशव्यापी छवि दी. मनोहर पर्रिकर इसके काफी हद तक हकदार भी थे.

गोवा आने-जाने के इसी सिलसिले के दौरान गोवा-कर्नाटक सीमा पर हुए एक बतकही में एक सज्जन ने कहा था, ‘आप तो नार्थ का है, उधर बहुत करप्सन है,अभी केजरीवाल आया है शायद. बताते वो ठीक है.’ नार्थ के नाम पर दिमाग में सिर्फ दिल्ली की छवि ला पाए उन सज्जन को जब मैंने बताया कि मैं दिल्ली का नहीं यूपी का हूं तो उन्होंने एक बड़ी दिलफरेब मुस्कराहट के साथ कहा, ‘तो तुम इधर से पर्रिकर को ले जा सकता. इधर उसको कोई काम नहीं करने दे रहा है. इधर भी सब चोरी में लग रहा है.’

हिंदुस्तान में राजनीतिक समर्थन की वजह जाति-धर्म में तलाशी जाती है. मैंने भी जानने की कोशिश की. उसने खुद को भंडारी (गोवा का एक समुदाय) बताया. लेकिन मेरी बात को समझ गया. आगे फिर यह भी बता दिया कि ‘मैं भंडारी हूं, लेकिन क्रिस्चन लोग भी पर्रिकर को सपोर्ट करता.’

इस स्थापना में एक प्रशंसक का थोड़ा प्रोपेगेंडा जरूर था, लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि मनोहर पर्रिकर की लोकप्रियता गोवा में कैफे से लेकर विशिष्ट वर्ग तक हर जगह थी. बेंगलुरु में रहने वाले एक कोंकणी मुसलमान दोस्त दिल्ली में मिले. बात कोंकण में भगवा कपड़े पहनकर होने वाले बहुत सारे धर्म सम्मेलनों की होने लगी और लोगों ने उनसे राय मांगी तो उन्होंने कहा, ‘मुझे ज्यादा तो नहीं मालूम, लेकिन वीएचपी प्रॉब्लम करता, अभी तो पर्रिकर साहब भी इधर (दिल्ली) आ गया. तो ये सब बढ़ेगा. वो बेस्ट आदमी. नाइसमैन. पर्रिकर साहब हैंडल्स थिंग्स करेक्टली.’

आरएसएस से आए मनोहर पर्रिकर उसका सगर्व उल्लेख करते थे. आश्चर्य यह था कि गोवा में आरएसएस का तमाम कैडर उनसे खुश नहीं था. लेकिन कैथोलिक ब्रदर-फादर और मुसलमान उन्हें ‘नाइस मैन’ मानते थे. उनके कारसेवक होने के बाद भी.

रक्षा मंत्री के तौर पर मनोहर पर्रिकर दिल्ली आए तो कैंट एक्ट में बदलाव के बारे विचार-विमर्श शुरू हुआ. बताते हैं कि दिल्ली के सियासी गलियारे और अफसरों के काम करने के तरीके पर उन्होंने गोवा के अपने एक विश्वस्त से कहा, ‘दिल्ली के अफसर तो स्टेट से भी ज्यादा स्टीरियोटाइप हैं. पुरानी रिपोर्ट्स तक नहीं पढ़ते. सेना और डिफेंस मिनिस्ट्री के अफसरों की एक बैठक मैंने समस्या समझने के लिए बुलाई थी, लेकिन बैठक के बाद लगा कि इनमें से कोई समस्या को जानता ही नहीं है. ये सब तो वही बातें कर रहे हैं जो न्यूज़पेपर में छपती हैं और जिन्हें मैं भी जानता हूं. ऐसे कैसे काम होगा दिल्ली में?’

खैर, मनोहर पर्रिकर गोवा लौट गए. दिल्ली में कैसे काम करेंगे की दुविधा और रफाल की फाइलों में नोटिंग दर्ज करने को लेकर चल रही जद्दोजहद के बीच. मनोहर पर्रिकर मोदी के प्रशंसक थे. गोवा की चीफ मिनिस्टरी छोड़ वे दिल्ली आए थे. भाजपा का ही एक खेमा था जो कहता था कि डिफेंस डील में भारत में हमेशा सवाल उठते हैं, इसलिए पर्रिकर को इस मंत्रालय में लाया गया है ताकि कोई सवाल न उठे. उनमें यह खूबी तो थी ही कि सौदों के तकनीकी पक्ष को समझ लें.

लेकिन गोवा में कांग्रेस से कम सीटें आने के बाद मनोहर पर्रिकर को भाजपा की सरकार बनवाने जाना पड़ा. एक गौड़ सारस्वत ब्राह्मण ने दूसरे गौड़ सारस्वत ब्राह्मण यानी विजय सरदेसाई को मनाया. दूसरे छोर पर मनोहर पर्रिकर ने कुछ कैथोलिकों को भी अपना हवाला देकर इस बात के लिए मना लिया कि वे उनकी सरकार बनने दें.

एक समय गोवा में अपनी राजनीतिक संभावना के चरम पर पहुंचने के बाद मनोहर पर्रिकर एक खास सोच से दिल्ली आए थे, उसी तेजी से वे गोवा लौट गए. सरकार बनवाने के लिए मनोहर पर्रिकर की जरूरत तो थी ही, उनका भी केंद्र से मोहभंग हो गया था, ऐसा भी माना जाता है.

मनोहर पर्रिकर का व्यक्तित्व महीन रेशों से बुना था. अपने स्कूल के दिनों में ही संघी हो गए पर्रिकर अपनी बातचीत में किसी उदारपंथी जैसे लगते थे. उनकी सादगी दिल्ली के तमाम बौद्धिक लोगों की तरह करीने से ओढ़ी-बिछाई नहीं बल्कि सहज थी. उनमें संघ से भाजपा में आये बहुत सारे नेताओं वाली प्रतीकात्मकता भी नहीं थी, जो बात-बात में वंदे मातरम, जय हिंद और तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहे न रहे जैसी चीजों का इतना इस्तेमाल करते हैं कि कई बार वो बेजा और नकली लगने लगता है. कभी-कभी पर्रिकर की बातें या बयान ‘लिबरल फार्मेट’ पर फिट नहीं होते थे, लेकिन फिर भी उसमें किसी वैचारिक आग्रह की जगह व्यवहारिकता का पुट होता था.

लेकिन इससे इतर यह भी सच है कि मनोहर पर्रिकर गोवा जैसी जगह पर राम-जन्म भूमि आंदोलन मुख्य चेहरे थे. कुछ लोग तो कहते हैं कि वे उस दौरान अयोध्या भी आये थे. उस समय सबको अयोध्या बुलाने वाले आडवाणी को उन्होंने 2014 में पुराना अचार टाइप तक बता डाला. जिन कांग्रेसी प्रताप सिंह राणे ने उनकी सदाशयता और विधानसभा के प्रस्तावों पर बहुत विस्तार से बहस करने पर कहा था कि ‘पर्रिकर तुम गोवा के चीफ मिनिस्टर आज नहीं तो कल बनोगे ही.’, उन्होंने ही आरोप लगाया कि रफाल डील की फाइल्स पर्रिकर के पास हैं और वे उन्हीं के सहारे मुख्यमंत्री बने हुए हैं. इसमें कितनी सच्चाई है, कहा नहीं जा सकता. हां, यह काफी हद तक सच है कि तबीयत बिगड़ने के बाद भी भाजपा उन्हें मुक्त नहीं करना चाहती थी क्योंकि सरकार गिर जाने का डर था.

मनोहर पर्रिकर, दरअसल उस दौर में आरएसएस की तरफ झुके जब समाजवादी, वामपंथी (सही मायनों में-क्योंकि बौद्धिक जगत पर कायम वामपंथी मूलतः कांग्रेसी ही थे) और जनसंघी कांग्रेस के खिलाफ कई मोर्चों पर साथ आ जाते थे. सार्वजनिक जीवन में कांग्रेस से इतर कुछ करने की ललक ने उस दौर में बहुतों को इन संगठन में धकेला. आपातकाल में बड़े नेताओं और सक्रिय संसदीय राजनीति करने वालों को छोड़ दिया जाए तो संघर्ष में कम्युनिस्टों और संघियों ने खूब जेलें भरी थीं. मनोहर पर्रिकर भी ठीक इसी दौर के बाद के संघी थे.

हालांकि, बाद में बहुतों के मूल्य इन दोनों विचारधाराओं और संगठन से टूटे. कम्युनिस्ट पार्टियों में अंग्रेजी बोलने वाली एक जमात आ गई और जेएनयू छात्र संघ का चुनाव जीतना पोलित ब्यूरो में जगह मिलने की गारंटी टाइप हो गया. कानपुर से लेकर सोनभद्र तक हिंदी पट्टी में ऐसे कम्युनिस्ट नेता बिलाने लगे जो जनता से जनता की जुबान में बात कर लेते थे. भाजपा सरकारें बनाने लगी तो संघियों में ऐसे लोग दाखिल होने लगे जो उसे ऐसा कान्वेंट स्कूल समझ आते हैं कि उसके प्ले स्कूल में दाखिला ले लो, फिर आराम से एक से बारह तक पढ़ो.

मनोहर पर्रिकर इनमें से नहीं थे. आईआईटी छोड़ राजनीति में वे आगे बढ़े और गोवा में तो भाजपा को उन्होंने खड़ा नहीं किया, बल्कि उससे भी आगे बढ़ गए. उन्होंने नौकरी के सारे आनंद लेकर फिर रिटायर होकर सियासत नहीं की. यह मूल्य चाहे संघ से आया हो या वाम से. अच्छा तो कहा ही जा सकता है.

मनोहर पर्रिकर में सादगी थी, वे कार्यकुशल थे और उनके पास वह लोकप्रियता भी थी जो किसी प्रचार निर्माण से नहीं बनी थी, दबदबेदार सियासी लोगों में ये सारे गुण एक साथ नहीं होते. उनसे तमाम मतभिन्नता और गोवा में ही उनके कार्यकाल में तमाम चीजों में उनकी वादाखिलाफी के बाद भी उन्हें जानने वाले मानते हैं कि भारत के सार्वजनिक जीवन में ऐसे नेता कम ही रहे हैं. एक ऐसे समय में जब हवाबाज़ी को ही राजनीति माना जा रहा है और अपनी वैचारिक खेमेबाजी के हिसाब से लोग खुद अपने आंचल से उसे हवा दे रहे हैं, पर्रिकर का जाना दुखद है.