ब्रिटेन का ब्रेक्जिट एक मज़ाक बन कर रह गया है. दुनिया चटखारे लेकर खिल्ली उड़ा रही है कि ज़रा इन अंग्रेज़ों को देखो! एक समय इनके राज में सूरज डूबता ही नहीं था. आज इनकी अपनी ही नैया डूबती लग रही है. बड़ी प्रखर बुद्धि हुआ करते थे. सारी प्रखरता को 23 जून 2016 से ग्रहण लग गया है. उस दिन जनमतसंग्रह हुआ था. जनता से पूछा गया था कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ (ईयू) में बने रहना चाहिये या तलाक़ दे देना चाहिये. वह एक जनवरी 1973 से यूरोपीय संघ का सदस्य है. 51.9 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा, तलाक़ दे देना चाहिये.

जनादेश का पालन करते हुए प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने 29 मार्च 2017 को इस तलाक़ के लिए विधिवत आवेदन भी कर दिया. यूरोपीय संघ के गठन की संधियों के अनुसार दो वर्षों के भीतर तलाक़ की सारी प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिये. यानी, 29 मार्च 2019 की मध्यरात्रि से ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के रास्ते अलग-अलग हो जाते. लेकिन, इस बीच ब्रिटेन की संसद तलाक़ के उस समझौते को ही मानने के लिए तैयार नहीं है, जिस पर ब्रिटेन की सरकार और यूरोपीय संघ दो वर्षों तक चली वार्ताओं के बाद पहुंचे हैं. संसद में जब-जब समझौते पर मतदान हुआ, भारी बहुमत के साथ उसे ठुकरा दिया गया.

संसद का अनुमोदन एक बार भी नहीं

हर मतदान के बाद टेरेसा मे यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रसेल्स पहुंचीं. उन्होंने यूरोपीय संघ के सर्वोच्च अधिकारियों से नयी रियायतें या नये आश्वासन प्राप्त करने की कोशिश की. कभी कुछ सफलता हाथ लगी, कभी ख़ाली हाथ लौटीं. पर संसद का अनुमोदन उन्हें एक बार भी नहीं मिला. जितने सांसद, उतनी ही सांसत. जितने मुंह, उतनी ही बातें. गतिरोध का अंत हो ही नहीं रहा था. कोई स्पष्ट विकल्प उभर ही नहीं रहा था. यूरोपीय संघ का सदस्य बना रहने वाले आयरलैंड गणराज्य और संघ से पिंड छुड़ाने के लिए अधीर ब्रिटेन के उत्तरी आयरलैंड प्रदेश के बीच की इस समय की खुली सीमा का भावी नियमन (बैकस्टॉप) कैसा हो, इसका किसी के पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था. यही सारे गतिरोध की जड़ बन गया.

बिना समझौते के तलाक़ भी नहीं

15 और 16 मार्च को संसद में दो नये मतविभाजन हुए. सांसदों के बहुमत ने, किसी समझौते के बिना ही, यूरोपीय संघ से बाहर हो जाने या दोबारा जनमतसंग्रह करवाने के सुझावों को भारी बहुमत से ठुकरा दिया. सरकार से कहा गया कि अब तक का समझौता कतई स्वीकार्य नहीं है. तब भी, बिना किसी समझौते के यूरोपीय संघ के साथ तलाक़ को हर हाल में टाला जाए.

इन परिस्थितियों में ब्रिटेन के लिए 29 मार्च तक व्यवस्थित ढंग से यूरोपीय संघ से अलग होना संभव नहीं रह गया है. इसलिए प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने संसद से अनुरोध किया कि उन्हें संघ से कुछ और समय मांगने तथा ब्रेक्जिट की तारीख़ कुछेक महीने आगे सरकाने का अधिकार दिया जाए. 202 के विरुद्ध 412 सांसदों के भारी बहुमत के साथ उनका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया गया.

यही प्रधानमंत्री मे की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है. इससे पहले उनकी एक नहीं सुनी जा रही थी. सांसदों का बहुमत उनकी हर बात आंख मूंद कर ठुकराता जा रहा था. तब भी वे अदम्य धैर्य और अपार सहनशीलता का परिचय देती रहीं. पराजय का कड़वा घूंट बार-बार पीती गयीं. कोई दूसरा होता, तो त्यागपत्र दे कर चला गया होता.

गुरुवार 21 मार्च को ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के सभी देशों का अगला शिखर सम्मेलन है. इस परिप्रेक्ष्य में अधिकतर विश्लेषक यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बीच तलाक़ की प्रक्रिया के अब तीन संभावित परिदृश्य देखते हैंः

पहला

जैसा कि प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने खुद कहा है, यूरोपीय शिखर सम्मेलन से पहले –यानी बुधवार 20 मार्च तक – वे ब्रिटिश संसद से एक बार फिर कहेंगी कि उनकी सरकार ने यूरोपीय संघ के साथ जो समझौता किया है, उसका अनुमोदन कर दिया जाये. यूरोपीय संघ के नेता भी अभी तक ऐसा कुछ तय नहीं कर पाए हैं कि ब्रिटेन को और समय दिया जाये या नहीं. यदि और समय दिया जाये, जिसकी संभावना प्रबल दिखती है, तो कितना समय दिया जाये.

संकेत यही है कि प्रधानमंत्री मे यूरोपीय शिखर सम्मेलन से पहले के अंतिम दिन, यानी 20 मार्च को, संसद की अगली बैठक बुलायेंगी. सांसदों से एक बार फिर यही अनुरोध करेंगी कि यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौते को स्वीकार कर लिया जाये. प्रेक्षकों का मानना है कि ब्रिटिश सांसदों ने यदि इस बार समझौते का अनुमोदन कर दिया – जिसकी संभावना कम ही है – तो यूरोपीय संघ के देशों के शीर्ष नेता ब्रेक्जिट की तारीख़ मई या जून के अंत तक बढ़ाने के लिए राज़ी हो सकते हैं. वे अपने ऊपर यह दोषारोपण होते नहीं देखना चाहेंगे कि उनके अड़ियलपन के कारण ब्रिटेन को अराजकतापूर्ण अव्यवस्थित ढंग से यूरोपीय संघ से अलग होना पड़ा.

खुद ब्रिटिश सरकार का भी यही कहना है कि उसे यदि दो या तीन महीने का और समय मिल जाये, तो वह तब तक यूरोपीय संघ से सुव्यवस्थित ढंग से अलग होने के लिए आवश्यक नियम-क़ानून बना लेगी. तब ब्रिटिश नागरिकों को यूरोपीय संसद के आगामी चुनाव में मतदान करने की ज़रूरत भी नहीं रह जायेगी. यूरोपीय संसद के लिए होने वाले चुनाव संघ के शेष 27 देशों में 23 से 26 मई तक होंगे, हालांकि यूरोपीय संसद का पूरा कार्यकाल, एक महीने बाद, जून के अंत में समाप्त होगा.

लेकिन, ब्रिटिश संसद (निचले सदन हाउस ऑफ़ कॉमन्स) के अध्यक्ष जॉन बेर्को ने प्रधानमंत्री टेरेसा मे को अचानक एक नये धर्मसंकट में डाल दिया है. 415 वर्ष पुराने एक नियम का उल्लेख करते हुए 19 मार्च की शाम को उन्होंने कहा, ‘सरकार कोई ऐसा प्रारूप (संसद में) फिर से पेश नहीं कर सकती, जिसमें पिछले सप्ताह के उस प्रारूप की अपेक्षा, जिसे 149 मतों के बहुमत के साथ ठुकरा दिया गया है, कोई नया महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है.’ बेर्को का कहना था, ‘यह निर्णय सरकार को य दिखाने के लिए है कि उसे किस परीक्षा से गुज़रना होगा, ताकि मैं संसद में पुनः मतविभाजन की अनुमति दे सकूं.’

संसद-अध्यक्ष के इस वक्तव्य के बाद ब्रिटेन के ब्रेक्जिट मंत्री स्टीव बार्कले ने स्काई-चैनल से कहा कि वे यूरोपीय शिखर सम्मेलन से पहले संसद में अब किसी मतविभाजन की आशा नहीं करते. सरकार को अब कोई दूसरा उपाय सोचना पड़ेगा. इतना ही कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मे यूरोपीय शिखर सम्मेलन में तब भी भाग लेंगी.

दूसरा परिदृश्य

ब्रिटेन को यदि आगामी जून से अधिक समय की ज़रूरत पड़ी तो कई नयी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं. तब, नियमानुसार उसे भी अपने यहां यूरोपीय संसद के लिए चुनाव करवाने चाहिए, चुनावों के बाद यूरोपीय सरकार की तरह उसके नये आयोग के गठन में ब्रिटेन को भी सहनिर्णय का अधिकार मिलना चाहिये इत्यादि, इत्यादि. चुनावों में भाग लेना और उसके बाद यूरोपीय संघ से किनारा कर लेना न केवल अजीब लगेगा, इसमें रोड़ा अटकाने के लिए यूरोपीय संसद के नये चेहरों और संघ की किन्हीं सरकारों की ओर से नयी-नयी आपत्तियां भी उठायी जा सकती हैं.

कुछेक सरकारें ब्रिटेन के साथ हुए मौजूदा ब्रेक्जिट समझौते को या उसे मिल रही किसी रियायत को मानने से मना कर कर सकती हैं. तब सारा मामला एक बार फिर खटाई में पड़ सकता है. नियम यह है कि यूरोपीय संघ में शामिल होने या उससे विदा लेने से जुड़ा हर निर्णय एकमत से होना चाहिये. एक भी देश ने यदि किसी निर्णय का विरोध किया, तो वह पारित नहीं हो सकता. यह विश्वास कर सकना वैसे भी कठिन ही है कि ब्रिटिश संसद यूरोपीय संघ के साथ जिस ब्रेक्जिट-समझौते को बार-बार ठुकरा चुकी है, उसे 20 मार्च को अपना लेगी. यदि ऐसा हुआ, तो यह एक चमत्कार ही होगा.

तीसरा परिदृश्य

नहले पर दहला तब हो जाएगा, जब ब्रिटिश संसद ब्रेक्जिट-समझौते को इस बार भी ठुकरा देगी. यूरोपीय संघ के अधिकांश नेताओं का मानना है कि तब सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि किसी भगदड़-जैसे अव्यवस्थित ब्रेक्जिट से बचने के लिए प्रधानमंत्री टेरेसा मे क्या विकल्प सुझाती हैं. यूरोपीय संघ के ब्रसेल्स मुख्यालय में ऐसा नहीं माना जा रहा है कि ब्रिटिश सरकार के पास कोई ऐसा सुझाव है, जो अब तक की अनेक वार्ताओं में उसके अपने या यूरोपीय संघ के वार्ताकारों के दिमाग़ में नहीं आया था. 21 मार्च वाले शिखर सम्मेलन के यूरोपीय नेता यही कहना चाहेंगे कि ब्रिटेन की ओर से किसी व्यावहारिक योजना के बिना वे कब तक उसे समय देते और तारीख़ें आगे बढ़ाते रहेंगे!

यूरोपीय संसद के ब्रेक्जिट प्रभारी और बेल्जियम के एक पूर्व प्रधानमंत्री गॉय फ़ेयरहोफ़श्टाट ने अभी से कहना शुरू कर दिया है कि ब्रिटेन को लंबे समय की मोहलत नहीं दी जा सकती. लेकिन, यूरोपीय संघ के राष्ट्रपति के समान, उसके शिखर सम्मेलनों की अध्यक्षता करने वाले दोनाल्द तुस्क ने ट्वीट किया है कि ब्रिटेन यदि यह कहता है कि उसे ब्रेक्जिट संबंधी अपनी तैयारियों और योजनाओं पर पुनरविचार करने के लिए अपेक्षाकृत लंबा समय चाहिये, तो यूरोपीय संघ वाले देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों को भी उदारता का परिचय देना चाहिये.

ब्रिटिश जनता को सताने का कोई इरादा नहीं

सुनने में आया है कि उदारता और सहृदयता की ऐसी ही अपीलों को देखते हुए यूरोपीय संघ के मुख्यालय में ब्रिटेन को इस साल के अंत या उसके बाद तक भी समय देने पर सोच-विचार किया जा रहा है. यूरोपीय संघ का कार्यकारी आयोग ऐसा कोई आभास नहीं देना चाहता, जिससे लगे कि ब्रिटिश जनता को सताने से यूरोप वालों को कोई सुख मिल सकता है. आयोग के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि ब्रिटेन को अधिक समय देने की उदारता और मई के अंत में यूरोपीय संसद के चुनाव करवाने की अनिवार्यता के बीच पटरी कैसे बैठायी जाये.

ब्रिटेन को आगामी जून महीने के बाद का भी समय देने का मतलब होगा, यह जानते हुए भी वहां यूरोपीय संसद के चुनाव करवाना, कि ब्रिटेन तो कुछ ही दिनों का मेहमान है. लोग पूछेंगे कि कुछ ही दिनों के एक ऐसे मेहमान को अगले छह वर्षों तक काम करने वाले यूरोपीय आयोग के गठन और अगले छह वर्षों तक के उसके बजट में अपनी टांग अड़ाने का मौका देना भला कहां की बुद्धिमत्ता है? इसे शेष 27 देशों की जनता के गले उतारना टेढ़ी खीर बन जायेगा!

कुल मिलाकर कभी आधी दुनिया पर राज कर चुके अंग्रेज़ों का नन्हा-सा ‘ग्रेट ब्रिटेन’ यूरोपीय संघ के गले की एक ऐसी फांस बन गया है, जो न निगलते बन रहा है और न उगलते. यह भी कोई नहीं जानता कि यूरोपीय संघ संघ से तलाक़ ले लेने के बाद ‘बर्तानिया महान’ का एकाकी जीवन और सुखद बनेगा या दुखद!