देश के हर गांव को खुशहाल समृद्ध और न जाने क्या-क्या बना देने के परंपरागत सरकारी दावों के बीच एक ऐसी हकीकत सामने आई है जो इन दावों की हवा निकाल देती है. सामाजिक आर्थिक और जातिगत आधार पर हुई जनगणना के बहुप्रतीक्षित आंकड़ों से पता चला है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में अब भी लगभग 10 करोड़ परिवार ऐसे हैं जिनके पास न पेट में डालने के लिए रोटी है और न ही सर ढकने के लिए एक अदद छत. इसके अलावा इन आंकड़ों से यह भी पता चला है कि गांवों में रह रहा हर तीसरा परिवार आजीविका के लिए पूरी तरह से मजदूरी पर निर्भर है.
गांवों में रह रहा हर तीसरा परिवार आजीविका के लिए पूरी तरह से मजदूरी पर निर्भर है.
देशभर के 640 जिलों में की गई इस जनगणना के बहुप्रतीक्षित आंकड़ों को वित्तमंत्री अरुण जेटली और ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह ने जारी किया. सन 1932 के बाद पहली बार (2011) सरकार ने सामाजिक-आर्थिक और जातिगत आधार पर जनगणना की थी. हालांकि सरकार ने फिलहाल जाति आधारित आंकड़े जारी नहीं किये हैं. जारी किए गए आंकड़ों के शुरुआती अध्ययन के आधार पर जो मोटी मोटी जानकारियां सामने आई हैं, उनके मुताबिक देश के ग्रामीण और शहरी इलाकों में लगभग 25 करोड़ परिवार हैं. इनमें से ग्रामीण परिवारों की संख्या लगभग 18 करोड़ है. इनका अलग-अलग आर्थिक मानकों के आधार पर अध्ययन करने के बाद सरकार ने इनमें से सात करोड़ से ज्यादा ग्रामीण परिवारों को गरीब की श्रेणी से बाहर माना है.
मोबाइल कंपनियों ने 'नंबर पोर्टेबिलिटी' सुविधा शुरू की
नंबर बदलने और रोमिंग के झंझट से परेशान मोबाइल उपभोक्ताओं के लिए एक अच्छी खबर है. मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों ने देश के अधिकतर राज्यों में 'मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी' (एमएनपी) की सुविधा शुरू कर दी है. इससे लोग दूसरे राज्यों में जाने के बाद बिना मोबाइल नंबर बदले किसी भी अन्य मोबाइल कंपनी की सेवा ले सकेंगे. इसके लिए उन्हें 19 रूपये का प्राथमिक शुल्क जमा करने के अलावा किसी भी तरह का अन्य चार्ज नहीं देना पड़ेगा. इस फैसले को 'एक देश, एक व्यक्ति और एक मोबाइल नंबर' की दिशा में बेहद अहम पड़ाव माना जा रहा है. देशभर के मोबाइल उपभोक्ताओं की मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने मोबाइल कंपनियों के सामने एमएनपी लागू करने के लिए तीन जुलाई की डेडलाइन रखी थी. इस फैसले से करोड़ों मोबाइल उपभोक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद है. दरअसल मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी की मांग पिछले कई सालों से चली आ रही थी. देश भर के 15 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता तो इसको लेकर लिखित मांग तक कर चुके हैं.
कांग्रेस ने मानसून सत्र नहीं चलने देने की चेतावनी दोहराई
कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर से संसद का आगामी मॉनसून सत्र नहीं चलने देने की अपनी चेतावनी दोहराई है. उसने कहा है कि जब तक ललित मोदी प्रकरण में संलिप्त विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को उनके पदों से हटाया नहीं जाता तब तक वह किसी भी सूरत में संसद नहीं चलनें देगी. कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने दूसरे विपक्षी दलों से भी इस पर समर्थन मांगा है. पार्टी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने कहा कि दूसरे दलों को भी यह दिखाना चाहिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका रूख कैसा है. उन्होंने उम्मीद जताई है कि बाकी पार्टियां भी संसद में सरकार को घेरने में उनकी मदद करेंगी. हालांकि इस बारे में अभी तक किसी भी दूसरी विपक्षी पार्टी ने अपनी राय जाहिर नहीं की है, लेकिन माना यही जा रहा है कि वे सभी इस मुद्दे पर एकजुट होकर सरकार को घेरेंगी. वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी सुषमा और राजे के बचाव में मुस्तैदी से डटी हुई हैं. ऐसे में संसद के आगामी मानसून सत्र का हंगामेदार होना तय लग रहा है.